पश्चिम एशिया में जारी तनाव और कच्चे तेल की बढ़ती कीमतों के बीच उद्योग जगत से एक बड़ा और भरोसा बढ़ाने वाला बयान सामने आया है। Sajjan Jindal ने दावा किया है कि मौजूदा भू-राजनीतिक संकट का असर लंबे समय तक नहीं रहेगा। उनका मानना है कि यह स्थिति अधिकतम दो महीने के भीतर सामान्य हो सकती है और भारत की आर्थिक ग्रोथ पर इसका स्थायी प्रभाव नहीं पड़ेगा।
JSW Group के चेयरमैन सज्जन जिंदल ने यह बात Indian Institute of Management Nagpur के 10वें दीक्षांत समारोह के दौरान कही। ऐसे समय में जब अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल की कीमतों में उथल-पुथल देखी जा रही है और निवेशक चिंतित हैं, उनका बयान भारतीय उद्योग जगत के आत्मविश्वास को दिखाता है।
पश्चिम एशिया संकट पर क्या बोले सज्जन जिंदल?
सज्जन जिंदल ने कहा कि पश्चिम एशिया में जारी संघर्ष भारत की इंडस्ट्रियल ग्रोथ के लिए सिर्फ “एक छोटा झटका” है। उनके मुताबिक उद्योग जगत लंबी अवधि की योजनाओं पर काम करता है और अस्थायी वैश्विक संकटों से उसकी रणनीति नहीं बदलती।
उन्होंने कहा कि यह संघर्ष एक सप्ताह, एक महीने या अधिकतम दो महीने तक रह सकता है। भारत की विकास यात्रा रुकने वाली नहीं है। कंपनियां बड़े स्तर पर कैपिटल एक्सपेंडिचर कर रही हैं। भारतीय कंपनियों की बैलेंस शीट पहले के मुकाबले काफी मजबूत हुई हैं। जिंदल का यह बयान इसलिए भी अहम माना जा रहा है क्योंकि पिछले कुछ हफ्तों में पश्चिम एशिया में बढ़े तनाव की वजह से क्रूड ऑयल की कीमतों में तेजी आई है। इससे भारत जैसे आयात-निर्भर देशों पर दबाव बढ़ने की आशंका जताई जा रही है।
भारत की ग्रोथ स्टोरी पर जताया भरोसा
जिंदल ने साफ कहा कि भारतीय उद्योग 20, 25 और यहां तक कि 50 साल आगे की सोचकर निवेश करते हैं। ऐसे में अल्पकालिक भू-राजनीतिक संकट भारत की दीर्घकालिक आर्थिक कहानी को प्रभावित नहीं कर सकते। उन्होंने कहा कि देश में इंफ्रास्ट्रक्चर, मैन्युफैक्चरिंग, स्टील, ऑटोमोबाइल और ग्रीन एनर्जी सेक्टर में भारी निवेश जारी है। यही कारण है कि उद्योग जगत भविष्य को लेकर अभी भी सकारात्मक बना हुआ है।
विशेषज्ञ मानते हैं कि भारत की घरेलू मांग, सरकारी इंफ्रास्ट्रक्चर खर्च और निजी कंपनियों का निवेश मौजूदा समय में अर्थव्यवस्था की सबसे बड़ी ताकत बने हुए हैं। यही वजह है कि वैश्विक अनिश्चितताओं के बावजूद भारत दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में शामिल है।
कैपिटल एक्सपेंडिचर क्यों है अहम?
पिछले कुछ वर्षों में भारतीय कंपनियों ने अपने कर्ज कम किए हैं और बैलेंस शीट मजबूत की है। अब कई बड़े कॉरपोरेट समूह नए प्रोजेक्ट्स में निवेश बढ़ा रहे हैं। इसे ही कैपिटल एक्सपेंडिचर यानी Capex कहा जाता है।
अर्थशास्त्रियों के मुताबिक जब कंपनियां नए प्लांट लगाती हैं, फैक्ट्री विस्तार करती हैं, मशीनरी खरीदती हैं, इंफ्रास्ट्रक्चर में निवेश करती हैं, तो इससे रोजगार, उत्पादन और आर्थिक गतिविधियां बढ़ती हैं।
सज्जन जिंदल का मानना है कि भारत में अभी यही दौर शुरू हो चुका है और आने वाले वर्षों में इसका असर अर्थव्यवस्था पर साफ दिखाई देगा।
पीएम मोदी की अपील पर क्या बोले जिंदल?
प्रधानमंत्री Narendra Modi ने हाल ही में विदेशी मुद्रा बचाने और आयात पर निर्भरता घटाने की जरूरत पर जोर दिया था। इस सवाल पर सज्जन जिंदल ने कहा कि ‘मेक इन इंडिया’ अभियान पहले से ही इस दिशा में बड़ा काम कर रहा है।
उन्होंने कहा कि इलेक्ट्रिक वाहन (EV) सेक्टर भारत के लिए बेहद महत्वपूर्ण है क्योंकि इससे तेल आयात कम करने में मदद मिलेगी। भारत हर साल अरबों डॉलर का कच्चा तेल आयात करता है। अगर इलेक्ट्रिक मोबिलिटी तेजी से बढ़ती है तो इससे विदेशी मुद्रा की बचत हो सकती है।
EV सेक्टर में बड़ा निवेश कर रहा JSW ग्रुप
जिंदल ने बताया कि उनका समूह नागपुर में इलेक्ट्रिक वाहनों के लिए सेल और बैटरी निर्माण पर काम कर रहा है। यह प्रोजेक्ट भारत की EV सप्लाई चेन को मजबूत करने की दिशा में अहम कदम माना जा रहा है।
भारत सरकार भी इलेक्ट्रिक मोबिलिटी को बढ़ावा देने के लिए: FAME योजना, बैटरी मैन्युफैक्चरिंग इंसेंटिव, लोकल मैन्युफैक्चरिंग सपोर्ट, और ग्रीन एनर्जी मिशन जैसी योजनाओं पर तेजी से काम कर रही है।
विशेषज्ञों का मानना है कि आने वाले वर्षों में EV सेक्टर भारत की मैन्युफैक्चरिंग ग्रोथ का बड़ा इंजन बन सकता है।
गढ़चिरौली स्टील प्लांट पर भी दिया अपडेट
सज्जन जिंदल ने महाराष्ट्र के गढ़चिरौली में प्रस्तावित 2.5 करोड़ टन क्षमता वाले स्टील प्लांट पर भी बात की। उन्होंने कहा कि यह क्षेत्र बड़े स्टील कॉम्प्लेक्स के लिए स्वाभाविक स्थान है क्योंकि यहां लौह अयस्क की खदानें पास में मौजूद हैं।
उन्होंने यह भी कहा कि नक्सलवाद की वजह से यह इलाका लंबे समय तक विकास से दूर रहा, लेकिन अब परिस्थितियां बदल रही हैं और उद्योगों के लिए नए अवसर खुल रहे हैं। अगर यह परियोजना पूरी होती है तो हजारों नौकरियां पैदा हो सकती हैं, क्षेत्रीय विकास को गति मिल सकती है, और भारत की स्टील उत्पादन क्षमता में बड़ा इजाफा हो सकता है।
पश्चिम एशिया संकट से भारत को कितना खतरा?
भारत अपनी जरूरत का बड़ा हिस्सा कच्चे तेल के रूप में आयात करता है। ऐसे में पश्चिम एशिया में तनाव बढ़ने पर सबसे पहले असर तेल कीमतों, रुपये, महंगाई, और ट्रांसपोर्ट लागत पर देखने को मिलता है।
हालांकि कई उद्योगपति और अर्थशास्त्री मानते हैं कि भारत की अर्थव्यवस्था अब पहले के मुकाबले ज्यादा मजबूत और विविधतापूर्ण हो चुकी है। इसी वजह से वैश्विक झटकों का असर सीमित रहने की उम्मीद जताई जा रही है।
भारत की अर्थव्यवस्था पर आगे क्या असर दिख सकता है?
अगर पश्चिम एशिया तनाव जल्दी खत्म होता है तो कच्चे तेल की कीमतों में राहत मिल सकती है, महंगाई दबाव कम हो सकता है, और बाजार में स्थिरता लौट सकती है।
लेकिन अगर संकट लंबा खिंचता है तो पेट्रोल-डीजल महंगे हो सकते हैं, लॉजिस्टिक लागत बढ़ सकती है, और आयात बिल पर दबाव आ सकता है। फिलहाल उद्योग जगत का बड़ा हिस्सा यही मान रहा है कि भारत की घरेलू मांग और निवेश क्षमता अर्थव्यवस्था को मजबूती देती रहेगी।
निष्कर्ष
सज्जन जिंदल का बयान ऐसे समय आया है जब दुनिया भू-राजनीतिक तनाव और ऊर्जा संकट की आशंकाओं से जूझ रही है। उनका यह दावा कि पश्चिम एशिया संघर्ष का असर दो महीने से ज्यादा नहीं रहेगा, भारतीय उद्योग जगत के आत्मविश्वास को दर्शाता है।
साथ ही EV, स्टील और मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर में जारी निवेश यह संकेत देता है कि बड़े उद्योग समूह अभी भी भारत की लंबी अवधि की विकास कहानी पर मजबूत भरोसा रखते हैं।
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