IAS Divya Mittal News: पूर्व IAS अधिकारी दिव्या मित्तल इन दिनों अपने इस्तीफे के साथ-साथ एक सोशल मीडिया पोस्ट को लेकर भी चर्चा में हैं। करीब 13 साल तक प्रशासनिक सेवा में रहने के बाद उन्होंने स्वैच्छिक इस्तीफा देने का फैसला किया। उन्होंने स्पष्ट किया कि यह उनका सोच-समझकर लिया गया निर्णय है, जिसमें उनकी प्राथमिकताओं, रुचियों और परिवार से जुड़ी जिम्मेदारियों की भी भूमिका है।
हालांकि, इस्तीफे के बाद उनकी एक सोशल मीडिया पोस्ट ने एक अलग और बेहद महत्वपूर्ण बहस छेड़ दी है। पोस्ट में दिव्या मित्तल ने अपनी शिक्षा और करियर का जिक्र करते हुए बताया कि देश की बेहतरीन शिक्षा ने उन्हें कठिन परीक्षाएं पास करना और बड़ी जिम्मेदारियां संभालना तो सिखाया, लेकिन मन को शांत रखना, अकेलेपन से निपटना और खुश रहना नहीं सिखाया।
IIT-IIM से IAS तक का शानदार सफर
IIT Delhi to IIM Bangalore to IAS. I got the best education my country had to offer. It taught me how to crack tough exams and manage big responsibilities. But it never taught me how to quiet my own mind or handle loneliness. We spend many years learning how to achieve, but not a…
— Divya Mittal (@divyamittal_IAS) May 17, 2026 दिव्या मित्तल का करियर काफी प्रभावशाली रहा है। उन्होंने IIT दिल्ली से पढ़ाई की और इसके बाद IIM बैंगलोर से शिक्षा हासिल की। सिविल सेवा में आने से पहले वह लंदन में फाइनेंस सेक्टर में काम कर चुकी थीं।
इसके बाद उन्होंने भारत लौटकर सिविल सेवा परीक्षा पास की और भारतीय प्रशासनिक सेवा (IAS) का हिस्सा बनीं। प्रशासनिक सेवा के दौरान उन्होंने अलग-अलग महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां संभालीं और करीब 13 वर्षों तक सरकारी सेवा में रहीं।
इतना सफल अकादमिक और पेशेवर सफर होने के बावजूद दिव्या मित्तल का कहना है कि जिंदगी के कुछ ऐसे पहलू हैं जिनके लिए पारंपरिक शिक्षा पर्याप्त तैयारी नहीं कराती।
‘हमें हासिल करना सिखाया, खुश रहना नहीं’
इस्तीफे के बाद साझा की गई अपनी पोस्ट में दिव्या मित्तल ने शिक्षा व्यवस्था को लेकर कई सवाल उठाए। उनका कहना है कि पढ़ाई के दौरान बच्चों और युवाओं को उपलब्धियां हासिल करने, परीक्षाएं पास करने और प्रतिस्पर्धा में आगे बढ़ने के लिए तैयार किया जाता है।
लेकिन भावनाओं को समझना, अकेलेपन को संभालना, सीमाएं तय करना, तनाव पहचानना और खुद को समझना जैसे जीवन के जरूरी कौशल अक्सर शिक्षा का हिस्सा नहीं बनते।
उन्होंने अपनी बात को 9 अलग-अलग बिंदुओं के जरिए समझाया है।
स्कूली शिक्षा में क्या छूट रहा है? दिव्या मित्तल के 9 विचार
1. इमोशनल रेगुलेशन यानी भावनाओं को संभालना
दिव्या मित्तल के मुताबिक स्कूलों में हमें कई विषयों की जानकारी दी जाती है, लेकिन अपनी भावनाओं को समझने और उन्हें सही तरीके से संभालने की शिक्षा बहुत कम मिलती है।
गुस्सा, दुख, निराशा, डर या दिल टूटने जैसी परिस्थितियों से कैसे निपटना है, यह जीवन का अहम हिस्सा है। भावनाओं को दबाने के बजाय उन्हें समझना और प्रोसेस करना सीखना जरूरी है।
2. डीप कम्युनिकेशन यानी गहराई से संवाद करना
स्कूल में सही भाषा, निबंध और उत्तर लिखना सिखाया जाता है, लेकिन वास्तविक जीवन में अपनी भावनाओं और सीमाओं को व्यक्त करना उतना ही महत्वपूर्ण है।
किसी स्थिति में ‘नहीं’ कैसे कहना है, अपनी परेशानी कैसे बतानी है और व्यक्तिगत सीमाएं कैसे तय करनी हैं, ये भी जीवन के जरूरी कौशल हैं।
3. क्रिटिकल थिंकिंग यानी सवाल पूछने की क्षमता
दिव्या मित्तल ने गहन सोच की जरूरत पर भी जोर दिया। उनके मुताबिक स्कूल में अक्सर सही उत्तर देने पर जोर रहता है, जबकि वास्तविक जिंदगी में सही सवाल पूछना भी बेहद जरूरी है।
किसी जानकारी या राय को बिना सोचे स्वीकार करने के बजाय यह समझना जरूरी है कि वह विचार कहां से आया है और उसके पीछे क्या तर्क है।
4. फाइनेंशियल लिटरेसी यानी पैसों की समझ
गणित पढ़ने के बावजूद बहुत से लोग वास्तविक जीवन में पैसे से जुड़े फैसलों को लेकर परेशान रहते हैं।
दिव्या मित्तल के विचारों में यह सवाल भी शामिल है कि बच्चों को कर्ज, बचत और पैसों के प्रबंधन जैसी बुनियादी वित्तीय समझ क्यों नहीं दी जाती, जबकि ये चीजें आगे की जिंदगी पर सीधा असर डालती हैं।
5. सेल्फ-डिसिप्लिन यानी आत्म-अनुशासन
स्कूल और कॉलेज की जिंदगी में टाइम-टेबल, घंटियों और तय नियमों के जरिए दिनचर्या चलती है। लेकिन नौकरी और व्यक्तिगत जीवन में खुद अपने फैसले लेने पड़ते हैं।
ऐसे में आत्म-अनुशासन बेहद जरूरी हो जाता है। व्यक्ति को यह सीखना होता है कि बिना किसी दूसरे व्यक्ति के लगातार निर्देश दिए वह अपने समय और प्राथमिकताओं को कैसे संभाले।
6. अकेलेपन से निपटना
दिव्या मित्तल की पोस्ट का सबसे ज्यादा चर्चा में रहने वाला हिस्सा अकेलेपन से निपटने से जुड़ा है।
स्कूल और कॉलेज में व्यक्ति लगातार लोगों के बीच रहता है। लेकिन नौकरी, शहर बदलने, रिश्तों में बदलाव या जीवन की दूसरी परिस्थितियों के कारण आगे चलकर अकेलापन महसूस हो सकता है।
उनका सवाल है कि हमें इस तरह के अकेलेपन से निपटने के लिए पहले से तैयार क्यों नहीं किया जाता?
7. लोगों को समझना और पहचानना
बचपन और स्कूल के दिनों में दोस्ती अपेक्षाकृत सहज होती है। लेकिन वयस्क जीवन में लोगों को समझना और उनके व्यवहार को पहचानना अधिक जटिल हो सकता है।
दिव्या मित्तल के विचारों के मुताबिक व्यक्ति को यह समझने की क्षमता भी विकसित करनी चाहिए कि सामने वाला व्यक्ति क्या चाहता है, उसके इरादे क्या हो सकते हैं और किन लोगों पर भरोसा करना उचित है।
8. मानसिक स्वास्थ्य की देखभाल
शारीरिक स्वास्थ्य पर स्कूलों में अक्सर ध्यान दिया जाता है, लेकिन मानसिक स्वास्थ्य को लेकर उतनी ही व्यवस्थित शिक्षा नहीं मिलती।
तनाव कब सामान्य है, कब वह गंभीर रूप ले सकता है और कब किसी भरोसेमंद व्यक्ति या विशेषज्ञ से मदद लेनी चाहिए—इन बातों की जानकारी भी जीवन कौशल का हिस्सा होनी चाहिए।
9. खुद को जानना
दिव्या मित्तल का अंतिम विचार खुद को समझने से जुड़ा है।
बच्चों को अक्सर बेहतर अंक हासिल करने, प्रतियोगिताएं जीतने और सफल करियर बनाने के लिए प्रेरित किया जाता है। लेकिन इस दौड़ में यह सवाल पीछे छूट सकता है कि व्यक्ति वास्तव में चाहता क्या है, उसकी प्राथमिकताएं क्या हैं और उसे किस तरह का जीवन संतुष्ट करता है।
दिव्या मित्तल की पोस्ट ने क्यों छेड़ी बड़ी बहस?
दिव्या मित्तल की बात इसलिए भी चर्चा में है क्योंकि यह केवल शिक्षा व्यवस्था का सवाल नहीं है। यह आधुनिक जीवन में सफलता की परिभाषा पर भी सवाल उठाती है।
अच्छी डिग्री, प्रतिष्ठित संस्थान, शानदार नौकरी और बड़ी जिम्मेदारी को आमतौर पर सफलता का पैमाना माना जाता है। लेकिन इनके साथ मानसिक शांति, अच्छे रिश्ते, भावनात्मक संतुलन और संतुष्टि भी जरूरी हैं।
दिव्या मित्तल का संदेश इसी अंतर की ओर ध्यान खींचता है—शिक्षा सिर्फ परीक्षा और करियर की तैयारी नहीं, बल्कि जिंदगी को संभालने की तैयारी भी होनी चाहिए।
उनकी पोस्ट ने सोशल मीडिया पर इसी वजह से लोगों को सोचने पर मजबूर किया है कि अगर शिक्षा हमें जिंदगी के लिए तैयार करती है, तो उसमें जिंदगी के भावनात्मक और व्यावहारिक पहलुओं को भी उतनी ही अहमियत क्यों न दी जाए।


