China US Tariff: अमेरिका ने भारत पर चीनी सामान के गैर-कानूनी ट्रांसशिपमेंट के आरोप लगाए हैं। वॉशिंगटन का दावा है कि टैरिफ से बचने के लिए चीन से आने वाले सामान को भारत, मैक्सिको और वियतनाम जैसे देशों के जरिए अमेरिकी बाजार तक पहुंचाया जा रहा है। हालांकि, भारतीय थिंक टैंक ग्लोबल ट्रेड रिसर्च इनिशिएटिव (GTRI) ने इन दावों पर सवाल उठाते हुए कहा है कि अमेरिका ने भारत की कथित भूमिका साबित करने के लिए ठोस शिपमेंट-लेवल सबूत पेश नहीं किए हैं।
नई दिल्ली: अमेरिका और चीन के बीच टैरिफ की लड़ाई का असर अब भारत समेत दूसरे देशों पर भी दिखाई दे रहा है। व्हाइट हाउस ने 13 अगस्त को ‘द ग्रेट ट्रांसशिपमेंट स्कैम: राइज, स्कोप, एंड कॉस्ट्स’ नाम से एक रिपोर्ट जारी की। इसमें आरोप लगाया गया कि कई देशों के जरिए सामान को अमेरिकी बाजार में भेजकर टैरिफ से बचने की कोशिश की जा रही है।
अमेरिकी रिपोर्ट के मुताबिक, 2025 में भारत, मैक्सिको और वियतनाम के जरिए करीब 67 अरब डॉलर का सामान ट्रांसशिप किया गया, जिससे अमेरिका को लगभग 28 अरब डॉलर के टैरिफ राजस्व का नुकसान हुआ। हालांकि, GTRI का कहना है कि इस आंकड़े में भारत की कितनी हिस्सेदारी है, इसका कोई स्पष्ट देशवार विवरण रिपोर्ट में नहीं दिया गया है।
अमेरिका ने भारत को हाई-रिस्क कैटेगरी में रखा
व्हाइट हाउस की रिपोर्ट में भारत को कनाडा, यूरोपीय संघ, इजरायल, जापान, मैक्सिको, दक्षिण कोरिया और ताइवान के साथ टियर-1 हाई-रिस्क ट्रांसशिपमेंट देशों में रखा गया है।
रिपोर्ट में ट्रांसशिपमेंट के तहत री-लेबलिंग, री-पैकेजिंग, री-इनवॉइसिंग, मामूली प्रोसेसिंग और सामान के वास्तविक मूल देश को लेकर गलत जानकारी देने जैसी गतिविधियों का जिक्र किया गया है।
लेकिन GTRI के संस्थापक अजय श्रीवास्तव का कहना है कि केवल व्यापार के आंकड़ों में बदलाव से यह साबित नहीं किया जा सकता कि भारत के जरिए चीनी सामान को अवैध तरीके से अमेरिका भेजा जा रहा है।
थिंक टैंक के मुताबिक, अमेरिकी रिपोर्ट में न तो किसी भारतीय निर्यातक का नाम दिया गया है और न ही किसी ऐसे विशिष्ट भारतीय शिपमेंट की पहचान की गई है जिसे टैरिफ चोरी का मामला साबित किया गया हो।
पंप और कंप्रेसर को लेकर अमेरिका की चिंता
व्हाइट हाउस की रिपोर्ट में HS कोड 8413 और 8414 के तहत आने वाले पंप और कंप्रेसर उत्पादों के मामले में पुणे-गुजरात-चेन्नई मैन्युफैक्चरिंग कॉरिडोर का उल्लेख किया गया है।
GTRI ने इस उदाहरण को लेकर कहा कि इन उत्पादों में भारत का अपना मजबूत मैन्युफैक्चरिंग और एक्सपोर्ट बेस है। इसलिए केवल इस आधार पर भारतीय उत्पादों को चीनी सामान का री-रूटिंग नेटवर्क मानना उचित नहीं है।
थिंक टैंक के अनुसार, वित्त वर्ष 2025-26 में भारत ने दुनिया भर में करीब 1.61 अरब डॉलर के लिक्विड पंप एक्सपोर्ट किए। इनमें अमेरिका को लगभग 41.45 करोड़ डॉलर का निर्यात शामिल था। इसी अवधि में चीन से भारत ने करीब 32.64 करोड़ डॉलर के लिक्विड पंप इंपोर्ट किए।
इसी तरह भारत ने करीब 1.48 अरब डॉलर के एयर पंप और गैस कंप्रेसर दुनिया को एक्सपोर्ट किए। इनमें अमेरिका को लगभग 33.54 करोड़ डॉलर का निर्यात शामिल था। वहीं चीन से इन उत्पादों का भारत का इंपोर्ट करीब 1.63 अरब डॉलर रहा।
GTRI का तर्क है कि भारत के एक्सपोर्ट का बड़ा आकार यह दिखाता है कि इन क्षेत्रों में देश की वास्तविक मैन्युफैक्चरिंग क्षमता मौजूद है। चीन से किसी उत्पाद या उसके कंपोनेंट का आयात होना अपने आप में गैर-कानूनी ट्रांसशिपमेंट का प्रमाण नहीं है।
चीनी कंपोनेंट इस्तेमाल करने से प्रोडक्ट चीन का नहीं हो जाता
GTRI ने वैश्विक सप्लाई चेन के एक अहम पहलू की ओर ध्यान दिलाया है। आज दुनिया के कई देशों में बनने वाले उत्पादों में अलग-अलग देशों से आए कंपोनेंट और इंटरमीडिएट गुड्स इस्तेमाल होते हैं।
चीन भारत, मैक्सिको और वियतनाम जैसे देशों के मैन्युफैक्चरर्स को बड़ी मात्रा में कंपोनेंट और इंटरमीडिएट सामान सप्लाई करता है। इनका इस्तेमाल स्थानीय स्तर पर प्रोसेसिंग, असेंबली, टेस्टिंग या फिनिशिंग के बाद अंतिम उत्पाद बनाने में किया जा सकता है।
GTRI के मुताबिक, अगर किसी देश में पर्याप्त मैन्युफैक्चरिंग और वैल्यू एडिशन हुआ है तो उस उत्पाद को केवल चीनी इनपुट के इस्तेमाल के आधार पर चीनी ट्रांसशिपमेंट नहीं कहा जा सकता।
थिंक टैंक ने यह भी कहा कि व्हाइट हाउस की रिपोर्ट में असली मैन्युफैक्चरिंग गतिविधियों और कस्टम्स फ्रॉड के बीच अंतर स्पष्ट रूप से बनाए रखना जरूरी है। असेंबली, टेस्टिंग, फिनिशिंग और कंपोनेंट इंटीग्रेशन जैसी गतिविधियों को जानबूझकर की गई री-लेबलिंग या री-इनवॉइसिंग के साथ एक ही नजर से देखने पर वास्तविक कारोबार और धोखाधड़ी के बीच की सीमा धुंधली हो सकती है।
चीन से इंपोर्ट घटा, लेकिन अमेरिका की कुल इंपोर्ट निर्भरता नहीं घटी
GTRI ने अमेरिकी टैरिफ नीति के असर को लेकर भी सवाल उठाए हैं। आंकड़ों के मुताबिक, अमेरिका का चीन से इंपोर्ट 2017 के 525.8 अरब डॉलर से घटकर 2025 में 327.5 अरब डॉलर रह गया।
लेकिन इसी अवधि में अमेरिका का कुल इंपोर्ट 2.41 ट्रिलियन डॉलर से बढ़कर 3.50 ट्रिलियन डॉलर हो गया।
GTRI का कहना है कि इससे संकेत मिलता है कि टैरिफ ने अमेरिका की विदेशी सामानों पर कुल निर्भरता को खत्म नहीं किया, बल्कि इंपोर्ट के स्रोत में बदलाव किया है। चीन से सीधे सामान खरीदने के बजाय अमेरिका दूसरे देशों से ज्यादा सामान मंगा रहा है।
इस दौरान चीन ने भी अपनी भूमिका में बदलाव किया है। वह कई देशों में स्थित मैन्युफैक्चरर्स को इंटरमीडिएट गुड्स और कंपोनेंट्स सप्लाई करके वैश्विक वैल्यू चेन में अपनी भागीदारी बनाए हुए है।
भारत का आंकड़ा क्या कहता है?
GTRI ने 2017 से 2024 के बीच अलग-अलग देशों के व्यापार आंकड़ों का उदाहरण देते हुए बताया कि अमेरिका को एक्सपोर्ट बढ़ने और चीन से इंपोर्ट बढ़ने का संबंध अपने आप ट्रांसशिपमेंट साबित नहीं करता।
इस अवधि में अमेरिका को भारत का एक्सपोर्ट 40.7 अरब डॉलर बढ़ा, जबकि चीन से भारत का इंपोर्ट 52.4 अरब डॉलर बढ़ा।
इसी तरह अमेरिका को मैक्सिको का एक्सपोर्ट 194.2 अरब डॉलर बढ़ा, जबकि चीन से उसका इंपोर्ट 54.3 अरब डॉलर बढ़ा। वियतनाम के मामले में अमेरिका को एक्सपोर्ट 94.1 अरब डॉलर बढ़ा, जबकि चीन से उसका इंपोर्ट 90.2 अरब डॉलर बढ़ा।
GTRI का कहना है कि चीन से भारत आने वाले सामान का इस्तेमाल घरेलू बाजार, वास्तविक मैन्युफैक्चरिंग या अमेरिका के अलावा दूसरे देशों को एक्सपोर्ट करने में भी हो सकता है। इसलिए केवल दो देशों के ट्रेड डेटा को जोड़कर अवैध ट्रांसशिपमेंट का निष्कर्ष निकालना पर्याप्त नहीं है।
GTRI ने बताईं अमेरिकी दावे की चार बड़ी कमजोरियां
GTRI ने व्हाइट हाउस की रिपोर्ट के आधार पर चार प्रमुख चिंताएं सामने रखी हैं।
पहली कमजोरी: ट्रांसशिपमेंट की परिभाषा को बहुत व्यापक बना देने का खतरा है। सामान्य रूप से सामान को बिना पर्याप्त बदलाव के दूसरे देश के जरिए भेजना और वास्तविक मैन्युफैक्चरिंग या असेंबली अलग-अलग गतिविधियां हैं।
दूसरी कमजोरी: व्यापार के आंकड़ों में संबंध दिखने से उत्पाद के वास्तविक मूल स्थान को लेकर धोखाधड़ी साबित नहीं होती। चीन से अमेरिकी इंपोर्ट घटने और भारत जैसे देशों से इंपोर्ट बढ़ने का मतलब यह नहीं कि वही चीनी सामान दूसरे लेबल के साथ अमेरिका पहुंचा।
तीसरी कमजोरी: अलग-अलग देशों पर लगाए गए टैरिफ में बड़ा अंतर कंपनियों को नियमों से बचने के लिए प्रोत्साहित कर सकता है। इसलिए केवल व्यापार में बदलाव देखने के बजाय वास्तविक शिपमेंट की जांच जरूरी है।
चौथी कमजोरी: अमेरिका के मौजूदा नॉन-प्रिफरेंशियल रूल्स ऑफ ओरिजिन में ‘सब्सटैंशियल ट्रांसफॉर्मेशन’ यानी पर्याप्त बदलाव के सिद्धांत का इस्तेमाल होता है। GTRI के अनुसार, नियमों की अत्यधिक सख्ती से वैध मैन्युफैक्चरर्स के लिए अनिश्चितता और अनुपालन लागत बढ़ सकती है।
अब भारतीय निर्यातकों पर बढ़ सकती है जांच
व्हाइट हाउस ने संदिग्ध ट्रांसशिपमेंट पर कार्रवाई के लिए ज्यादा सख्त जांच व्यवस्था की बात कही है। अमेरिका ज्यादा जोखिम वाले शिपमेंट की पहचान करने के लिए नए तकनीकी टूल विकसित कर रहा है।
रिपोर्ट में ‘Detective Border’ नाम के AI-आधारित सिस्टम का भी उल्लेख किया गया है। इसका उद्देश्य ट्रेड डेटा का विश्लेषण कर घोषित मूल देश, शिपमेंट की रूटिंग हिस्ट्री और कंपोनेंट कंटेंट के बीच संभावित विसंगतियों को पहचानना है।
अगर अमेरिकी जांच व्यवस्था भारत से आने वाले शिपमेंट पर ज्यादा फोकस करती है तो भारतीय निर्यातकों के लिए जांच बढ़ सकती है। इससे कस्टम्स जांच, शिपमेंट में देरी, अतिरिक्त ड्यूटी और संभावित जुर्माने जैसी परेशानियां सामने आ सकती हैं।
खासकर वे भारतीय कंपनियां इस जांच के दायरे में आ सकती हैं जो चीनी कंपोनेंट या इंटरमीडिएट गुड्स का इस्तेमाल करती हैं, लेकिन भारत में उनका पर्याप्त प्रोसेसिंग और वैल्यू एडिशन करती हैं।
भारत को शिपमेंट-लेवल सबूत मांगने चाहिए
GTRI ने सुझाव दिया है कि भारत को अमेरिका से 67 अरब डॉलर के ट्रांसशिपमेंट अनुमान का विस्तृत आधार मांगना चाहिए। इसमें देश, उत्पाद और शिपमेंट स्तर की जानकारी शामिल होनी चाहिए।
भारतीय अधिकारियों को उन उत्पाद श्रेणियों की भी जांच करनी चाहिए जिनका अमेरिकी रिपोर्ट में विशेष रूप से उल्लेख किया गया है। इसमें कंपनी स्तर पर चीन से होने वाले इंपोर्ट और अमेरिका को होने वाले एक्सपोर्ट का मिलान किया जा सकता है। साथ ही यह भी देखा जा सकता है कि भारत में कितना वास्तविक वैल्यू एडिशन हुआ है।
ऐसी जांच से वास्तविक टैरिफ चोरी के मामलों को पकड़ने में मदद मिल सकती है और उन भारतीय निर्यातकों को भी बचाया जा सकता है जो वैश्विक सप्लाई चेन में पूरी तरह वैध तरीके से काम कर रहे हैं।
भारत के सामने दोहरी चुनौती
अमेरिका के आरोपों के बाद भारत के सामने चुनौती आसान नहीं है। एक तरफ यह सुनिश्चित करना जरूरी है कि कोई भारतीय कंपनी वास्तव में मूल स्थान के नियमों का दुरुपयोग करके अमेरिकी टैरिफ से बचने की कोशिश न कर रही हो। दूसरी तरफ उन कंपनियों को भी अनावश्यक कार्रवाई से बचाना जरूरी है जो चीन से कंपोनेंट खरीदकर भारत में वास्तविक मैन्युफैक्चरिंग करती हैं।
अमेरिका का तर्क है कि अवैध ट्रांसशिपमेंट उसकी टैरिफ नीति को कमजोर करता है और सरकारी राजस्व को नुकसान पहुंचाता है। वहीं GTRI का कहना है कि भारत के पूरे एक्सपोर्ट सेक्टर को संदेह की नजर से देखने के बजाय विशिष्ट शिपमेंट, कंपनियों और लेनदेन के ठोस सबूत सामने रखे जाने चाहिए।
आखिरकार, चीन से किसी देश का इंपोर्ट बढ़ना और उसी देश से अमेरिका का एक्सपोर्ट बढ़ना अपने आप में टैरिफ चोरी का सबूत नहीं है। असली सवाल यह है कि क्या किसी खास शिपमेंट ने गलत तरीके से मूल देश बदला, या फिर उस देश में वास्तव में पर्याप्त मैन्युफैक्चरिंग और वैल्यू एडिशन हुआ था। आने वाले समय में अमेरिकी जांच इसी अंतर को तय करेगी।


