नई दिल्ली, 29 अप्रैल: देश की ऑयल मार्केटिंग कंपनियों (OMCs) पर बढ़ती अंतरराष्ट्रीय कच्चे तेल की कीमतों का भारी दबाव देखने को मिल रहा है। मौजूदा स्थिति में कंपनियां पेट्रोल और डीजल को लागत से काफी कम दाम पर बेच रही हैं, जिससे बड़े स्तर पर घाटा दर्ज किया जा रहा है।
पेट्रोल-डीजल पर कितना घाटा?
रिपोर्ट के अनुसार:
- पेट्रोल पर लगभग ₹14 प्रति लीटर का नुकसान
- डीजल पर लगभग ₹18 प्रति लीटर का नुकसान
यह घाटा इसलिए बढ़ रहा है क्योंकि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर क्रूड ऑयल की कीमतें बढ़ रही हैं, जबकि घरेलू रिटेल फ्यूल कीमतें नियंत्रित (capped) हैं।
क्यों बढ़ रहा है दबाव?
तेल कंपनियों के मार्जिन पर दबाव के पीछे मुख्य कारण हैं:
- कच्चे तेल की वैश्विक कीमतों में तेजी
- घरेलू ईंधन कीमतों का सीमित दायरा
- पश्चिम एशिया में भू-राजनीतिक तनाव
- सप्लाई चेन में बाधाएं
LPG और उर्वरक पर बड़ा वित्तीय बोझ
रेटिंग एजेंसी ICRA के अनुसार, स्थिति सिर्फ पेट्रोल-डीजल तक सीमित नहीं है:
LPG (Cooking Gas):
- इस वित्त वर्ष में लगभग ₹80,000 करोड़ का अंडर-रिकवरी अनुमान
Fertiliser Subsidy:
- बढ़कर ₹2.05 लाख करोड़ से ₹2.25 लाख करोड़ तक पहुंचने का अनुमान
स्ट्रेट ऑफ होर्मुज संकट का असर
ICRA ने बताया कि स्ट्रेट ऑफ होर्मुज में सप्लाई बाधाओं का बड़ा असर पड़ रहा है।
यह मार्ग वैश्विक तेल और LNG ट्रेड का लगभग 20% हिस्सा संभालता है, और यहां किसी भी तरह की रुकावट का असर सीधे ऊर्जा बाजार पर पड़ता है।
ऊर्जा बाजार पर व्यापक असर
इस स्थिति का प्रभाव सिर्फ तेल कंपनियों तक सीमित नहीं है:
- पेट्रोकेमिकल्स की लागत बढ़ रही है
- खाद्य और कृषि सेक्टर पर उर्वरक सब्सिडी का बोझ बढ़ रहा है
- ट्रांसपोर्ट और लॉजिस्टिक्स लागत बढ़ रही है
- महंगाई (Inflation) पर दबाव बन सकता है
सरकार और कंपनियों के सामने चुनौती
आने वाले समय में नीति निर्माताओं और ऑयल कंपनियों के लिए प्रमुख चुनौतियां होंगी:
- ईंधन कीमतों को संतुलित रखना
- कंपनियों के घाटे को कम करना
- सब्सिडी बोझ को मैनेज करना
- ऊर्जा सुरक्षा सुनिश्चित करना
निष्कर्ष
बढ़ती वैश्विक तेल कीमतों और भू-राजनीतिक तनाव के बीच देश की ऑयल मार्केटिंग कंपनियां भारी वित्तीय दबाव का सामना कर रही हैं। पेट्रोल और डीजल पर लगातार हो रहे नुकसान के साथ-साथ LPG और फर्टिलाइज़र सब्सिडी का बढ़ता बोझ अर्थव्यवस्था के लिए एक बड़ी चुनौती बनता जा रहा है।
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