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रिजर्व बैंक ने दी बड़ी राहत, अब बैंकों को नहीं रखना होगा ‘इमरजेंसी बफर फंड’; जानिए ग्राहकों और बैंकिंग सेक्टर पर क्या पड़ेगा असर

Namam Sharma
Last updated: 2026/06/27 at 11:06 अपराह्न
Namam Sharma - Senior Editor – Newsjagran
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8 Min Read
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नई दिल्ली। भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) ने देश के बैंकिंग सेक्टर को बड़ी राहत देते हुए वाणिज्यिक बैंकों के लिए ‘निवेश उतार-चढ़ाव रिजर्व’ (Investment Fluctuation Reserve- IFR) बनाए रखने की अनिवार्यता समाप्त कर दी है। यह फैसला 18 मई 2026 से लागू हो गया है।

Contents
आखिर क्या होता है IFR?RBI ने नियम खत्म क्यों किया?बैंकों को क्या फायदा होगा?1. मुनाफे में सुधार संभव2. लोन देने की क्षमता बढ़ सकती है3. बैलेंस शीट होगी मजबूतग्राहकों पर क्या असर पड़ेगा?संभावित फायदेविदेशी बैंकों के लिए क्या नियम हैं?छोटे वित्त और भुगतान बैंकों के लिए अलग निर्देशक्या इससे बैंकिंग सिस्टम पर जोखिम बढ़ेगा?पहले भी जारी किया गया था ड्राफ्टक्या शेयर बाजार पर असर पड़ेगा?निष्कर्ष

आरबीआई का यह कदम ऐसे समय आया है जब बैंकिंग सेक्टर पहले से ही बदलते ब्याज दर चक्र, बॉन्ड यील्ड में उतार-चढ़ाव और निवेश पोर्टफोलियो से जुड़े नए नियमों के बीच काम कर रहा है। केंद्रीय बैंक का मानना है कि बाजार जोखिम और निवेश प्रबंधन के लिए अब पर्याप्त रेगुलेटरी फ्रेमवर्क मौजूद हैं, इसलिए अलग से IFR रखने की जरूरत नहीं रह गई है।

यह फैसला सिर्फ बैंकों के लिए राहत नहीं है, बल्कि इससे उनकी बैलेंस शीट, मुनाफे और लोन देने की क्षमता पर भी सकारात्मक असर देखने को मिल सकता है।

आखिर क्या होता है IFR?

Investment Fluctuation Reserve यानी IFR एक तरह का अतिरिक्त सुरक्षा फंड होता था, जिसे बैंक अपने निवेश पोर्टफोलियो में संभावित नुकसान से बचने के लिए अलग रखते थे।

जब बैंक सरकारी बॉन्ड, ट्रेजरी बिल या अन्य निवेश साधनों में पैसा लगाते हैं, तो बाजार में ब्याज दरों के बदलाव के कारण इन निवेशों की कीमत ऊपर-नीचे होती रहती है। यदि बॉन्ड की कीमत गिरती थी, तो बैंक को संभावित नुकसान का खतरा रहता था। इसी जोखिम से बचाव के लिए RBI ने IFR रखने का नियम बनाया था।

सरल शब्दों में समझें तो यह बैंकों का “इमरजेंसी बफर फंड” था, जिसे निवेश नुकसान की स्थिति में इस्तेमाल किया जा सकता था।

RBI ने नियम खत्म क्यों किया?

RBI ने ‘Commercial Banks – Classification, Valuation and Operation of Investment Portfolio (Second Amendment) Directions, 2026’ जारी करते हुए कहा कि बाजार जोखिम और निवेश प्रबंधन से जुड़े नियमों में काफी बदलाव हो चुके हैं।

अब बैंकों के लिए मार्क-टू-मार्केट (MTM) नियम ज्यादा सख्त हैं, निवेश पोर्टफोलियो की निगरानी बेहतर हुई है, पूंजी पर्याप्तता (Capital Adequacy) के नियम मजबूत हुए हैं, जोखिम प्रबंधन प्रणाली पहले से अधिक विकसित हो चुकी है इसी वजह से RBI ने माना कि IFR जैसी अलग रिजर्व व्यवस्था अब जरूरी नहीं रह गई है।

बैंकों को क्या फायदा होगा?

इस फैसले से बैंकों को कई स्तर पर राहत मिल सकती है।

1. मुनाफे में सुधार संभव

अब बैंकों को निवेश जोखिम के लिए अलग से बड़ी राशि रिजर्व में नहीं रखनी होगी। इससे उनके पास अधिक पूंजी उपलब्ध रहेगी, जो सीधे मुनाफे को मजबूत कर सकती है।

2. लोन देने की क्षमता बढ़ सकती है

जो पैसा पहले IFR में ब्लॉक रहता था, उसे अब बैंक दूसरे कामों में इस्तेमाल कर सकेंगे। इससे कॉरपोरेट लोन, रिटेल लोन, MSME फाइनेंसिंग में तेजी आ सकती है।

3. बैलेंस शीट होगी मजबूत

विशेषज्ञों का मानना है कि इससे कई बैंकों की नेटवर्थ और रिजर्व स्ट्रक्चर ज्यादा लचीला बनेगा।

ग्राहकों पर क्या असर पड़ेगा?

सीधे तौर पर आम ग्राहकों को तुरंत कोई बड़ा बदलाव नजर नहीं आएगा, लेकिन लंबे समय में इसका असर दिख सकता है।

संभावित फायदे

  • लोन वितरण बढ़ सकता है
  • ब्याज दरों में प्रतिस्पर्धा बढ़ सकती है
  • बैंक ज्यादा आक्रामक तरीके से क्रेडिट ग्रोथ कर सकते हैं
  • निवेश और इंफ्रास्ट्रक्चर सेक्टर को फंडिंग बढ़ सकती है

हालांकि, यह पूरी तरह इस बात पर निर्भर करेगा कि बैंक अतिरिक्त पूंजी का इस्तेमाल किस तरह करते हैं।

विदेशी बैंकों के लिए क्या नियम हैं?

RBI ने कहा है कि भारत में शाखा मॉडल के तहत काम कर रहे विदेशी बैंकों के मामले में IFR की बची हुई राशि भारतीय खातों में रखे वैधानिक रिजर्व या ऐसे अधिशेष में स्थानांतरित की जाएगी, जिसे बैंक भारत में संचालन के दौरान देश से बाहर नहीं भेज सकेंगे।

इसका मकसद यह सुनिश्चित करना है कि भारतीय बैंकिंग प्रणाली में मौजूद पूंजी देश के भीतर ही बनी रहे।

छोटे वित्त और भुगतान बैंकों के लिए अलग निर्देश

केंद्रीय बैंक ने Small Finance Banks (SFBs), Payment Banks, Co-operative Banks के लिए अलग-अलग परिपत्र भी जारी किए हैं।

RBI ने स्पष्ट किया कि छोटे वित्त बैंकों और भुगतान बैंकों के मामले में IFR में राशि का हस्तांतरण अनिवार्य विनियोजन के बाद शुद्ध लाभ से किया जाएगा।

क्या इससे बैंकिंग सिस्टम पर जोखिम बढ़ेगा?

कुछ विशेषज्ञ मानते हैं कि IFR हटाने से बैंकों को ज्यादा वित्तीय स्वतंत्रता मिलेगी, लेकिन इससे बाजार जोखिम का दबाव भी बढ़ सकता है, खासकर तब जब बॉन्ड मार्केट में बड़ी अस्थिरता हो।

हालांकि RBI का तर्क है कि वर्तमान पूंजी नियम, जोखिम प्रबंधन प्रणाली, निवेश वर्गीकरण मानक पहले से काफी मजबूत हैं, इसलिए अतिरिक्त रिजर्व की आवश्यकता नहीं है।

पहले भी जारी किया गया था ड्राफ्ट

RBI ने इस बदलाव से पहले मसौदा नियम जारी कर हितधारकों से सुझाव मांगे थे। बैंकिंग उद्योग लंबे समय से IFR नियमों में ढील की मांग कर रहा था, क्योंकि इससे बैंकों की पूंजी का एक हिस्सा लंबे समय तक रिजर्व में फंसा रहता था।

अब अंतिम नियम लागू होने के बाद बैंकिंग सेक्टर को बड़ी राहत मिलने की उम्मीद है।

क्या शेयर बाजार पर असर पड़ेगा?

विश्लेषकों का मानना है कि इस फैसले का असर बैंकिंग शेयरों पर सकारात्मक दिख सकता है। जिन बैंकों के पास बड़ा निवेश पोर्टफोलियो है, उन्हें इससे अधिक लाभ मिल सकता है।

विशेष रूप से सरकारी बैंक, बड़े निजी बैंक, बॉन्ड निवेश में सक्रिय बैंक इससे फायदा उठा सकते हैं।

निष्कर्ष

RBI का IFR खत्म करने का फैसला भारतीय बैंकिंग सेक्टर के लिए एक बड़ा नीतिगत बदलाव माना जा रहा है। इससे बैंकों की पूंजी पर दबाव कम होगा और वे अधिक आक्रामक तरीके से क्रेडिट ग्रोथ पर फोकस कर पाएंगे।

हालांकि बाजार जोखिम पूरी तरह खत्म नहीं हुए हैं, लेकिन RBI का भरोसा है कि मौजूदा नियामकीय ढांचा इन जोखिमों को संभालने के लिए पर्याप्त मजबूत है। आने वाले महीनों में यह देखना अहम होगा कि बैंक इस अतिरिक्त वित्तीय लचीलापन का इस्तेमाल किस तरह करते हैं।

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नमम शर्मा, Newsjagran के सीनियर एडिटर हैं। बिज़नेस न्यूज़, कमोडिटी बाज़ार, सोना-चांदी भाव, पेट्रोल-डीजल रेट और फाइनेंस में 9 साल का अनुभव। हिंदी डिजिटल पत्रकारिता के जानकार।
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