Highlights
- IVPA और चीन के CFNA के बीच शंघाई में MoU पर हस्ताक्षर।
- भारत-चीन के खाद्य तेल व्यापार को मिलेगा नया बढ़ावा।
- सोयाबीन तेल आयात और भारतीय डेरिवेटिव्स निर्यात बढ़ने की उम्मीद।
- वैश्विक तिलहन और वनस्पति तेल बाजार में स्थिरता लाने पर जोर।
नई दिल्ली। भारत के खाद्य तेल उद्योग के लिए एक महत्वपूर्ण कदम उठाते हुए इंडियन वेजिटेबल ऑयल प्रोड्यूसर्स एसोसिएशन (IVPA) ने चीन के चाइना चैंबर ऑफ कॉमर्स ऑफ फूडस्टफ्स एंड नेटिव प्रोड्यूस (CFNA) के साथ एक महत्वपूर्ण मेमोरेंडम ऑफ अंडरस्टैंडिंग (MoU) पर हस्ताक्षर किए हैं। यह समझौता 1 जुलाई 2026 को शंघाई में आयोजित CCOC 17 कॉन्फ्रेंस के दौरान हुआ।
इस समझौते का उद्देश्य भारत और चीन के बीच खाद्य तेल एवं तिलहन क्षेत्र में व्यापारिक सहयोग को मजबूत करना, उद्योगों के बीच साझेदारी बढ़ाना और वैश्विक सप्लाई चेन को अधिक स्थिर एवं टिकाऊ बनाना है।
दोनों देशों के बीच व्यापारिक संबंध होंगे मजबूत
IVPA और CFNA के बीच हुए इस समझौते के तहत दोनों देशों के उद्योगों के बीच नियमित संवाद, Buyer-Seller Meets, बाजार संबंधी जानकारी का आदान-प्रदान और दीर्घकालिक व्यापारिक सहयोग को बढ़ावा दिया जाएगा।
इस पहल से खाद्य तेल व्यापार में आने वाली चुनौतियों को कम करने और सप्लाई चेन को अधिक प्रभावी बनाने में मदद मिलने की उम्मीद है। साथ ही वैश्विक वनस्पति तेल उद्योग में स्थिरता और भविष्य की आवश्यकताओं को ध्यान में रखते हुए नई रणनीतियों पर भी काम किया जाएगा।
दुनिया के दो सबसे बड़े उपभोक्ता आए साथ
IVPA के अध्यक्ष सुधाकर देसाई ने कहा कि यह समझौता भारत और चीन के खाद्य तेल उद्योगों के बीच द्विपक्षीय सहयोग को नई दिशा देगा।
उन्होंने कहा कि भारत और चीन दुनिया के सबसे बड़े वनस्पति तेल उपभोक्ताओं में शामिल हैं। ऐसे में दोनों देशों का सहयोग वैश्विक मांग, व्यापारिक प्रवाह और खाद्य तेल उद्योग के भविष्य को प्रभावित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा।
चीन से बढ़ रहा है सोयाबीन तेल का आयात
सुधाकर देसाई के अनुसार, अर्जेंटीना और ब्राजील के बाद अब चीन भारत के लिए कच्चे सोयाबीन तेल का प्रमुख सप्लायर बनकर उभरा है।
वर्तमान अनुमान के मुताबिक तेल वर्ष 2025-26 में भारत लगभग 5 से 5.5 मिलियन टन सोयाबीन तेल आयात कर सकता है। वहीं पाम तेल का आयात 8 से 8.5 मिलियन टन रहने का अनुमान है।
विशेषज्ञों का मानना है कि पाम ऑयल और सोयाबीन ऑयल के बीच मूल्य अंतर कम होने तथा आपूर्ति संबंधी चुनौतियों के कारण भारतीय रिफाइनर धीरे-धीरे सोयाबीन तेल की खरीद बढ़ा रहे हैं।
भारत से निर्यात को भी मिलेगा फायदा
यह समझौता केवल चीन से आयात बढ़ाने तक सीमित नहीं रहेगा। IVPA का मानना है कि इसके जरिए भारत से सरसों खली (Mustard Meal) और सोयाबीन मील जैसे खाद्य तेल डेरिवेटिव्स के निर्यात को भी बढ़ावा मिलेगा।
मजबूत व्यापारिक संपर्क बनने से भारतीय निर्यातकों को चीन के बड़े बाजार तक बेहतर पहुंच मिल सकती है, जिससे कृषि आधारित उद्योगों को भी लाभ होगा।
भारत अब भी आयात पर काफी निर्भर
भारत अपनी कुल खाद्य तेल जरूरतों का लगभग 60 प्रतिशत हिस्सा आयात करता है। हर साल देश में 15 से 17 मिलियन मीट्रिक टन खाद्य तेल विदेशों से खरीदा जाता है।
वित्त वर्ष 2025-26 में खाद्य तेल आयात लगभग 16.5 मिलियन टन रहने का अनुमान है, जबकि घरेलू उत्पादन करीब 9.6 मिलियन टन रहने की संभावना जताई गई है।
ऐसे में भारत के लिए सुरक्षित और स्थिर आयात स्रोत तैयार करना बेहद जरूरी माना जा रहा है।
उद्योग को मिलेगा दीर्घकालिक लाभ
सुधाकर देसाई ने कहा कि उन्हें विश्वास है कि यह सहयोग भविष्य में कई व्यावहारिक परियोजनाओं और दीर्घकालिक साझेदारी का आधार बनेगा। इससे खाद्य तेल उद्योग की प्रतिस्पर्धात्मक क्षमता बढ़ेगी और दोनों देशों के व्यापारिक हितों को मजबूती मिलेगी।
क्या है IVPA?
इंडियन वेजिटेबल ऑयल प्रोड्यूसर्स एसोसिएशन (IVPA) पिछले लगभग पांच दशकों से भारत के खाद्य तेल और तिलहन उद्योग का प्रमुख व्यापारिक संगठन है।
यह संगठन उत्पादकों, रिफाइनरों, आयातकों और व्यापारियों को एक साझा मंच उपलब्ध कराता है। साथ ही सरकार, उद्योग और अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं के साथ मिलकर नीति निर्माण, नवाचार, निष्पक्ष व्यापार, आत्मनिर्भरता और उपभोक्ता हितों को बढ़ावा देने के लिए सक्रिय भूमिका निभाता है।
भारत के लिए क्यों महत्वपूर्ण है यह MoU?
भारत दुनिया का सबसे बड़ा खाद्य तेल आयातक है। ऐसे में चीन जैसे बड़े व्यापारिक साझेदार के साथ हुआ यह समझौता भविष्य में सप्लाई चेन को अधिक सुरक्षित बनाने, आयात लागत को संतुलित रखने और निर्यात के नए अवसर खोलने में मददगार साबित हो सकता है। यदि इस सहयोग के तहत नियमित व्यापारिक संवाद और संयुक्त पहल आगे बढ़ती हैं, तो इसका लाभ केवल खाद्य तेल उद्योग ही नहीं बल्कि किसानों, प्रोसेसिंग कंपनियों और उपभोक्ताओं तक भी पहुंच सकता है।


