आज के कॉर्पोरेट दौर में देर रात तक काम करना, ऑफिस के बाद भी ईमेल और कॉल्स पर उपलब्ध रहना और वीकेंड पर भी काम करना कई कर्मचारियों की दिनचर्या बन चुका है। ऐसे माहौल में न्यूजीलैंड में काम कर रही एक भारतीय महिला का अनुभव सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो रहा है। उन्होंने बताया कि वहां कर्मचारियों को सिर्फ काम करने वाली मशीन नहीं, बल्कि इंसान के तौर पर देखा जाता है। यही वजह है कि वहां का वर्क कल्चर लोगों का ध्यान खींच रहा है।
भारतीय महिला ने शेयर किया अनुभव
न्यूजीलैंड में काम कर रहीं भारतीय प्रोफेशनल यामिका गांधी ने इंस्टाग्राम पर एक वीडियो साझा कर वहां के ऑफिस कल्चर के बारे में बताया। उन्होंने कहा कि न्यूजीलैंड में छोटी-छोटी बातों का भी महत्व दिया जाता है और कर्मचारियों की मेहनत की खुलकर सराहना की जाती है।
उनका कहना है कि भारत और न्यूजीलैंड के कार्यस्थल के माहौल में काफी अंतर है। जहां कई जगह लंबे समय तक ऑफिस में रुकने को मेहनत की निशानी माना जाता है, वहीं न्यूजीलैंड में समय पर काम खत्म कर घर जाना सामान्य बात है।
एक ‘थैंक यू’ मैसेज ने कर दिया हैरान
यामिका ने बताया कि एक शुक्रवार शाम करीब 4 बजे उन्होंने एक जरूरी काम पूरा किया। इसके बाद उनके एक सहकर्मी ने उन्हें मैसेज भेजा—
“Thank you Yamika, I really appreciate your work.”
यामिका के मुताबिक, यह उनके लिए हैरानी की बात थी क्योंकि उन्हें लगा कि उन्होंने केवल अपनी जिम्मेदारी निभाई थी। लेकिन न्यूजीलैंड में सहकर्मी छोटी उपलब्धियों और अच्छे काम की भी खुलकर तारीफ करते हैं।
“काम खत्म हो गया? अब घर जाइए”
यामिका ने बताया कि उनके सहकर्मी अक्सर कहते हैं कि अगर दिन का काम पूरा हो गया है तो ऑफिस में रुकने की जरूरत नहीं है। वे कर्मचारियों को परिवार, दोस्तों और अपनी निजी जिंदगी के लिए समय निकालने के लिए प्रोत्साहित करते हैं।
उन्होंने यह भी बताया कि कंपनी में शामिल होते समय ही उनके मैनेजर ने स्पष्ट कर दिया था कि सप्ताह में 40 घंटे से अधिक काम करने की आवश्यकता नहीं है। यदि किसी प्रोजेक्ट या डेडलाइन के कारण अतिरिक्त समय देना पड़े, तो बाद में छुट्टी लेकर उसकी भरपाई की जा सकती है।
यहां घंटों नहीं, काम की गुणवत्ता मायने रखती है
यामिका का कहना है कि न्यूजीलैंड में कर्मचारियों का मूल्यांकन इस आधार पर नहीं होता कि उन्होंने कितने घंटे ऑफिस में बिताए, बल्कि इस बात पर होता है कि उन्होंने अपने काम को कितनी अच्छी तरह पूरा किया।
उन्होंने भारत के कुछ कार्यस्थलों का उदाहरण देते हुए कहा कि कई जगह कर्मचारियों से ऑफिस समय के बाद भी उपलब्ध रहने और वीकेंड पर काम करने की उम्मीद की जाती है। हालांकि, उन्होंने यह भी माना कि सभी भारतीय कंपनियों का माहौल एक जैसा नहीं होता और कई संस्थानों में बेहतरीन वर्क कल्चर भी देखने को मिलता है।
कर्मचारी की जरूरतों को भी मिलती है अहमियत
यामिका के अनुसार, न्यूजीलैंड में अगर किसी कर्मचारी का प्रदर्शन कमजोर होता है, तो उसे तुरंत बदलने के बजाय उसकी समस्या समझने और सुधार का मौका देने की कोशिश की जाती है।
वहां कर्मचारियों की मानसिक सेहत, निजी जीवन और कार्य संतुलन को भी उतनी ही अहमियत दी जाती है जितनी उनके प्रदर्शन को।
सोशल मीडिया पर छिड़ी बहस
यामिका की वीडियो पर कई लोगों ने अपनी राय साझा की। कुछ यूजर्स ने कहा कि बेहतर वर्क कल्चर से कर्मचारियों की उत्पादकता और मानसिक स्वास्थ्य दोनों बेहतर होते हैं। वहीं कुछ लोगों ने यह भी कहा कि सिर्फ तारीफ करना काफी नहीं, बल्कि सम्मानजनक माहौल, उचित कार्य विभाजन और संतुलित कार्यभार भी उतना ही जरूरी है।
वर्क-लाइफ बैलेंस पर फिर शुरू हुई चर्चा
यामिका गांधी का अनुभव एक बार फिर इस सवाल को सामने लाता है कि क्या लंबे समय तक काम करना ही मेहनत की पहचान है, या फिर बेहतर प्रदर्शन के साथ कर्मचारियों को निजी जीवन के लिए पर्याप्त समय मिलना भी उतना ही महत्वपूर्ण है।
उनकी कहानी यह दिखाती है कि सकारात्मक कार्य संस्कृति, समय पर सम्मान और कर्मचारियों के प्रति संवेदनशील रवैया न केवल काम की गुणवत्ता बढ़ाता है, बल्कि कर्मचारियों की संतुष्टि और मानसिक स्वास्थ्य पर भी सकारात्मक प्रभाव डालता है।


