Indus Waters Treaty: भारत और पाकिस्तान के बीच सिंधु जल संधि को लेकर विवाद अब शंघाई सहयोग संगठन (SCO) के मंच तक पहुंच गया है। पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ ने SCO की बैठक में सिंधु जल संधि का मुद्दा उठाते हुए कहा कि साझा जल संसाधनों का इस्तेमाल राजनीतिक फायदे के लिए दबाव बनाने के साधन के तौर पर नहीं किया जाना चाहिए। उन्होंने इस समझौते को करोड़ों लोगों की जिंदगी, खेती और आने वाली पीढ़ियों से जोड़ते हुए दोनों देशों से संधियों का सम्मान करने की अपील की।
SCO में शहबाज शरीफ ने क्या कहा?
पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ ने SCO के मंच से भारत और पाकिस्तान के बीच चल रहे जल विवाद का जिक्र किया। उन्होंने कहा कि साझा जल संसाधनों का इस्तेमाल राजनीतिक लाभ हासिल करने के लिए हथियार के रूप में नहीं होना चाहिए।
शहबाज शरीफ ने सिंधु नदी प्रणाली को पाकिस्तान के लिए बेहद महत्वपूर्ण बताते हुए कहा कि इससे देश के करोड़ों लोगों की जिंदगी और कृषि व्यवस्था जुड़ी हुई है। उनका कहना था कि पानी से संबंधित मौजूदा समझौतों और संधियों का दोनों पक्षों को पालन करना चाहिए।
भारत ने मध्यस्थता अदालत के फैसले को क्यों नहीं माना?
सिंधु जल संधि विवाद में हाल ही में भारत ने एक अंतरराष्ट्रीय मध्यस्थता प्रक्रिया पर कड़ा रुख अपनाया। हेग स्थित पर्मानेंट कोर्ट ऑफ आर्बिट्रेशन से जुड़े फैसले में 1960 की सिंधु जल संधि को लागू बताते हुए भारत के दायित्वों की बात कही गई थी।
हालांकि, भारत ने इस प्रक्रिया और मध्यस्थता निकाय के अधिकार क्षेत्र को ही स्वीकार नहीं किया। भारत का तर्क है कि इस मामले में गठित मध्यस्थता तंत्र की प्रक्रिया उसकी सहमति के अनुरूप नहीं है। इसलिए ऐसे निकाय के फैसले को भारत अपने ऊपर बाध्यकारी नहीं मानता।
भारत ने यह भी स्पष्ट किया है कि सिंधु जल संधि को स्थगित रखने का उसका फैसला अभी प्रभावी है।
पहलगाम हमले के बाद भारत ने लिया था बड़ा फैसला
सिंधु जल संधि को लेकर मौजूदा विवाद की जड़ अप्रैल 2025 में हुए पहलगाम आतंकी हमले से जुड़ी है। इस हमले में 26 लोगों की मौत हुई थी। इसके बाद भारत ने पाकिस्तान के खिलाफ कई कड़े कदम उठाए और सिंधु जल संधि को स्थगित करने का ऐलान किया।
भारत का कहना रहा है कि जब तक पाकिस्तान सीमा पार आतंकवाद को समर्थन देना बंद नहीं करता, तब तक संधि को स्थगित रखा जाएगा। वहीं, पाकिस्तान ने पहलगाम हमले में अपनी भूमिका से इनकार किया है।
जलविद्युत परियोजनाओं को लेकर भी बढ़ा विवाद
सिंधु जल संधि को लेकर भारत-पाकिस्तान के बीच तनाव केवल बयानबाजी तक सीमित नहीं है। जम्मू-कश्मीर में भारत की जलविद्युत परियोजनाओं को लेकर भी दोनों देशों के बीच लंबे समय से मतभेद रहे हैं।
भारत ने संधि के स्थगित होने के बाद जम्मू-कश्मीर में अपनी जलविद्युत परियोजनाओं से जुड़े काम को आगे बढ़ाया है। पाकिस्तान इन परियोजनाओं का विरोध करता रहा है और उसका कहना है कि इनका असर पश्चिमी नदियों के पानी के प्रवाह पर पड़ सकता है।
भारत दूसरी ओर यह स्पष्ट करता रहा है कि सिंधु जल संधि के तहत उसके अधिकारों और परियोजनाओं को लेकर पाकिस्तान की आपत्तियों की अपनी सीमाएं हैं।
क्या है सिंधु जल संधि?
सिंधु जल संधि भारत और पाकिस्तान के बीच 1960 में हुई एक महत्वपूर्ण जल संधि है। विश्व बैंक की मध्यस्थता में हुई इस संधि के तहत सिंधु नदी प्रणाली की छह प्रमुख नदियों के पानी के इस्तेमाल को लेकर दोनों देशों के अधिकार और व्यवस्थाएं तय की गई थीं।
समझौते के तहत पूर्वी नदियों—रावी, ब्यास और सतलुज—पर भारत को व्यापक अधिकार मिले, जबकि पश्चिमी नदियों—सिंधु, झेलम और चिनाब—के पानी के इस्तेमाल से जुड़े प्रमुख अधिकार पाकिस्तान को मिले। हालांकि, संधि में भारत को पश्चिमी नदियों पर कुछ शर्तों के तहत घरेलू उपयोग और जलविद्युत परियोजनाओं की अनुमति भी दी गई है।
यही प्रावधान जम्मू-कश्मीर की कई जलविद्युत परियोजनाओं को लेकर भारत और पाकिस्तान के बीच विवाद का प्रमुख कारण रहे हैं।
SCO में मुद्दा उठाने से क्या बदलेगा?
शहबाज शरीफ की ओर से SCO के मंच पर सिंधु जल संधि का मुद्दा उठाने से यह साफ है कि पाकिस्तान इस विवाद को अंतरराष्ट्रीय मंचों पर उठाने की कोशिश जारी रखेगा। हालांकि, केवल SCO में मुद्दा उठाने से भारत के संधि को स्थगित रखने के फैसले में तत्काल बदलाव होने की संभावना नहीं है।
भारत पहले ही स्पष्ट कर चुका है कि पाकिस्तान के साथ जल समझौते पर उसका रुख सीमा पार आतंकवाद के मुद्दे से जुड़ा हुआ है। ऐसे में आने वाले समय में सिंधु जल संधि भारत-पाकिस्तान संबंधों में एक बड़ा और संवेदनशील मुद्दा बनी रह सकती है।


