राजस्थान के जोधपुर में एक 80 वर्षीय आयरिश नागरिक पिछले एक दशक से ऐसा काम कर रहे हैं, जिसने न सिर्फ स्थानीय लोगों का ध्यान खींचा है, बल्कि देश के जाने-माने उद्योगपति आनंद महिंद्रा भी उनके मुरीद हो गए हैं। कैरॉन रॉन्सली, जिन्हें जोधपुर में लोग प्यार से ‘पागल साहब’ कहते हैं, वर्षों से शहर की उपेक्षित और कचरे से भरी ऐतिहासिक बावड़ियों की सफाई और संरक्षण में जुटे हुए हैं।
महिंद्रा ने हाल ही में सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर रॉन्सली का एक वीडियो साझा करते हुए उनकी निस्वार्थ सेवा और भारतीय विरासत के प्रति समर्पण को सलाम किया। उन्होंने कहा कि देश की ऐतिहासिक धरोहरों को बचाने के लिए किसी व्यक्ति का विशेषज्ञ होना या उसी स्थान का निवासी होना जरूरी नहीं है। यदि किसी में लगन और जिम्मेदारी का भाव है, तो वह भी इस अभियान का हिस्सा बन सकता है।
पर्यटक बनकर आए, विरासत के रखवाले बन गए
They nicknamed 80 year old Irishman, Caron Rawnsley, ‘Paagal Saab’ for his obsession with cleaning Jodhpur’s Bawris & Jhalaras.
Fortunately, today, you don’t need to be either ‘paagal’ or ‘phirang’ to devote yourself to reviving India’s stepwells.
Earlier this year, I had… pic.twitter.com/xKTUzO72Zx
— anand mahindra (@anandmahindra) July 10, 2026 ‘द बेटर इंडिया’ की रिपोर्ट के अनुसार, कैरॉन रॉन्सली पहली बार जोधपुर एक पर्यटक के रूप में पहुंचे थे। शहर की खूबसूरत बावड़ियों और झालरों को देखकर वे प्रभावित तो हुए, लेकिन उनकी बदहाल स्थिति ने उन्हें सबसे ज्यादा झकझोर दिया।
कई ऐतिहासिक जल संरचनाएं कचरे से पट चुकी थीं और वर्षों से उपेक्षा का शिकार थीं। ऐसे में उन्होंने सिर्फ अफसोस जताने के बजाय खुद मैदान में उतरकर इन्हें साफ करने और दोबारा जीवंत बनाने का फैसला किया।
2014 से लगातार कर रहे हैं सेवा
रॉन्सली ने बताया कि जब वे वर्ष 2014 के आखिर में जोधपुर पहुंचे, तो उन्होंने देखा कि पानी संरक्षण की सदियों पुरानी यह अनोखी व्यवस्था बुरी तरह खराब हो चुकी थी।
उन्होंने कहा कि इस स्थिति ने उन्हें भीतर तक प्रभावित किया और तभी उन्होंने अपना समय इन ऐतिहासिक जल स्रोतों की सफाई और संरक्षण में लगाने का निर्णय लिया।
तब से अब तक वे रामबाउरी, गुलाब सागर समेत कई पुरानी बावड़ियों की सफाई और मरम्मत के काम में जुटे हुए हैं। उन्होंने इन स्थानों से वर्षों का जमा कचरा हटाकर लोगों का ध्यान एक बार फिर इन धरोहरों की ओर आकर्षित किया।
आनंद महिंद्रा ने कही बड़ी बात
रॉन्सली के काम की सराहना करते हुए आनंद महिंद्रा ने लिखा कि 80 वर्षीय आयरिश नागरिक को उनके जुनून के कारण ‘पागल साहब’ कहा जाता है, लेकिन भारत की बावड़ियों को पुनर्जीवित करने के लिए किसी को ‘पागल’ या विदेशी होने की जरूरत नहीं है।
उन्होंने कहा कि देशभर में कई संरक्षणवादी, स्थानीय स्वयंसेवक और ग्रामीण समुदाय मिलकर इन ऐतिहासिक जल संरचनाओं को बचाने का सराहनीय काम कर रहे हैं। महिंद्रा ने चांद बावड़ी के संरक्षण से जुड़ी अपनी पुरानी पोस्ट का भी जिक्र करते हुए विरासत संरक्षण के महत्व को दोहराया।
पोस्ट के अंत में उन्होंने लिखा कि वे जोधपुर और भारत की विरासत के प्रति कैरॉन रॉन्सली के प्रेम, निस्वार्थ सेवा और समर्पण को सलाम करते हैं और उम्मीद करते हैं कि उनका यह अभियान कभी न रुके।
क्यों खास हैं राजस्थान की बावड़ियां?
राजस्थान जैसे जल-संकट वाले क्षेत्रों में बावड़ियां केवल ऐतिहासिक इमारतें नहीं थीं, बल्कि सदियों तक पानी संग्रह और संरक्षण का सबसे प्रभावी माध्यम रहीं।
इनका उपयोग केवल पेयजल के लिए नहीं होता था, बल्कि ये सामाजिक मेल-मिलाप, विश्राम और सांस्कृतिक गतिविधियों के भी प्रमुख केंद्र थीं। इनकी वास्तुकला उस दौर की इंजीनियरिंग क्षमता और जल प्रबंधन की उत्कृष्ट समझ को दर्शाती है।
हालांकि आधुनिक जल आपूर्ति व्यवस्था आने के बाद इनका महत्व धीरे-धीरे कम होता गया और कई बावड़ियां उपेक्षा तथा कचरे का ढेर बन गईं।
सोशल मीडिया पर लोगों ने की जमकर तारीफ
आनंद महिंद्रा की पोस्ट वायरल होने के बाद सोशल मीडिया पर हजारों लोगों ने कैरॉन रॉन्सली के कार्य की सराहना की।
एक यूजर ने लिखा, “किसी जगह के लिए सच्चा प्यार राष्ट्रीयता से नहीं, बल्कि उसके लिए किए गए काम से साबित होता है।”
दूसरे यूजर ने कहा, “विडंबना यह है कि जिन्हें ‘पागल’ कहा गया, वही सबसे समझदारी वाला काम कर रहे हैं।”
एक अन्य यूजर ने लिखा, “कई विदेशी भारत की विरासत को बचाने के लिए जिस समर्पण से काम कर रहे हैं, वे सम्मान और समर्थन के हकदार हैं।”
वहीं एक अन्य टिप्पणी में कहा गया कि “किसी स्थान से प्रेम इस बात से तय नहीं होता कि आपका जन्म कहां हुआ, बल्कि इस बात से होता है कि आप उसकी कितनी परवाह करते हैं। ऐसे सभी स्वयंसेवकों को सलाम, जो चुपचाप हमारी धरोहर और भविष्य दोनों को बचाने में लगे हैं।”
विरासत संरक्षण का प्रेरणादायक संदेश
कैरॉन रॉन्सली की कहानी यह साबित करती है कि विरासत की रक्षा केवल सरकारों या संस्थाओं की जिम्मेदारी नहीं है। यदि एक विदेशी नागरिक भारत की ऐतिहासिक धरोहरों को बचाने के लिए अपना जीवन समर्पित कर सकता है, तो हर नागरिक भी अपने शहर, गांव और आसपास की सांस्कृतिक एवं प्राकृतिक धरोहरों के संरक्षण में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है।
उनकी यह पहल न केवल इतिहास को संजोने का प्रयास है, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के लिए जल संरक्षण और सांस्कृतिक विरासत बचाने का एक प्रेरणादायक संदेश भी है।


