भारत की न्याय व्यवस्था लंबे समय से एक गंभीर चुनौती का सामना कर रही है—मामलों के निपटारे में लगातार हो रही देरी। इस मुद्दे पर पूर्व सुप्रीम कोर्ट जज अभय एस ओक ने एक अहम और स्पष्ट बयान दिया है, जिसने न्याय प्रणाली की जमीनी हकीकत को सामने ला दिया है। उनका कहना है कि ट्रायल में देरी का सबसे बड़ा कारण जजों की भारी कमी है, और जब तक इस मूल समस्या का समाधान नहीं किया जाएगा, तब तक न्याय में देरी का सिलसिला खत्म नहीं होगा।
यह केवल एक प्रशासनिक समस्या नहीं है, बल्कि यह देश के न्यायिक ढांचे, नागरिक अधिकारों और लोकतांत्रिक विश्वास से जुड़ा मुद्दा है।
जजों की कमी: आंकड़े क्या कहते हैं?
भारत में जजों की संख्या लंबे समय से जरूरत के मुकाबले काफी कम रही है। 2002 में Supreme Court of India ने एक महत्वपूर्ण लक्ष्य तय किया था—प्रति 10 लाख (1 मिलियन) आबादी पर 50 जज होने चाहिए।
लेकिन 2026 में स्थिति यह है कि यह संख्या केवल 22–23 जज प्रति 10 लाख के आसपास है।
यह अंतर केवल आंकड़ों का फर्क नहीं है, बल्कि इसका सीधा असर न्याय की गति पर पड़ता है।
जस्टिस ओक के अनुसार:
- आबादी तेजी से बढ़ी है
- नए प्रकार के केस (साइबर क्राइम, कॉर्पोरेट विवाद, डिजिटल फ्रॉड) बढ़े हैं
- केस फाइलिंग की संख्या रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच चुकी है
लेकिन जजों की संख्या उसी अनुपात में नहीं बढ़ी।
लंबित मामलों का बढ़ता पहाड़
भारत में लंबित मामलों की संख्या करोड़ों में है। जिला अदालतों से लेकर उच्च न्यायालयों और सुप्रीम कोर्ट तक, हर स्तर पर केस पेंडेंसी एक बड़ी समस्या बन चुकी है।
National Judicial Data Grid के आंकड़ों के अनुसार:
- लाखों केस 5 साल से ज्यादा समय से लंबित हैं
- हजारों केस 10 साल से भी अधिक समय से फैसले का इंतजार कर रहे हैं
यह स्थिति आम नागरिक के लिए न्याय को “दूर” और “महंगा” बना देती है।
नियुक्तियों में देरी: सिस्टम की दूसरी बड़ी कमजोरी
जस्टिस ओक ने केवल जजों की कमी ही नहीं, बल्कि उनकी नियुक्ति में होने वाली देरी पर भी गंभीर चिंता जताई।
भारत में जजों की नियुक्ति के लिए Supreme Court Collegium सिफारिशें करता है। लेकिन कई बार:
- सरकार इन सिफारिशों पर 9 से 12 महीने या उससे ज्यादा समय लेती है
- कई पद लंबे समय तक खाली रहते हैं
इस देरी का असर:
- वकीलों के करियर पर पड़ता है
- न्यायिक प्रक्रिया धीमी होती है
- कोर्ट का कामकाज प्रभावित होता है
अंडरट्रायल कैदी: न्याय में देरी की सबसे बड़ी कीमत
जब ट्रायल में देरी होती है, तो इसका सबसे बड़ा असर उन लोगों पर पड़ता है जो अभी दोषी साबित नहीं हुए, लेकिन जेल में बंद हैं।
जस्टिस ओक ने इस मुद्दे को भी उठाया:
- कई अंडरट्रायल कैदी सालों तक जेल में रहते हैं
- जमानत में देरी आम बात है
- जेलों की स्थिति भी खराब है
यह स्थिति न्याय के मूल सिद्धांत—“दोषी साबित होने तक निर्दोष”—को कमजोर करती है।
वैश्विक छवि पर असर
आज के डिजिटल युग में भारत की न्याय प्रणाली के आंकड़े छिपे नहीं हैं।
National Judicial Data Grid जैसे प्लेटफॉर्म के कारण:
- पूरी दुनिया भारत के न्यायिक आंकड़े देख सकती है
- लंबित मामलों और देरी की स्थिति अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चर्चा का विषय बन रही है
जस्टिस ओक ने चेतावनी दी कि अगर स्थिति नहीं सुधरी, तो भारत की वैश्विक छवि पर भी असर पड़ सकता है—खासतौर पर निवेश और बिजनेस माहौल पर।
समस्या केवल जजों की संख्या नहीं, बल्कि सिस्टम की भी है
यह मान लेना गलत होगा कि केवल जजों की संख्या बढ़ाने से ही समस्या हल हो जाएगी।
कुछ अन्य बड़े कारण भी हैं:
- केस मैनेजमेंट सिस्टम की कमी
- बार-बार स्थगन (adjournments)
- तकनीकी संसाधनों की कमी
- सरकारी विभागों द्वारा अत्यधिक मुकदमेबाजी
हालांकि, जजों की संख्या बढ़ाना इस पूरी समस्या का सबसे पहला और जरूरी कदम है।
क्या हो सकता है समाधान?
जस्टिस ओक के बयान से साफ है कि अब केवल चर्चा नहीं, बल्कि ठोस कार्रवाई की जरूरत है।
1. जजों की संख्या में तेजी से वृद्धि
सरकार को 50 जज प्रति 10 लाख आबादी के लक्ष्य की ओर तेजी से बढ़ना होगा।
2. नियुक्ति प्रक्रिया में तेजी
- Collegium और सरकार के बीच समयसीमा तय हो
- खाली पदों को जल्दी भरा जाए
3. टेक्नोलॉजी का उपयोग
- ई-कोर्ट सिस्टम को और मजबूत किया जाए
- डिजिटल सुनवाई को बढ़ावा मिले
4. अंडरट्रायल कैदियों के लिए विशेष सुधार
- फास्ट-ट्रैक कोर्ट
- जमानत प्रक्रिया को आसान बनाना
5. न्यायिक इंफ्रास्ट्रक्चर का विस्तार
- नए कोर्ट
- बेहतर स्टाफ
- आधुनिक सुविधाएं
निष्कर्ष: न्याय में देरी, न्याय से इनकार के बराबर
जस्टिस अभय ओक की बात केवल एक टिप्पणी नहीं, बल्कि एक चेतावनी है।
भारत की न्याय व्यवस्था आज एक ऐसे मोड़ पर खड़ी है, जहां:
- मामलों की संख्या बढ़ रही है
- संसाधन सीमित हैं
- जनता का भरोसा दांव पर है
अगर समय रहते जजों की संख्या नहीं बढ़ाई गई और सिस्टम में सुधार नहीं किया गया, तो “न्याय में देरी” धीरे-धीरे “न्याय से इनकार” में बदल सकती है।
अब सवाल यह नहीं है कि समस्या क्या है—वह स्पष्ट है।
सवाल यह है कि समाधान कितनी जल्दी लागू किया जाता है।
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