India GDP Growth: भारत की अर्थव्यवस्था को लेकर एक बड़ी उम्मीद सामने आई है। ओम्नीसाइंस कैपिटल के अनुमान के मुताबिक भारत वित्त वर्ष 2029 तक 5.1 ट्रिलियन डॉलर की इकोनॉमी बन सकता है। रिपोर्ट में मजबूत घरेलू आर्थिक वृद्धि, बैंकों की बेहतर वित्तीय स्थिति और कंपनियों के कैपेक्स में संभावित तेजी को इसके पीछे अहम कारण माना गया है।
भारत के लिए 5 ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था बनने का लक्ष्य नया नहीं है। सरकार ने पहली बार वित्त वर्ष 2019 के आसपास इस महत्वाकांक्षी लक्ष्य को सामने रखा था। लेकिन कोरोना महामारी, बैंकिंग और कॉरपोरेट सेक्टर की कमजोर वित्तीय स्थिति तथा रुपये में आई तेज गिरावट ने इस लक्ष्य की राह मुश्किल कर दी।
अब परिस्थितियां पहले के मुकाबले काफी अलग दिखाई दे रही हैं। ओम्नीसाइंस कैपिटल का मानना है कि भारतीय अर्थव्यवस्था की बुनियादी विकास क्षमता मजबूत है और आने वाले वर्षों में यही ताकत देश को 5 ट्रिलियन डॉलर के आंकड़े के पार ले जा सकती है।
FY29 तक 5.1 ट्रिलियन डॉलर की इकोनॉमी कैसे बनेगा भारत?
ओम्नीसाइंस कैपिटल के बेस केस अनुमान के अनुसार आने वाले वर्षों में भारत की वास्तविक जीडीपी ग्रोथ करीब 6.5% रह सकती है। इसके साथ महंगाई औसतन 4% और रुपये में हर साल करीब 2.5% की गिरावट का अनुमान लगाया गया है।
इन सभी कारकों को मिलाकर अमेरिकी डॉलर के लिहाज से भारत की नाममात्र जीडीपी वृद्धि करीब 8% सालाना रह सकती है। इसी रफ्तार के आधार पर वित्त वर्ष 2029 तक भारत की अर्थव्यवस्था का आकार लगभग 5.1 ट्रिलियन डॉलर पहुंचने का अनुमान है।
रिपोर्ट का अनुमान यहीं नहीं रुकता। इसके मुताबिक FY2030 तक भारतीय अर्थव्यवस्था करीब 5.4 ट्रिलियन डॉलर और FY2035 तक लगभग 8 ट्रिलियन डॉलर तक पहुंच सकती है।
5 ट्रिलियन डॉलर का लक्ष्य क्यों हुआ था लेट?
भारत ने जब 5 ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था बनने का लक्ष्य रखा था, तब देश की जीडीपी करीब 2.7 ट्रिलियन डॉलर थी। उस समय FY2025 तक लक्ष्य हासिल करने के लिए डॉलर के आधार पर हर साल लगभग 10.2% की नाममात्र जीडीपी वृद्धि जरूरी थी।
लेकिन कोरोना महामारी ने आर्थिक गतिविधियों को बड़ा झटका दिया। वित्त वर्ष 2021 में भारत की वास्तविक जीडीपी में करीब 4.15% की गिरावट दर्ज की गई। इसके बाद रिकवरी तो हुई, लेकिन डॉलर में अर्थव्यवस्था के आकार को बढ़ाने के लिए जरूरी गति हासिल करना आसान नहीं रहा।
इसके अलावा बैंकों और कंपनियों की कमजोर बैलेंस शीट ने भी निवेश और कर्ज की क्षमता को प्रभावित किया। लंबे समय तक चलने वाली इस समस्या को अर्थव्यवस्था में डुअल बैलेंस शीट प्रॉब्लम के तौर पर देखा गया।
रुपये की कमजोरी ने भी बढ़ाई मुश्किल
भारत की घरेलू अर्थव्यवस्था की ग्रोथ और डॉलर में मापी गई जीडीपी की ग्रोथ एक जैसी नहीं होती। इसका बड़ा कारण रुपये और अमेरिकी डॉलर के बीच विनिमय दर है।
वित्त वर्ष 2026 में अमेरिकी डॉलर के मुकाबले रुपया करीब 12.3% कमजोर हुआ। ऐसे में देश के भीतर आर्थिक गतिविधियां अच्छी रहने के बावजूद जब जीडीपी को डॉलर में बदला जाता है तो उसका आकार अपेक्षाकृत कम दिखाई दे सकता है।
यही वजह है कि भारत की घरेलू वास्तविक आर्थिक वृद्धि मजबूत होने के बावजूद 5 ट्रिलियन डॉलर के लक्ष्य तक पहुंचने में ज्यादा समय लग रहा है।
घरेलू अर्थव्यवस्था की ग्रोथ कितनी मजबूत रही?
आंकड़ों पर नजर डालें तो वित्त वर्ष 2022 से FY2026 के बीच भारत की वास्तविक जीडीपी वृद्धि औसतन करीब 7.4% रही। यह पिछले दो दशकों के करीब 6.2% के औसत से काफी अधिक है।
इससे संकेत मिलता है कि डॉलर में भारत की इकोनॉमी के बढ़ने की अपेक्षाकृत धीमी रफ्तार का कारण सिर्फ घरेलू आर्थिक कमजोरी नहीं थी। रुपये की विनिमय दर ने भी इसमें बड़ी भूमिका निभाई।
वित्त वर्ष 2025 में भारत की जीडीपी लगभग 3.8 ट्रिलियन डॉलर थी। FY2019 से FY2025 तक डॉलर के आधार पर इसकी सालाना चक्रवृद्धि वृद्धि दर करीब 5.7% रही। FY2026 में अर्थव्यवस्था का आकार बढ़कर लगभग 4.1 ट्रिलियन डॉलर हो गया।
बैंक और कंपनियां मजबूत हुईं तो बढ़ेगा कैपेक्स
भारत की अगली आर्थिक छलांग में बैंकिंग सेक्टर और कॉरपोरेट कंपनियों की वित्तीय स्थिति महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है।
बैंकों की बैलेंस शीट मजबूत होने से उनके पास कारोबार और नए प्रोजेक्ट्स के लिए कर्ज उपलब्ध कराने की क्षमता बढ़ती है। दूसरी तरफ कंपनियों की वित्तीय स्थिति बेहतर होने पर वे नए प्लांट, मशीनरी, इंफ्रास्ट्रक्चर और अन्य प्रोजेक्ट्स पर निवेश बढ़ा सकती हैं।
अगर आने वाले वर्षों में कैपिटल एक्सपेंडिचर यानी कैपेक्स में तेजी आती है, तो इसका असर उत्पादन, रोजगार, मांग और आर्थिक विकास पर देखने को मिल सकता है।
डॉलर का प्रवाह बढ़ा तो बदल सकता है पूरा अनुमान
ओम्नीसाइंस कैपिटल ने एक बेहतर स्थिति वाला परिदृश्य भी बताया है। अगर भारत में व्यापार और डॉलर का प्रवाह मजबूत रहता है और इससे रुपये को अपेक्षाकृत ज्यादा समर्थन मिलता है, तो डॉलर के आधार पर जीडीपी की वृद्धि और तेज हो सकती है।
रिपोर्ट के मुताबिक अगर डॉलर के लिहाज से नाममात्र जीडीपी वृद्धि 11% तक पहुंचती है, तो वित्त वर्ष 2035 तक भारत की अर्थव्यवस्था का आकार करीब 11 ट्रिलियन डॉलर तक पहुंच सकता है।
5 ट्रिलियन डॉलर के बाद क्या?
भारत के लिए 5 ट्रिलियन डॉलर का आंकड़ा सिर्फ एक आर्थिक मील का पत्थर नहीं है। बड़ी अर्थव्यवस्था बनने के साथ देश की वैश्विक आर्थिक भूमिका भी मजबूत होती है।
ओम्नीसाइंस कैपिटल के अनुमान में अगले कुछ वर्षों के लिए चार चीजें खास तौर पर महत्वपूर्ण दिखाई देती हैं—
- वास्तविक जीडीपी ग्रोथ
- रुपये की विनिमय दर
- बैंकों और कंपनियों की वित्तीय स्थिति
- निजी और सरकारी कैपेक्स की रफ्तार
अगर इन मोर्चों पर उम्मीद के मुताबिक सुधार जारी रहता है तो भारत FY29 तक 5.1 ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था बनने की दिशा में आगे बढ़ सकता है।
निष्कर्ष
भारत 5 ट्रिलियन डॉलर की इकोनॉमी बनने की दौड़ में तय समय से पीछे जरूर रहा है, लेकिन देश की घरेलू आर्थिक विकास दर ने उम्मीद कायम रखी है। कोरोना के बाद अर्थव्यवस्था की रिकवरी, बैंकिंग सेक्टर की बेहतर स्थिति और कंपनियों के संभावित निवेश से आने वाले वर्षों में ग्रोथ को मजबूती मिल सकती है।
ओम्नीसाइंस कैपिटल का FY2029 तक 5.1 ट्रिलियन डॉलर का अनुमान इसी संभावित सुधार पर आधारित है। हालांकि अंतिम परिणाम रुपये की चाल, महंगाई, वैश्विक आर्थिक परिस्थितियों और भारत की वास्तविक आर्थिक वृद्धि पर निर्भर करेगा।


