हैदराबाद: फास्ट फूड में इस्तेमाल होने वाले तेल की गुणवत्ता एक बार फिर चर्चा के केंद्र में है। तेलंगाना में खाद्य सुरक्षा अधिकारियों की जांच के दौरान कुंडापुर (Kondapur) स्थित एक KFC आउटलेट में डार्क, डिग्रेडेड (खराब) तेल और उच्च Total Polar Compounds (TPC) स्तर पाए जाने की रिपोर्ट ने उपभोक्ताओं के बीच चिंता बढ़ा दी है। शुरुआती जानकारी के मुताबिक, नियमित निरीक्षण के दौरान तेल में रंग परिवर्तन और गुणवत्ता गिरने के संकेत मिले, जिसके बाद नियमों के तहत कार्रवाई शुरू की गई।
यह मामला सिर्फ एक आउटलेट तक सीमित नहीं है; यह भारत में रीयूज़्ड कुकिंग ऑयल (बार-बार इस्तेमाल किया गया तेल), फास्ट फूड हाइजीन और रेगुलेटरी निगरानी की व्यापक बहस को फिर से सामने लाता है।
TPC क्या होता है और यह क्यों मायने रखता है?
Total Polar Compounds (TPC) एक वैज्ञानिक पैरामीटर है, जो फ्राइंग ऑयल की गुणवत्ता को मापता है। जब तेल को बार-बार गर्म किया जाता है—खासकर डीप फ्राइंग में—तो उसमें केमिकल बदलाव होते हैं:
- ऑक्सीडेशन (Oxidation)
- पॉलिमराइजेशन (Polymerisation)
- डिग्रेडेड फैट्स और टॉक्सिक यौगिकों का बनना
इन प्रक्रियाओं से तेल में पोलर कंपाउंड्स बढ़ते जाते हैं। आसान शब्दों में: जितना ज्यादा TPC, उतना खराब और असुरक्षित तेल।
Conducted a random food safety inspection at KFC, Rajarajeshwari Colony, Kondapur along with the FSO team.
TPC (Total Polar Compounds) levels in cooking oil were found to be above permissible limits with dark discoloration. Action is being initiated under relevant rules. pic.twitter.com/rXcUjgLkai
— Zonal Commissioner, Serilingampally Zone – CMC (@ZC_SLP) May 4, 2026 Food Safety and Standards Authority of India के नियम क्या कहते हैं?
भारत में खाने-पीने की चीज़ों की सुरक्षा के लिए जिम्मेदार Food Safety and Standards Authority of India (FSSAI) ने स्पष्ट गाइडलाइन दी है:
- खाने के तेल में TPC 25% से अधिक नहीं होना चाहिए
- इस सीमा से ऊपर का तेल मानव उपभोग के लिए अनुपयुक्त (unsafe) माना जाता है
कुंडापुर के मामले में चिंता इसलिए बढ़ी क्योंकि रिपोर्ट के मुताबिक तेल इस सुरक्षित सीमा से ऊपर पाया गया—जो सीधे तौर पर ओवरयूज़ (अत्यधिक पुन: उपयोग) का संकेत देता है।
सेहत पर असर: बार-बार गरम तेल कितना खतरनाक?
रीयूज़्ड कुकिंग ऑयल सिर्फ स्वाद या क्वालिटी का मुद्दा नहीं, बल्कि लंबी अवधि की स्वास्थ्य जोखिम भी है। विभिन्न अध्ययनों और रिपोर्ट्स के आधार पर उच्च TPC स्तर से जुड़े जोखिमों में शामिल हैं:
1. हृदय रोग (Heart Disease)
डिग्रेडेड ऑयल में बने ऑक्सीडाइज़्ड फैट्स ब्लड वेसल्स को नुकसान पहुंचाते हैं, जिससे एथेरोस्क्लेरोसिस (artery hardening) का खतरा बढ़ता है।
2. हाई ब्लड प्रेशर (Hypertension)
टॉक्सिक कंपाउंड्स शरीर में इंफ्लेमेशन बढ़ाते हैं, जो समय के साथ BP को प्रभावित कर सकते हैं।
3. लिवर डैमेज
लगातार ऐसे तेल का सेवन लिवर पर लोड बढ़ाता है, जिससे फैटी लिवर और अन्य समस्याएं हो सकती हैं।
4. न्यूरोडीजेनेरेटिव जोखिम
कुछ शोधों में बार-बार गरम तेल को अल्ज़ाइमर जैसे रोगों के जोखिम से भी जोड़ा गया है।
👉 सीधी बात: तेल जितना ज्यादा बार गरम होगा, उतना ही ज्यादा “टॉक्सिक” बनता जाएगा।
जांच कैसे होती है? TPC मापने के तरीके
TPC स्तर को मापने के लिए लैब-आधारित मानक विधियां मौजूद हैं, जैसे AOAC Official Method 982.27। इसके अलावा, ऑन-साइट निरीक्षण के लिए:
- हैंडहेल्ड TPC मीटर
- क्विक टेस्टिंग डिवाइस
का इस्तेमाल किया जाता है। ये उपकरण तुरंत संकेत देते हैं कि तेल सुरक्षित सीमा में है या नहीं। हालांकि, सटीकता बनाए रखने के लिए इनकी रेगुलर कैलिब्रेशन जरूरी होती है।
RUCO पहल: इस्तेमाल किए गए तेल का सही इस्तेमाल
रीयूज़्ड कुकिंग ऑयल के गलत उपयोग को रोकने के लिए Food Safety and Standards Authority of India ने RUCO (Repurpose Used Cooking Oil) पहल शुरू की है।
RUCO का मकसद:
- इस्तेमाल किए गए तेल को दोबारा खाना बनाने में इस्तेमाल होने से रोकना
- उसे बायोडीज़ल में बदलने के लिए कलेक्शन नेटवर्क बनाना
- फूड बिज़नेस ऑपरेटर्स (FBOs) को अधिकृत एजेंसियों से जोड़ना
यह पहल न केवल स्वास्थ्य जोखिम कम करती है, बल्कि सस्टेनेबल वेस्ट मैनेजमेंट को भी बढ़ावा देती है।
फास्ट फूड इंडस्ट्री के लिए संदेश
कुंडापुर की घटना एक चेतावनी है कि:
- क्वालिटी कंट्रोल सिस्टम को और सख्त करना होगा
- ऑयल यूसेज पर रियल-टाइम मॉनिटरिंग जरूरी है
- कर्मचारियों को फूड सेफ्टी ट्रेनिंग देना अनिवार्य होना चाहिए
बड़े ब्रांड्स के लिए यह सिर्फ रेगुलेटरी मुद्दा नहीं, बल्कि ब्रांड ट्रस्ट का सवाल भी है।
उपभोक्ता क्या करें? (प्रैक्टिकल टिप्स)
आप पूरी तरह किचन के अंदर की प्रक्रिया नियंत्रित नहीं कर सकते, लेकिन कुछ संकेत पहचान सकते हैं:
- बहुत ज्यादा डार्क या बदबूदार तेल
- खाने का असामान्य कड़वा/बासी स्वाद
- बार-बार फ्राइड आइटम्स का ऑयली और भारी महसूस होना
👉 ऐसे संकेत मिलें तो उस जगह से बचना बेहतर है।
निष्कर्ष: एक घटना, लेकिन बड़ा सबक
हैदराबाद का यह मामला दिखाता है कि फूड सेफ्टी सिर्फ नियम नहीं, रोजमर्रा की जिम्मेदारी है—चाहे वह रेस्टोरेंट हो या घर का किचन। TPC जैसे वैज्ञानिक मानकों को नजरअंदाज करना सीधे तौर पर सार्वजनिक स्वास्थ्य से समझौता है।
आगे बढ़ते हुए, सख्त निरीक्षण, टेक्नोलॉजी का उपयोग और जागरूक उपभोक्ता—तीनों मिलकर ही यह सुनिश्चित कर सकते हैं कि हमारी थाली में आने वाला खाना सुरक्षित, साफ और स्वस्थ हो।
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