Highlights
- अलनीनो और कमजोर मानसून के बीच भारत ने चीनी निर्यात पर सख्ती बढ़ाई।
- वैश्विक बाजार में चीनी की कीमत 750-800 डॉलर प्रति टन तक पहुंचने की आशंका।
- आयात पर निर्भर देशों में खाद्य महंगाई 10-15% तक बढ़ने का अनुमान।
- ब्राजील की सप्लाई चुनौतियों से वैश्विक बाजार पर दबाव और बढ़ सकता है।
नई दिल्ली: अलनीनो और कमजोर मानसून की आशंकाओं के बीच भारत ने घरेलू बाजार में चीनी की उपलब्धता सुनिश्चित करने के लिए निर्यात पर सख्ती बरती है। इसका असर अब केवल भारत तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि अंतरराष्ट्रीय बाजारों में भी चीनी की आपूर्ति और कीमतों को लेकर चिंता बढ़ गई है। दुनिया के कई ऐसे देश, जो भारतीय चीनी पर निर्भर हैं, अब महंगी चीनी और संभावित आपूर्ति संकट का सामना कर सकते हैं।
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि भारत लंबे समय तक चीनी निर्यात पर रोक या कड़े प्रतिबंध जारी रखता है, तो वैश्विक चीनी बाजार में कीमतों में तेज उछाल देखने को मिल सकता है। इसके साथ ही आयात करने वाले देशों में खाद्य महंगाई भी बढ़ने की आशंका जताई जा रही है।
उत्पादन में 30 से 80 लाख टन तक गिरावट की आशंका
अंतरराष्ट्रीय मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, कमजोर मानसून और अलनीनो के प्रभाव से भारत में इस वर्ष चीनी उत्पादन 30 लाख टन से लेकर 80 लाख टन तक घट सकता है। गन्ना उत्पादन प्रभावित होने की स्थिति में सरकार का पहला लक्ष्य घरेलू मांग को पूरा करना रहेगा, जिसके चलते निर्यात पर नियंत्रण बनाए रखा जा सकता है।
विश्लेषकों का कहना है कि भारत के निर्यात में कमी ऐसे समय आ रही है, जब दुनिया का सबसे बड़ा चीनी निर्यातक ब्राजील भी प्रोसेसिंग और लॉजिस्टिक्स से जुड़ी चुनौतियों का सामना कर रहा है। ऐसे में वैश्विक बाजार में अतिरिक्त आपूर्ति उपलब्ध कराना आसान नहीं होगा।
750-800 डॉलर प्रति टन तक पहुंच सकती हैं कीमतें
मार्केट एक्सपर्ट्स का अनुमान है कि यदि भारत चीनी निर्यात को पूरी तरह रोक देता है, तो अंतरराष्ट्रीय बाजार में सफेद चीनी की कीमत 750 से 800 डॉलर प्रति टन तक पहुंच सकती है।
इसका असर पहले से ही दिखाई देने लगा है। जून की शुरुआत से लंदन बाजार में सफेद चीनी के वायदा भाव 660 डॉलर प्रति टन के ऊपर कारोबार कर रहे हैं। आपूर्ति को लेकर बढ़ती चिंता के कारण निवेशकों और खरीदारों में सतर्कता बढ़ गई है।
किन देशों पर पड़ेगा सबसे ज्यादा असर?
भारत दुनिया के सबसे बड़े चीनी उत्पादकों और प्रमुख निर्यातकों में शामिल है। ऐसे में भारतीय निर्यात में कमी का सबसे ज्यादा असर उन देशों पर पड़ेगा जो अपनी घरेलू जरूरतों के लिए आयात पर निर्भर हैं।
विशेषज्ञों के अनुसार अफ्रीका, दक्षिण एशिया और कुछ मध्य-पूर्वी देशों में खुदरा चीनी की कीमतों में उल्लेखनीय बढ़ोतरी हो सकती है। यदि आपूर्ति लंबे समय तक प्रभावित रहती है, तो इन देशों में खाद्य महंगाई भी बढ़ सकती है।
खाद्य लागत 10-15% तक बढ़ने का अनुमान
विश्लेषकों का कहना है कि चीनी केवल घरेलू उपयोग की वस्तु नहीं है, बल्कि बिस्कुट, मिठाई, पेय पदार्थ, बेकरी और खाद्य प्रसंस्करण उद्योग का भी प्रमुख कच्चा माल है।
ऐसे में चीनी महंगी होने का असर कई खाद्य उत्पादों की कीमतों पर पड़ सकता है। अनुमान है कि प्रभावित बाजारों में कुल खाद्य लागत 10% से 15% तक बढ़ सकती है, जिससे उपभोक्ताओं पर अतिरिक्त बोझ पड़ेगा।
भारत क्यों उठा रहा है यह कदम?
भारत के लिए गन्ना, चावल के बाद सबसे महत्वपूर्ण कृषि फसलों में शामिल है। सरकार का उद्देश्य घरेलू बाजार में पर्याप्त उपलब्धता बनाए रखना और कीमतों को नियंत्रित रखना है। यदि मानसून सामान्य से कमजोर रहता है और उत्पादन घटता है, तो घरेलू जरूरतों को प्राथमिकता देना सरकार की रणनीति का हिस्सा माना जा रहा है।
विशेषज्ञों का मानना है कि आने वाले महीनों में मानसून की प्रगति, गन्ना उत्पादन के आंकड़े और सरकार की निर्यात नीति पर वैश्विक चीनी बाजार की दिशा काफी हद तक निर्भर करेगी।


