गन्ना पेराई सीजन 2026-27: दिवाली से पहले चीनी की उपलब्धता बढ़ाने के लिए गन्ने की पेराई जल्दी शुरू करने की तैयारी ने महाराष्ट्र और कर्नाटक के किसानों की चिंता बढ़ा दी है। किसान समय से पहले पेराई का विरोध कर रहे हैं। उनका कहना है कि अपरिपक्व गन्ने की कटाई से चीनी की रिकवरी घट सकती है और प्रति एकड़ करीब ₹20,000 तक का आर्थिक नुकसान हो सकता है। विरोध के कारण दोनों राज्यों में चीनी मिलों का कामकाज प्रभावित हुआ है। किसानों की मांगों और शिकायतों पर विचार करने के लिए सरकार ने एक समिति गठित करने का फैसला किया है।
महाराष्ट्र और कर्नाटक में चीनी मिलों का काम प्रभावित
महाराष्ट्र और कर्नाटक देश के प्रमुख चीनी उत्पादक राज्यों में शामिल हैं। इन राज्यों में गन्ने की पेराई का समय किसानों की आमदनी और चीनी उत्पादन, दोनों के लिहाज से अहम है। ऐसे में पेराई सीजन जल्दी शुरू करने को लेकर किसानों और चीनी मिलों के बीच विवाद बढ़ गया है।
महाराष्ट्र में उपलब्ध जानकारी के मुताबिक, 55 चीनी मिलों में से केवल 15 मिलों ने 2026-27 के पेराई सीजन में काम शुरू किया था। राज्य की करीब 40 मिलों में अक्टूबर में शुरू होने वाले नियमित सीजन से पहले पारंपरिक पूजा की जा चुकी थी, लेकिन किसानों के विरोध के चलते सभी मिलों में सामान्य कामकाज शुरू नहीं हो सका।
रिपोर्टों के अनुसार, महाराष्ट्र की कुछ मिलों ने 8 अक्टूबर से गन्ने की पेराई शुरू की थी। दूसरी ओर, कर्नाटक में विरोध के कारण नियमित पेराई सीजन की शुरुआत प्रभावित हुई। हालांकि, राज्य की 28 मिलों में से आठ मिलों में विशेष सीजन के दौरान उगाए गए गन्ने की पेराई जारी थी।
इस विरोध का असर केवल मिलों के संचालन तक सीमित नहीं है। यदि पेराई शुरू होने में देरी होती है, तो चीनी उत्पादन और बाजार में इसकी उपलब्धता की समयसीमा भी प्रभावित हो सकती है। वहीं, किसानों का तर्क है कि गन्ने को पर्याप्त समय दिए बिना पेराई शुरू करने से उनकी उपज और कमाई पर प्रतिकूल असर पड़ेगा।
आखिर समय से पहले गन्ने की पेराई का विरोध क्यों कर रहे किसान?
किसानों की सबसे बड़ी चिंता गन्ने में चीनी की मात्रा यानी रिकवरी को लेकर है। गन्ने की गुणवत्ता, किस्म, मौसम और कटाई के समय के आधार पर उसमें मौजूद सुक्रोज की मात्रा बदलती है। किसानों का कहना है कि यदि गन्ने की पेराई बहुत जल्दी शुरू कर दी जाती है, तो फसल को पूरी तरह विकसित होने का पर्याप्त समय नहीं मिलेगा।
उनके मुताबिक, नवंबर के बाद कई परिस्थितियों में गन्ने में सुक्रोज की मात्रा बढ़ सकती है। ऐसे में अक्टूबर की शुरुआत में अपरिपक्व गन्ने की कटाई और पेराई करने से चीनी की रिकवरी कम रहने की आशंका है।
चीनी की रिकवरी का सीधा संबंध मिलों को मिलने वाली चीनी की मात्रा से होता है। यदि समान मात्रा में गन्ने से कम चीनी निकलती है, तो मिलों की उत्पादन लागत और किसानों को मिलने वाले भुगतान से जुड़े आर्थिक समीकरण प्रभावित हो सकते हैं।
किसानों का कहना है कि त्योहारों के मौसम में चीनी की उपलब्धता बढ़ाने का दबाव उनकी फसल की गुणवत्ता और आमदनी की कीमत पर नहीं होना चाहिए। वे चाहते हैं कि पेराई का कार्यक्रम गन्ने की परिपक्वता और स्थानीय परिस्थितियों को ध्यान में रखकर तय किया जाए।
किसानों को प्रति एकड़ ₹20,000 तक नुकसान कैसे हो सकता है?
किसान संगठनों की ओर से समय से पहले पेराई के खिलाफ सबसे बड़ा तर्क संभावित आर्थिक नुकसान है। मीडिया रिपोर्टों में किसान नेताओं के हवाले से दावा किया गया है कि अपरिपक्व गन्ने की पेराई से प्रति एकड़ लगभग छह टन तक उत्पादन का अंतर हो सकता है। इससे किसानों को करीब ₹20,000 प्रति एकड़ तक नुकसान होने की आशंका जताई गई है।
इस दावे को समझने के लिए गन्ने की पैदावार और उसके मूल्य को देखना जरूरी है। यदि समय से पहले कटाई करने के कारण प्रति एकड़ गन्ने की बिक्री योग्य मात्रा कम होती है, तो किसान की कुल आमदनी घट सकती है। इसके अतिरिक्त, गन्ने में चीनी की रिकवरी कम रहने पर भुगतान की गणना से जुड़े नियमों के अनुसार भी आर्थिक असर पड़ सकता है।
हालांकि, ₹20,000 प्रति एकड़ के नुकसान का आंकड़ा किसानों की ओर से जताई गई आशंका है। इसे सभी किसानों के लिए निश्चित नुकसान नहीं माना जाना चाहिए। वास्तविक असर गन्ने की किस्म, खेत की स्थिति, उपज, कटाई के समय और संबंधित मिल की भुगतान व्यवस्था पर निर्भर करेगा।
किसानों की मांग है कि पेराई शुरू करने से पहले इन पहलुओं पर ध्यान दिया जाए, ताकि त्योहारों के दौरान चीनी की आपूर्ति बनाए रखने और गन्ना उत्पादकों की आमदनी के बीच संतुलन कायम किया जा सके।
गन्ने के दाम और चीनी की कीमत बढ़ाने की भी मांग
महाराष्ट्र और कर्नाटक के किसानों का विरोध केवल पेराई की तारीख तक सीमित नहीं है। वे गन्ने का बेहतर मूल्य मिलने और चीनी उद्योग से जुड़े दूसरे उत्पादों की कीमतों में बदलाव की मांग भी कर रहे हैं।
किसान संगठनों की प्रमुख मांगों में गन्ने के लिए अधिक समर्थन मूल्य, चीनी के न्यूनतम बिक्री मूल्य यानी एमएसपी को बढ़ाकर लगभग ₹60 प्रति किलोग्राम करने और एथेनॉल के दाम बढ़ाने की मांग शामिल है।
यहां एक महत्वपूर्ण अंतर समझना जरूरी है। गन्ने के लिए निर्धारित उचित एवं लाभकारी मूल्य (FRP) और चीनी का न्यूनतम बिक्री मूल्य अलग-अलग व्यवस्थाएं हैं। FRP गन्ना किसानों को मिलने वाले मूल्य से संबंधित है, जबकि चीनी का न्यूनतम बिक्री मूल्य वह न्यूनतम कीमत है जिस पर मिलें चीनी बेच सकती हैं। किसानों की मांग है कि इन व्यवस्थाओं में बदलाव से उन्हें बेहतर भुगतान सुनिश्चित करने में मदद मिले।
एथेनॉल की कीमतें भी चीनी मिलों के आर्थिक समीकरण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। कई मिलें गन्ने से प्राप्त उत्पादों के साथ एथेनॉल उत्पादन से भी आय अर्जित करती हैं। किसानों और उद्योग से जुड़े संगठनों का मानना है कि इन कीमतों में उचित बदलाव से गन्ना क्षेत्र की आर्थिक स्थिति पर असर पड़ सकता है।
हालांकि, चीनी के न्यूनतम बिक्री मूल्य में बढ़ोतरी का अर्थ अपने आप गन्ना किसानों को उतनी ही अनुपात में अधिक भुगतान मिलना नहीं है। इसका वास्तविक प्रभाव मिलों की वित्तीय स्थिति, गन्ने की कीमतों और भुगतान व्यवस्था पर निर्भर करेगा।
सरकार ने किसानों की शिकायतों पर बनाई समिति
गन्ना पेराई को लेकर बढ़ते विरोध के बीच केंद्र सरकार ने किसान संगठनों के प्रतिनिधियों के साथ बातचीत की। रिपोर्टों के मुताबिक, किसानों की ओर से राष्ट्रीय राजमार्गों पर विरोध प्रदर्शन करने की चेतावनी दिए जाने के बाद केंद्रीय खाद्य मंत्री प्रह्लाद जोशी और कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने नई दिल्ली में किसान संगठनों के प्रमुख प्रतिनिधियों से चर्चा की।
इस बातचीत के दौरान किसानों की शिकायतों और मांगों पर विचार करने के लिए नीति आयोग के पूर्व सदस्य रमेश चंद की अध्यक्षता में एक समिति गठित करने का निर्णय लिया गया।
समिति का गठन ऐसे समय में हुआ है, जब चीनी मिलों के सामने पेराई सीजन शुरू करने और किसानों की चिंताओं के बीच संतुलन बनाने की चुनौती है। किसानों को उम्मीद है कि उनकी मांगों पर विचार किया जाएगा और पेराई के समय को लेकर उचित समाधान निकलेगा।
हालांकि, समिति के गठन को किसानों की सभी मांगों की स्वीकृति नहीं माना जा सकता। गन्ने की कीमतों, चीनी के न्यूनतम बिक्री मूल्य और एथेनॉल के दामों में किसी बदलाव के लिए संबंधित सरकारी निर्णय और आधिकारिक घोषणा जरूरी होगी।
दिवाली से पहले चीनी की सप्लाई पर क्या पड़ेगा असर?
त्योहारों के दौरान मिठाइयों और दूसरे खाद्य उत्पादों की मांग बढ़ने से चीनी की उपलब्धता महत्वपूर्ण हो जाती है। इसी वजह से समय पर पेराई शुरू करना चीनी उद्योग के लिए अहम माना जाता है।
यदि महाराष्ट्र और कर्नाटक में विरोध लंबे समय तक जारी रहता है, तो मिलों का नियमित संचालन और गन्ने की पेराई प्रभावित हो सकती है। दूसरी ओर, यदि पेराई जल्दी शुरू की जाती है, तो किसानों की ओर से जताई गई कम रिकवरी और आर्थिक नुकसान की आशंका पर ध्यान देना जरूरी होगा।
चीनी की वास्तविक उपलब्धता पर असर इस बात से तय होगा कि कितनी मिलें समय पर संचालन शुरू करती हैं, उनके पास कितना गन्ना उपलब्ध है और उत्पादन किस गति से आगे बढ़ता है। इसलिए केवल विरोध के आधार पर बाजार में चीनी की कमी या कीमतों में निश्चित बढ़ोतरी का अनुमान लगाना उचित नहीं होगा।
किसानों और चीनी उद्योग के सामने संतुलन की चुनौती
महाराष्ट्र और कर्नाटक में गन्ना पेराई को लेकर जारी विवाद खेती की लागत, फसल की परिपक्वता, किसानों की आमदनी और चीनी की आपूर्ति के बीच संतुलन की जरूरत को सामने लाता है।
किसान चाहते हैं कि उन्हें अपनी फसल का उचित मूल्य मिले और अपरिपक्व गन्ने की पेराई से संभावित नुकसान से बचाया जाए। वहीं, चीनी उद्योग और सरकार के सामने त्योहारों के दौरान पर्याप्त आपूर्ति बनाए रखने की चुनौती है।
अब सबकी नजर सरकार की ओर से गठित समिति की सिफारिशों और पेराई सीजन को लेकर होने वाले अगले फैसलों पर रहेगी। यदि किसानों की मांगों और चीनी उद्योग की जरूरतों के बीच सहमति बनती है, तो इससे मौजूदा विवाद को सुलझाने में मदद मिल सकती है।
Source: उपलब्ध मीडिया रिपोर्टों और किसान संगठनों के दावों पर आधारित।
डिस्क्लेमर: प्रति एकड़ ₹20,000 तक के नुकसान का आंकड़ा किसानों की ओर से जताई गई आशंका है। वास्तविक नुकसान क्षेत्र, उपज, गन्ने की परिपक्वता और भुगतान व्यवस्था के अनुसार अलग-अलग हो सकता है।


