कॉर्पोरेट नौकरी छोड़कर खुद का काम शुरू करना आसान नहीं होता। खासकर तब, जब सामने कोई तैयार बाजार न हो, तकनीक नई हो और शुरुआती दिनों में संसाधन भी बेहद सीमित हों। लेकिन IIT रुड़की के दो दोस्तों — अंकित आलोक बगड़िया और अभि गावड़ी — ने वही किया, जिसे ज्यादातर लोग जोखिम मानते हैं। उन्होंने आरामदायक नौकरी के रास्ते को छोड़कर कचरा प्रबंधन और बायोसाइंस के क्षेत्र में कदम रखा। आज उनका स्टार्टअप ‘Loopworm’ करोड़ों रुपये का बिजनेस बन चुका है।
सबसे दिलचस्प बात यह है कि जिस कंपनी का आज सालाना रेकरिंग रेवेन्यू (ARR) करीब 16 करोड़ रुपये तक पहुंच चुका है, उसकी शुरुआत एक पुरानी सेकेंड हैंड एक्टिवा से हुई थी। शुरुआती दिनों में दोनों दोस्त खुद सड़क-सड़क घूमकर बायोमास और कीड़े इकट्ठा करते थे। कई बार वे 50-50 किलो के बोरे एक्टिवा पर लादकर घंटों सफर करते थे। यही मेहनत बाद में एक बड़े बायोटेक बिजनेस की नींव बनी।
IIT रुड़की से शुरू हुआ सफर

अंकित आलोक बगड़िया और अभि गावड़ी ने IIT रुड़की से केमिकल इंजीनियरिंग की पढ़ाई की। कॉलेज के दौरान दोनों ‘Enactus’ नाम के सोशल एंटरप्रेन्योरशिप ग्रुप से जुड़े, जहां उन्होंने वेस्ट मैनेजमेंट और ग्रामीण समस्याओं पर काम किया।
इसी दौरान उन्हें महसूस हुआ कि भारत में कृषि और फूड इंडस्ट्री से निकलने वाला भारी मात्रा का जैविक कचरा सही तरीके से इस्तेमाल नहीं हो रहा। दूसरी तरफ पशु आहार उद्योग लगातार महंगे प्रोटीन स्रोतों पर निर्भर था, खासकर फिश मील जैसे समुद्री स्रोतों पर।
यहीं से उनके दिमाग में एक नया विचार आया। उन्होंने रिसर्च के दौरान पाया कि सिल्कवर्म और ब्लैक सोल्जर फ्लाई के लार्वा प्राकृतिक रूप से जैविक कचरे को हाई-प्रोटीन पदार्थ में बदल सकते हैं। यह तकनीक न सिर्फ पर्यावरण के लिए बेहतर थी, बल्कि पशु और पेट न्यूट्रिशन इंडस्ट्री के लिए सस्ता और टिकाऊ विकल्प भी बन सकती थी।
प्री-प्लेसमेंट ऑफर छोड़ा, चुना जोखिम भरा रास्ता
IIT से पढ़ाई पूरी करने के बाद दोनों के पास अच्छी कॉर्पोरेट नौकरियों के अवसर थे। लेकिन उन्होंने सुरक्षित करियर के बजाय उद्यमिता का रास्ता चुना। यह फैसला आसान नहीं था, क्योंकि उस समय भारत में इंसेक्ट-आधारित प्रोटीन बिजनेस लगभग नया क्षेत्र था।
साल 2019 में दोनों ने बेंगलुरु में ‘Loopworm’ नाम से स्टार्टअप शुरू किया। शुरुआती दौर में उनके पास बड़ी टीम, भारी निवेश या आधुनिक फैक्ट्री कुछ भी नहीं था। वे खुद ही रिसर्च, कलेक्शन और ऑपरेशन संभालते थे।
सेकेंड हैंड एक्टिवा पर ढोया 50-50 किलो कचरा

स्टार्टअप की शुरुआत के दिनों की कहानी आज भी लोगों को प्रेरित करती है। लागत बचाने के लिए अंकित और अभि बेंगलुरु और तमिलनाडु बॉर्डर के आसपास रहते थे। वे एक पुरानी सफेद एक्टिवा पर 50-50 किलो तक के बोरे लादकर सिल्क रीलिंग यूनिट्स और डंपिंग साइट्स से बायोमास इकट्ठा करते थे।
उस समय कंपनी का पूरा फोकस तकनीक समझने और छोटे स्तर पर प्रयोग करने पर था। कई बार उन्हें स्थानीय लोगों और छोटे उद्योगों को यह समझाने में भी दिक्कत होती थी कि कीड़ों से प्रोटीन बनाना वास्तव में एक वैज्ञानिक और टिकाऊ प्रक्रिया है।
2019 से 2022 तक उन्होंने बेहद सीमित संसाधनों में कंपनी को चलाया। यही वह दौर था जिसने उनके बिजनेस मॉडल को मजबूत बनाया।
सरकार से मिला बड़ा सपोर्ट
स्टार्टअप के शुरुआती संघर्ष के बीच भारत सरकार की बायोटेक्नोलॉजी एजेंसी BIRAC ने उनकी मदद की। कंपनी को Biotechnology Ignition Grant (BIG) के तहत लगभग 1 करोड़ रुपये की फंडिंग मिली।
इस फंड की मदद से Loopworm ने:
- ब्लैक सोल्जर फ्लाई फार्मिंग टेक्नोलॉजी विकसित की
- हर महीने 500 किलोग्राम प्रोसेसिंग क्षमता वाला पायलट प्लांट लगाया
- रिसर्च और प्रोडक्ट टेस्टिंग को मजबूत किया
यही फंडिंग आगे चलकर कंपनी के लिए टर्निंग पॉइंट साबित हुई।
कैसे काम करता है Loopworm का बिजनेस?

Loopworm का मॉडल पारंपरिक वेस्ट मैनेजमेंट से बिल्कुल अलग है। कंपनी रेशम उद्योग और अन्य कृषि स्रोतों से निकलने वाले जैविक कचरे को इकट्ठा करती है। फिर सिल्कवर्म और ब्लैक सोल्जर फ्लाई लार्वा की मदद से उसे हाई-प्रोटीन सामग्री में बदलती है।
इस प्रोटीन का इस्तेमाल मुख्य रूप से:
- श्रिम्प फीड
- फिश फीड
- पेट फूड
- पशु आहार
में किया जाता है।
दुनियाभर में फिश मील की कीमतें लगातार बढ़ रही हैं और समुद्री संसाधनों पर दबाव भी बढ़ रहा है। ऐसे में इंसेक्ट-बेस्ड प्रोटीन को भविष्य का बड़ा विकल्प माना जा रहा है।
2022 में मिली सीड फंडिंग, फिर बदली तस्वीर
पायलट प्रोजेक्ट सफल होने के बाद अगस्त 2022 में कंपनी को सीड-स्टेज निवेश मिला। इसके बाद Loopworm ने सालाना 6,000 टन क्षमता वाली आधुनिक मैन्युफैक्चरिंग फैसिलिटी तैयार की।
मार्च 2024 से कंपनी ने कमर्शियल प्रोडक्शन शुरू किया। भारत की बड़ी श्रिम्प फीड कंपनियों ने उनके प्रोडक्ट में रुचि दिखाई और पहली B2B डील मिली।
हालांकि रास्ता आसान नहीं था। सप्लाई चेन तैयार करना, किसानों को जोड़ना और रेगुलेटरी संस्थाओं को नई तकनीक के बारे में समझाना बड़ी चुनौती थी।
अंतरराष्ट्रीय बाजार में मिली पहचान
सितंबर 2024 में कंपनी को EU TRACES और ISO 22000 जैसे अंतरराष्ट्रीय प्रमाणपत्र मिले। इन सर्टिफिकेशन के बाद कंपनी के लिए ग्लोबल मार्केट के दरवाजे खुल गए।
इसके बाद कंपनी ने:
| वर्ष | देश | सेक्टर |
|---|---|---|
| फरवरी 2025 | जर्मनी | एक्सपोर्ट |
| मई 2025 | चिली | साल्मन न्यूट्रिशन |
| नवंबर 2025 | जापान | इंसेक्ट प्रोटीन |
में अपने ऑर्डर भेजे। यह किसी भारतीय इंसेक्ट-बायोटेक स्टार्टअप के लिए बड़ी उपलब्धि मानी जा रही है।
20 टन कचरे की रोज होती है रिसाइक्लिंग

आज Loopworm हर दिन लगभग 20 टन रेशम उद्योग के जैविक कचरे को रिसाइकिल करता है। कंपनी का हाइब्रिड मॉडल खास माना जाता है।
कंपनी का मॉडल कैसे काम करता है?
- प्रोसेसिंग इन-हाउस होती है
- इंसेक्ट फार्मिंग ग्रामीण नेटवर्क को आउटसोर्स की जाती है
- सिल्क रीलर्स और छोटे किसानों को जोड़ा जाता है
इससे ग्रामीण क्षेत्रों में अतिरिक्त आय के अवसर भी बने हैं। कंपनी का दावा है कि इससे जुड़े कई कामगारों की आय में लगभग 10 प्रतिशत तक बढ़ोतरी हुई है।
अब अमेरिका पर नजर
वित्त वर्ष 2025-26 में कंपनी का ARR करीब 20 लाख डॉलर यानी लगभग 16 करोड़ रुपये तक पहुंच गया। अब संस्थापकों का लक्ष्य अगले वित्त वर्ष में इसे 40 लाख डॉलर तक ले जाना है।
कंपनी की लगभग 25 प्रतिशत कमाई एक्सपोर्ट से आ रही है। आने वाले समय में Loopworm अमेरिकी पेट फूड मार्केट में विस्तार की तैयारी कर रही है। साथ ही कंपनी लाइफ साइंसेज सेक्टर के लिए कम लागत वाले रिकॉम्बिनेंट प्रोटीन पर भी काम करना चाहती है।
क्यों खास है यह Success Story?
Loopworm की कहानी सिर्फ एक स्टार्टअप की सफलता नहीं है। यह उस बदलाव की कहानी है, जहां भारत के युवा पारंपरिक नौकरियों से हटकर डीप-टेक और सस्टेनेबल बिजनेस की ओर बढ़ रहे हैं।
एक पुरानी एक्टिवा से शुरू हुआ सफर आज करोड़ों रुपये के ग्लोबल बिजनेस में बदल चुका है। यह दिखाता है कि अगर आइडिया मजबूत हो, समस्या असली हो और मेहनत लगातार हो, तो सीमित संसाधनों के बावजूद बड़ा बिजनेस खड़ा किया जा सकता है।
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