दुनिया की कई बड़ी अर्थव्यवस्थाएं आने वाले वर्षों में एक नई चुनौती का सामना करने वाली हैं। OECD (Organisation for Economic Co-operation and Development) देशों में तेजी से बढ़ती उम्रदराज आबादी अब लेबर मार्केट और आर्थिक विकास के लिए बड़ा मुद्दा बनती जा रही है।
एक रिपोर्ट के मुताबिक, अगर कंपनियां और सरकारें उम्र के आधार पर होने वाले भेदभाव को कम नहीं करती हैं, तो वर्ष 2040 तक OECD देशों को करीब 500 अरब डॉलर यानी लगभग 48 लाख करोड़ रुपये की प्रोडक्टिविटी का नुकसान उठाना पड़ सकता है।
यह अनुमान वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम (WEF) और मार्श की रिपोर्ट में दिया गया है। रिपोर्ट में कहा गया है कि अनुभवी कर्मचारियों को नजरअंदाज करना आने वाले समय में अर्थव्यवस्थाओं के लिए महंगा साबित हो सकता है।
क्या है OECD और क्यों है यह रिपोर्ट महत्वपूर्ण?
OECD दुनिया के उच्च आय वाले देशों का एक समूह है, जिसमें कुल 38 सदस्य देश शामिल हैं। यह संगठन आर्थिक नीतियों, व्यापार, रोजगार और विकास से जुड़े मुद्दों पर मिलकर काम करता है।
इन देशों में अमेरिका, जापान, ब्रिटेन, फ्रांस, कनाडा जैसे दुनिया की प्रमुख अर्थव्यवस्थाएं शामिल हैं।
रिपोर्ट के अनुसार, इन देशों में जनसंख्या का स्वरूप तेजी से बदल रहा है। कामकाजी उम्र के लोगों की तुलना में बुजुर्ग आबादी तेजी से बढ़ रही है, जिससे कंपनियों को भविष्य में कुशल कर्मचारियों की कमी का सामना करना पड़ सकता है।
2040 तक 500 अरब डॉलर की प्रोडक्टिविटी लॉस का अनुमान
रिपोर्ट में बताया गया है कि 55 साल और उससे अधिक उम्र के कर्मचारियों को नौकरी के अवसरों में भेदभाव का सामना करना पड़ता है। इसके कारण कई अनुभवी कर्मचारी लंबे समय तक बेरोजगार रहते हैं या फिर लेबर मार्केट से बाहर हो जाते हैं।
इसका सीधा असर आर्थिक उत्पादकता पर पड़ता है।
रिपोर्ट के अनुसार:
- 2040 तक OECD देशों को करीब 500 अरब डॉलर की उत्पादकता हानि हो सकती है।
- उम्रदराज कर्मचारियों के रोजगार से बाहर होने की वजह से कंपनियों को अनुभवी प्रतिभा का नुकसान होगा।
- कई देशों में युवा कर्मचारियों की संख्या इतनी तेजी से नहीं बढ़ रही है कि वे इस कमी को पूरा कर सकें।
दुनिया में तेजी से बढ़ रही बुजुर्ग आबादी
रिपोर्ट के मुताबिक, वैश्विक स्तर पर उम्रदराज आबादी में तेज बढ़ोतरी देखने को मिल रही है।
अनुमान है कि:
- वर्ष 2040 तक 65 साल या उससे अधिक उम्र की आबादी 85.6 करोड़ से बढ़कर करीब 1.3 अरब हो सकती है।
- यह वृद्धि 50 फीसदी से ज्यादा होगी।
- वहीं 25 से 64 साल की कामकाजी उम्र वाली आबादी में केवल लगभग 13 फीसदी वृद्धि का अनुमान है।
इस बदलते जनसांख्यिकीय ढांचे से रोजगार बाजार पर दबाव बढ़ सकता है।
अमेरिका और फ्रांस को सबसे ज्यादा नुकसान का खतरा
रिपोर्ट में प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं पर पड़ने वाले आर्थिक प्रभाव का भी अनुमान लगाया गया है।
2025 से 2040 के बीच उम्रदराज कर्मचारियों की बेरोजगारी और कम रोजगार के कारण:
| देश | अनुमानित GDP नुकसान |
|---|---|
| अमेरिका | 113 अरब डॉलर |
| फ्रांस | 106 अरब डॉलर |
| ब्राजील | 105.8 अरब डॉलर |
| नीदरलैंड | 26.3 अरब डॉलर |
| ब्रिटेन | 25.6 अरब डॉलर |
| कनाडा | 7.5 अरब डॉलर |
| जापान | 5.9 अरब डॉलर |
हालांकि रिपोर्ट का कहना है कि वास्तविक नुकसान इससे भी ज्यादा हो सकता है, क्योंकि कई लोग लंबे समय तक नौकरी नहीं मिलने के बाद रोजगार तलाशना ही बंद कर देते हैं। ऐसे लोग बेरोजगारी के आधिकारिक आंकड़ों में शामिल नहीं होते।
उम्र आधारित भेदभाव से स्वास्थ्य पर भी असर
रिपोर्ट में केवल आर्थिक नुकसान की बात नहीं की गई है, बल्कि उम्र आधारित भेदभाव (Ageism) के स्वास्थ्य प्रभावों पर भी चिंता जताई गई है।
रिपोर्ट के अनुसार, अमेरिका में उम्र के आधार पर भेदभाव को करीब 1.7 करोड़ स्वास्थ्य समस्याओं के मामलों से जोड़ा गया है।
साल 2018 में इससे स्वास्थ्य सेवाओं पर कम से कम 63 अरब डॉलर अतिरिक्त खर्च होने का अनुमान लगाया गया था।
रिसर्च में यह भी पाया गया कि उम्र आधारित भेदभाव से:
- मानसिक तनाव और डिप्रेशन बढ़ सकता है।
- शारीरिक स्वास्थ्य प्रभावित हो सकता है।
- स्वास्थ्य सुविधाओं तक पहुंच कम हो सकती है।
उम्रदराज कर्मचारियों को बोझ नहीं, ताकत मानने की जरूरत
WEF की रिपोर्ट में कहा गया है कि कंपनियों को उम्र बढ़ने को जोखिम के रूप में देखने के बजाय इसे एक अवसर की तरह अपनाना चाहिए।
अनुभवी कर्मचारियों के पास:
- लंबे समय का उद्योग अनुभव होता है।
- निर्णय लेने की क्षमता बेहतर होती है।
- वे युवा कर्मचारियों को प्रशिक्षण और मार्गदर्शन दे सकते हैं।
रिपोर्ट के अनुसार, अलग-अलग उम्र के कर्मचारियों वाली टीमें ज्यादा इनोवेशन और बेहतर ज्ञान साझा करने में सक्षम होती हैं।
युवा कर्मचारी नई डिजिटल तकनीक सीखते हैं, जबकि अनुभवी कर्मचारी अपने अनुभव से संगठन को मजबूत बनाते हैं।
कई देशों ने शुरू की उम्रदराज कर्मचारियों के लिए नीतियां
कुछ देशों ने उम्र बढ़ने वाली आबादी को देखते हुए रोजगार नीतियों में बदलाव शुरू कर दिए हैं।
दक्षिण कोरिया
दक्षिण कोरिया ने 55 से 64 साल के लोगों के बीच करीब 70 फीसदी रोजगार दर हासिल की है।
जापान
जापान ने पिछले दो दशकों में 65 साल से अधिक उम्र के लोगों के रोजगार में लगातार बढ़ोतरी दर्ज की है।
स्वीडन
स्वीडन में लोगों को काम जारी रखते हुए पेंशन का कुछ हिस्सा लेने की सुविधा दी जाती है।
इन देशों का लक्ष्य है कि अनुभवी कर्मचारियों को अर्थव्यवस्था में सक्रिय बनाए रखा जाए।
भारत के लिए क्या है संदेश?
हालांकि भारत अभी दुनिया के सबसे युवा देशों में शामिल है, लेकिन OECD रिपोर्ट भारत के लिए भी एक महत्वपूर्ण संकेत देती है।
भारत के पास इस समय डेमोग्राफिक डिविडेंड यानी बड़ी युवा आबादी का फायदा उठाने का अवसर है। लेकिन भविष्य में जब आबादी की औसत उम्र बढ़ेगी, तब अनुभवी कर्मचारियों को लेकर सही नीतियां बनाना जरूरी होगा।
भारत को यह सुनिश्चित करना होगा कि:
- उम्र के आधार पर प्रतिभा को नजरअंदाज न किया जाए।
- अनुभवी कर्मचारियों के कौशल का इस्तेमाल किया जाए।
- कंपनियां उम्र के हिसाब से समावेशी कार्यस्थल तैयार करें।
- वरिष्ठ कर्मचारियों को नई तकनीक और डिजिटल स्किल्स से जोड़ा जाए।
क्योंकि आर्थिक विकास केवल युवा आबादी से नहीं, बल्कि हर उम्र के कुशल और अनुभवी लोगों की भागीदारी से मजबूत होता है।
निष्कर्ष
OECD देशों के लिए बढ़ती उम्र की आबादी आने वाले वर्षों में बड़ी आर्थिक चुनौती बन सकती है। 2040 तक 500 अरब डॉलर की संभावित प्रोडक्टिविटी लॉस इस बात का संकेत है कि दुनिया को रोजगार बाजार में उम्र आधारित सोच बदलनी होगी।
भारत के लिए यह समय रहते सीख लेने का अवसर है। युवा आबादी का लाभ उठाने के साथ-साथ अनुभवी कार्यबल को बनाए रखना देश की भविष्य की आर्थिक मजबूती के लिए बेहद जरूरी होगा।


