हैदराबाद, 13 अप्रैल:
तेलंगाना के मुख्यमंत्री A. Revanth Reddy ने महिला आरक्षण और परिसीमन (Delimitation) को लेकर केंद्र सरकार की रणनीति पर सवाल उठाते हुए कहा है कि ये दोनों अलग-अलग मुद्दे हैं और इन्हें एक साथ जोड़कर पेश करना उचित नहीं है। उन्होंने मांग की कि केंद्र सरकार को इस संवेदनशील विषय पर विपक्षी दलों के साथ विस्तृत चर्चा करनी चाहिए, ताकि किसी भी तरह का क्षेत्रीय असंतुलन या राजनीतिक विवाद पैदा न हो।
उनका यह बयान ऐसे समय आया है जब केंद्र सरकार संसद के विशेष सत्र में महिला आरक्षण और परिसीमन से जुड़े प्रस्तावों पर चर्चा की तैयारी कर रही है।
रेवंत रेड्डी का आरोप: “सरकार दोनों मुद्दों को मिला रही है”
A. Revanth Reddy ने कहा कि केंद्र सरकार महिला आरक्षण और परिसीमन को एक साथ जोड़कर यह दिखाने की कोशिश कर रही है कि विपक्ष इन दोनों के खिलाफ है, जबकि वास्तविकता इससे अलग है।
उन्होंने स्पष्ट किया कि कांग्रेस सहित विपक्षी दल महिला आरक्षण का समर्थन करते हैं और इस पर किसी तरह का विवाद नहीं है। लेकिन परिसीमन को लेकर कई गंभीर सवाल हैं, जिन पर व्यापक चर्चा जरूरी है।
उनके अनुसार, सरकार को इस मुद्दे पर राजनीतिक सहमति बनाने की दिशा में काम करना चाहिए, न कि इसे टकराव का विषय बनाना चाहिए।
दक्षिणी राज्यों की चिंता: प्रतिनिधित्व पर असर
रेवंत रेड्डी ने बताया कि दक्षिण भारत के कई मुख्यमंत्रियों ने मिलकर प्रधानमंत्री Narendra Modi को पत्र लिखा है, जिसमें परिसीमन के संभावित प्रभावों को लेकर चिंता जताई गई है।
उनका कहना है कि यदि लोकसभा सीटों का पुनर्वितरण केवल जनसंख्या के आधार पर किया जाता है, तो उत्तर भारत के राज्यों को अधिक लाभ मिल सकता है, जबकि दक्षिणी राज्यों का प्रतिनिधित्व अपेक्षाकृत कम हो सकता है।
उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि यदि वर्तमान प्रस्ताव के अनुसार सीटें बढ़ाई जाती हैं, तो उत्तर प्रदेश जैसे बड़े राज्यों को अधिक सीटें मिल सकती हैं, जबकि केरल जैसे राज्यों को सीमित लाभ होगा। इससे राजनीतिक संतुलन बिगड़ने का खतरा है।
‘हाइब्रिड मॉडल’ का सुझाव
इस असंतुलन को दूर करने के लिए A. Revanth Reddy ने एक “हाइब्रिड मॉडल” का प्रस्ताव रखा है।
उन्होंने सुझाव दिया कि प्रस्तावित सीटों में से 50 प्रतिशत सीटें राज्यों के आर्थिक योगदान यानी GSDP (Gross State Domestic Product) के आधार पर दी जानी चाहिए, जबकि बाकी 50 प्रतिशत सीटें मौजूदा जनसंख्या आधारित फार्मूले के अनुसार दी जा सकती हैं।
उनका मानना है कि इस मॉडल से सभी राज्यों के साथ न्याय हो सकेगा और क्षेत्रीय असंतुलन की आशंका कम होगी।
महिला आरक्षण पर समर्थन, परिसीमन पर सवाल
रेवंत रेड्डी ने यह भी स्पष्ट किया कि महिला आरक्षण को लेकर उनकी पार्टी और अन्य विपक्षी दल पूरी तरह समर्थन में हैं।
उन्होंने कहा कि महिला आरक्षण पर चर्चा की आवश्यकता नहीं है, बल्कि इसे जल्द से जल्द लागू किया जाना चाहिए।
हालांकि, उन्होंने परिसीमन को “राजनीतिक उपकरण” बताते हुए आरोप लगाया कि इसका उपयोग सत्ता संतुलन को प्रभावित करने के लिए किया जा सकता है।
पीएम मोदी का बयान: “नारी शक्ति को समर्पित ऐतिहासिक फैसला”
इस बीच, प्रधानमंत्री Narendra Modi ने ‘नारी शक्ति वंदन’ कार्यक्रम को संबोधित करते हुए कहा कि भारत 21वीं सदी के सबसे बड़े फैसलों में से एक लेने जा रहा है, जो महिलाओं को समर्पित होगा।
उन्होंने कहा कि संसद एक नया इतिहास रचने के करीब है और यह फैसला महिलाओं की भागीदारी को लोकतंत्र में मजबूत करेगा।
प्रधानमंत्री ने 2023 में पारित Nari Shakti Vandan Act का उल्लेख करते हुए कहा कि इसे समय पर लागू करना जरूरी है, ताकि महिलाओं को संसद और विधानसभाओं में उचित प्रतिनिधित्व मिल सके।
महिला आरक्षण: क्या है पूरा मामला
नारी शक्ति वंदन अधिनियम 2023 के तहत लोकसभा और राज्य विधानसभाओं में महिलाओं के लिए 33 प्रतिशत आरक्षण का प्रावधान किया गया है।
हालांकि, इस कानून के लागू होने को परिसीमन प्रक्रिया से जोड़ा गया है, जिसके कारण इसकी समयसीमा को लेकर अनिश्चितता बनी हुई है।
यही कारण है कि विपक्ष यह मांग कर रहा है कि महिला आरक्षण को परिसीमन से अलग कर लागू किया जाए।
परिसीमन (Delimitation) क्या है?
परिसीमन एक संवैधानिक प्रक्रिया है, जिसके तहत जनसंख्या के आधार पर निर्वाचन क्षेत्रों की सीमाएं और सीटों की संख्या तय की जाती है।
भारत में आखिरी बार परिसीमन 2008 में लागू हुआ था। इसके बाद से जनसंख्या में काफी बदलाव आया है, जिसके कारण अब नए परिसीमन की जरूरत महसूस की जा रही है।
लेकिन यह प्रक्रिया राजनीतिक रूप से बेहद संवेदनशील है, क्योंकि इससे राज्यों के बीच प्रतिनिधित्व का संतुलन बदल सकता है।
क्यों बढ़ा है विवाद?
इस पूरे मुद्दे का विवाद इसलिए बढ़ा है क्योंकि महिला आरक्षण के क्रियान्वयन को परिसीमन से जोड़ दिया गया है।
विपक्ष का तर्क है कि इससे महिला आरक्षण लागू होने में देरी हो सकती है, जबकि सरकार का कहना है कि यह प्रक्रिया संवैधानिक रूप से आवश्यक है।
इसके अलावा, दक्षिण और उत्तर भारत के बीच प्रतिनिधित्व के असंतुलन की आशंका ने इस बहस को और जटिल बना दिया है।
इस मुद्दे का बड़ा असर क्या हो सकता है? (विश्लेषण)
यह मुद्दा केवल एक विधायी प्रक्रिया नहीं, बल्कि भारत के संघीय ढांचे और राजनीतिक संतुलन से जुड़ा हुआ है।
पहला, अगर महिला आरक्षण लागू होता है, तो संसद और विधानसभाओं में महिलाओं की संख्या में बड़ा इजाफा होगा, जिससे नीति निर्माण में विविधता बढ़ेगी।
दूसरा, परिसीमन के कारण कई राज्यों की राजनीतिक ताकत बदल सकती है, जिससे राष्ट्रीय राजनीति का समीकरण प्रभावित हो सकता है।
तीसरा, यदि इस पर राजनीतिक सहमति नहीं बनती, तो यह मुद्दा केंद्र और राज्यों के बीच टकराव का कारण बन सकता है।
आगे क्या?
अब सभी की नजर 16 अप्रैल से शुरू होने वाले संसद के विशेष सत्र पर है, जहां इन दोनों मुद्दों पर चर्चा होने की संभावना है।
यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि सरकार विपक्ष को साथ लेकर आगे बढ़ती है या यह मुद्दा राजनीतिक विवाद का रूप ले लेता है।
निष्कर्ष
महिला आरक्षण और परिसीमन को लेकर जारी बहस यह दिखाती है कि भारत में बड़े संवैधानिक फैसले केवल कानून बनाने से नहीं, बल्कि व्यापक राजनीतिक सहमति से ही संभव होते हैं।
A. Revanth Reddy की मांग और Narendra Modi के संकेत इस बात को दर्शाते हैं कि आने वाले दिनों में यह मुद्दा भारतीय राजनीति के केंद्र में रहेगा।
अगर इस पर संतुलित और सहमति आधारित फैसला लिया जाता है, तो यह भारत के लोकतंत्र को और मजबूत कर सकता है।
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