भारतीय रुपये पर दबाव लगातार बढ़ता जा रहा है। सरकार ने सोने पर इम्पोर्ट ड्यूटी बढ़ाकर विदेशी मुद्रा के बहाव को नियंत्रित करने की कोशिश की, लेकिन इसके बावजूद रुपये की गिरावट नहीं थमी। बुधवार को भारतीय मुद्रा अमेरिकी डॉलर के मुकाबले अपने इतिहास के सबसे निचले स्तर पर पहुंच गई। कमजोर रुपया अब सिर्फ विदेशी व्यापार या शेयर बाजार का मुद्दा नहीं रह गया है, बल्कि इसका असर महंगाई, पेट्रोल-डीजल, सोने की कीमतों और आम लोगों के खर्च तक पहुंचने लगा है।
नई दिल्ली। भारतीय रुपया बुधवार को अमेरिकी डॉलर के मुकाबले 0.1 फीसदी टूटकर 95.7450 के ऑल टाइम लो पर पहुंच गया। इससे पहले मंगलवार को रुपया 40 पैसे की भारी गिरावट के साथ 95.68 प्रति डॉलर पर बंद हुआ था। कारोबार के दौरान यह 95.7375 तक फिसल गया था।
विदेशी मुद्रा बाजार के आंकड़ों के अनुसार रुपया इस साल अब तक डॉलर के मुकाबले 6.5 फीसदी से ज्यादा कमजोर हो चुका है। यही वजह है कि भारतीय करेंसी इस समय एशिया की सबसे खराब प्रदर्शन करने वाली मुद्राओं में गिनी जा रही है।
इम्पोर्ट ड्यूटी बढ़ी, फिर भी क्यों नहीं संभला रुपया?
सरकार ने सोने पर कस्टम ड्यूटी बढ़ाने का फैसला इसलिए लिया था ताकि सोने के आयात पर लगाम लगाई जा सके। भारत दुनिया के सबसे बड़े गोल्ड इम्पोर्टर्स में शामिल है और भारी आयात के कारण डॉलर की मांग बढ़ती है। सामान्य तौर पर माना जाता है कि गोल्ड इम्पोर्ट कम होने से रुपये को कुछ राहत मिल सकती है। लेकिन इस बार मामला केवल गोल्ड इम्पोर्ट तक सीमित नहीं है। विशेषज्ञों का कहना है कि रुपये पर दबाव के पीछे कई बड़े कारण हैं:
- कच्चे तेल की ऊंची कीमतें
- खाड़ी क्षेत्र में तनाव
- विदेशी निवेशकों की बिकवाली
- डॉलर इंडेक्स की मजबूती
- भारत का बढ़ता आयात बिल
- वैश्विक अनिश्चितता
यानी सरकार का गोल्ड ड्यूटी वाला कदम रुपये को सीमित राहत दे सकता है, लेकिन वैश्विक दबाव फिलहाल ज्यादा भारी पड़ रहा है।
क्यों मजबूत हो रहा है अमेरिकी डॉलर?
अमेरिकी डॉलर इस समय दुनिया की ज्यादातर मुद्राओं के मुकाबले मजबूत बना हुआ है। इसकी सबसे बड़ी वजह अमेरिका में ऊंची ब्याज दरें और सुरक्षित निवेश की बढ़ती मांग मानी जा रही है।
जब वैश्विक बाजारों में अनिश्चितता बढ़ती है, तो निवेशक जोखिम वाले बाजारों से पैसा निकालकर अमेरिकी डॉलर और अमेरिकी बॉन्ड जैसे सुरक्षित विकल्पों की ओर भागते हैं। इससे डॉलर मजबूत हो जाता है और उभरते बाजारों की मुद्राओं पर दबाव बढ़ता है।
भारत जैसे देशों के लिए यह स्थिति ज्यादा चुनौतीपूर्ण हो जाती है क्योंकि उन्हें तेल, इलेक्ट्रॉनिक्स और कई जरूरी वस्तुओं के आयात के लिए डॉलर में भुगतान करना पड़ता है।
एशिया की सबसे कमजोर करेंसीज में क्यों शामिल हुआ रुपया?
इस साल रुपये में 6.5 फीसदी से ज्यादा गिरावट दर्ज की जा चुकी है। मुद्रा विशेषज्ञों का कहना है कि भारतीय अर्थव्यवस्था की मजबूत ग्रोथ के बावजूद बाहरी दबाव रुपये को कमजोर कर रहे हैं।
खासकर:
- तेल की ऊंची कीमतें
- बढ़ता व्यापार घाटा
- विदेशी फंड आउटफ्लो
- आयात आधारित अर्थव्यवस्था
रुपये की कमजोरी को बढ़ा रहे हैं। अगर कच्चे तेल की कीमतें लंबे समय तक ऊंची बनी रहती हैं, तो भारत का इम्पोर्ट बिल और बढ़ सकता है। इससे डॉलर की मांग और तेज होगी।
आम लोगों पर क्या असर पड़ेगा?
कमजोर रुपया सीधे आम लोगों की जेब पर असर डालता है। क्योंकि भारत अपनी जरूरत का बड़ा हिस्सा आयात करता है, इसलिए डॉलर महंगा होने का मतलब है कि विदेश से आने वाली चीजें भी महंगी हो जाएंगी। सबसे ज्यादा असर इन सेक्टर्स पर पड़ सकता है:
1. पेट्रोल-डीजल
भारत कच्चा तेल आयात करता है। रुपया कमजोर होने से तेल कंपनियों की लागत बढ़ती है, जिसका असर ईंधन कीमतों पर पड़ सकता है।
2. इलेक्ट्रॉनिक्स
मोबाइल, लैपटॉप, चिप्स और कई इलेक्ट्रॉनिक उत्पाद महंगे हो सकते हैं।
3. सोना
हालांकि सरकार ने इम्पोर्ट ड्यूटी बढ़ाई है, लेकिन कमजोर रुपया सोने की कीमतों को और ऊपर धकेल सकता है।
4. विदेश यात्रा और पढ़ाई
विदेश में पढ़ाई करने वाले छात्रों और विदेश यात्रा करने वालों के खर्च बढ़ सकते हैं क्योंकि डॉलर खरीदना महंगा हो जाएगा।
RBI क्या कर सकता है?
भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) आमतौर पर रुपये में अत्यधिक उतार-चढ़ाव रोकने के लिए डॉलर बेचकर बाजार में हस्तक्षेप करता है। लेकिन विशेषज्ञों का कहना है कि अगर वैश्विक दबाव लंबे समय तक बना रहता है, तो केवल हस्तक्षेप से रुपये को स्थायी राहत देना मुश्किल हो सकता है।
RBI के पास दुनिया के सबसे बड़े विदेशी मुद्रा भंडारों में से एक है, लेकिन लगातार हस्तक्षेप से रिजर्व पर दबाव भी बढ़ सकता है।
विश्लेषकों का मानना है कि केंद्रीय बैंक फिलहाल रुपये को पूरी तरह गिरने से रोकने की कोशिश करेगा, लेकिन डॉलर की वैश्विक मजबूती के सामने सीमित कमजोरी को स्वीकार भी किया जा सकता है।
क्या 100 रुपये प्रति डॉलर का स्तर संभव है?
कुछ विदेशी ब्रोकरेज और मुद्रा विश्लेषकों ने पहले ही चेतावनी दी है कि अगर:
- तेल की कीमतें और बढ़ती हैं
- वैश्विक तनाव लंबा चलता है
- विदेशी निवेशकों की बिकवाली जारी रहती है
तो आने वाले महीनों में रुपया 100 प्रति डॉलर के मनोवैज्ञानिक स्तर के करीब पहुंच सकता है।
हालांकि कई विशेषज्ञों का यह भी मानना है कि भारत की मजबूत आर्थिक वृद्धि, सेवा निर्यात और RBI का हस्तक्षेप रुपये को पूरी तरह नियंत्रण से बाहर नहीं जाने देगा।
Why It Matters
रुपये की गिरावट केवल करेंसी मार्केट की खबर नहीं है। यह भारत की पूरी अर्थव्यवस्था पर असर डालने वाला संकेत है। कमजोर रुपया महंगाई बढ़ा सकता है, आयात लागत बढ़ा सकता है और आम लोगों की खरीद क्षमता पर दबाव डाल सकता है।
इसके साथ ही यह भी साफ हो रहा है कि वैश्विक बाजारों में बढ़ती अनिश्चितता का असर अब सीधे भारतीय वित्तीय बाजारों और घरेलू अर्थव्यवस्था पर दिखने लगा है।
अगर आने वाले हफ्तों में डॉलर मजबूत बना रहता है और तेल की कीमतों में तेजी जारी रहती है, तो रुपये पर दबाव और बढ़ सकता है। ऐसे में सरकार और RBI दोनों के लिए आर्थिक स्थिरता बनाए रखना बड़ी चुनौती बन सकता है।
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