मिडिल ईस्ट में बढ़ते तनाव के बीच दुनिया की सबसे अहम समुद्री तेल सप्लाई लाइन होर्मुज स्ट्रेट (Hormuz Strait) को लेकर बड़ी चेतावनी सामने आई है। एनर्जी मार्केट पर नजर रखने वाली एडवाइजरी फर्म Rapidan Energy Group ने कहा है कि अगर अगस्त तक होर्मुज स्ट्रेट पूरी तरह बाधित या बंद रहा तो दुनिया को 2008 जैसी आर्थिक मंदी यानी Great Recession जैसी स्थिति का सामना करना पड़ सकता है।
यह चेतावनी ऐसे समय में आई है जब अमेरिका, इजरायल और ईरान के बीच तनाव लगातार बढ़ रहा है। तेल बाजार में भारी उतार-चढ़ाव देखने को मिल रहा है और निवेशकों के बीच चिंता गहराती जा रही है।
क्यों इतना महत्वपूर्ण है होर्मुज स्ट्रेट?
होर्मुज स्ट्रेट दुनिया के सबसे रणनीतिक समुद्री मार्गों में से एक है। खाड़ी देशों से निकलने वाला बड़ा हिस्सा कच्चा तेल और LNG इसी रास्ते से दुनिया के अलग-अलग देशों तक पहुंचता है।
सऊदी अरब, इराक, यूएई, कुवैत और ईरान जैसे बड़े तेल उत्पादक देशों का एक्सपोर्ट काफी हद तक इसी समुद्री मार्ग पर निर्भर करता है। अनुमान है कि दुनिया के कुल समुद्री तेल व्यापार का लगभग पांचवां हिस्सा इस रास्ते से गुजरता है। ऐसे में अगर यह रास्ता लंबे समय तक बाधित रहता है तो पूरी दुनिया की एनर्जी सप्लाई चेन प्रभावित हो सकती है।
अगस्त तक बंद रहा तो क्या होगा?
रैपिडन एनर्जी ग्रुप के मुताबिक यदि जुलाई के बाद भी होर्मुज स्ट्रेट में व्यवधान जारी रहता है तो अगस्त और सितंबर में वैश्विक तेल सप्लाई में भारी कमी आ सकती है।
फर्म का अनुमान है कि: तीसरी तिमाही में सप्लाई घाटा 60 लाख बैरल प्रतिदिन तक पहुंच सकता है, ब्रेंट क्रूड 130 डॉलर प्रति बैरल तक जा सकता है वैश्विक तेल मांग में रोजाना 26 लाख बैरल तक गिरावट आ सकती है, 2026 में ग्लोबल ऑयल कंजम्पशन में सालाना गिरावट शुरू हो सकती है यह स्थिति केवल तेल बाजार तक सीमित नहीं रहेगी, बल्कि पूरी वैश्विक अर्थव्यवस्था पर असर डाल सकती है।
2008 जैसी मंदी की चेतावनी क्यों?
2008 की वैश्विक मंदी के दौरान भी ऊर्जा कीमतों में भारी अस्थिरता, वित्तीय बाजारों में घबराहट और आर्थिक सुस्ती देखने को मिली थी। इस बार भी चिंता यही है कि अगर तेल की कीमतें लगातार बढ़ती रहीं तो: महंगाई तेजी से बढ़ेगी, ब्याज दरें ऊंची रह सकती हैं, कंपनियों की लागत बढ़ेगी, उपभोक्ताओं की खरीद क्षमता घटेगी, शेयर बाजारों में दबाव बढ़ेगा रैपिडन के विश्लेषकों का कहना है कि मौजूदा स्थिति 1970 के दशक या 2008 जितनी चरम नहीं है, लेकिन लगातार ऊंची तेल कीमतें वित्तीय और आर्थिक कमजोरियों को और बढ़ा सकती हैं।
भारत पर क्या असर पड़ेगा?
भारत दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा तेल आयातक देश है। देश अपनी जरूरत का करीब 85 फीसदी कच्चा तेल विदेशों से खरीदता है। ऐसे में अगर ब्रेंट क्रूड 130 डॉलर के करीब पहुंचता है तो भारत पर कई तरह का दबाव बढ़ सकता है।
1. पेट्रोल-डीजल महंगा हो सकता है
तेल कंपनियों की लागत बढ़ने से पेट्रोल और डीजल की कीमतों में बढ़ोतरी की आशंका बढ़ जाएगी।
2. महंगाई बढ़ सकती है
ट्रांसपोर्ट महंगा होने से: खाद्य पदार्थ, दूध, सब्जियां, FMCG सामान, एयर टिकट, लॉजिस्टिक्स सबकी लागत बढ़ सकती है।
3. रुपये पर दबाव
कच्चे तेल का आयात बिल बढ़ने से डॉलर की मांग बढ़ती है। इससे रुपये में कमजोरी आ सकती है।
4. शेयर बाजार में उतार-चढ़ाव
ऊंचे तेल दामों का असर: एविएशन, पेंट, केमिकल, सीमेंट, ऑटो जैसे सेक्टर्स पर पड़ सकता है। हालांकि ऑयल एक्सप्लोरेशन और कुछ ऊर्जा कंपनियों को फायदा भी हो सकता है।
अमेरिका और ईरान क्यों आमने-सामने?
तनाव की जड़ ईरान के यूरेनियम भंडार और परमाणु कार्यक्रम को लेकर है। अमेरिकी राष्ट्रपति Donald Trump ने कहा है कि यदि उन्हें ईरानी नेतृत्व से “सही जवाब” नहीं मिला तो अमेरिका दोबारा सैन्य कार्रवाई कर सकता है।
वहीं ईरान का कहना है कि उसका परमाणु कार्यक्रम पूरी तरह शांतिपूर्ण उद्देश्यों के लिए है। ईरान की रिवोल्यूशनरी गार्ड्स ने चेतावनी दी है कि नए हमलों का जवाब क्षेत्र से बाहर तक दिया जा सकता है। इस तनाव ने वैश्विक बाजारों की चिंता और बढ़ा दी है।
तेल बाजार में भारी उतार-चढ़ाव
गुरुवार के कारोबारी सत्र में तेल की कीमतों में भारी अस्थिरता देखने को मिली। कभी कीमतों में तेजी आई तो कभी कूटनीतिक समाधान की उम्मीदों से गिरावट दर्ज की गई।
विशेषज्ञों का मानना है कि आने वाले कुछ हफ्तों में: युद्ध की दिशा, अमेरिका-ईरान बातचीत, और होर्मुज स्ट्रेट की स्थिति तेल बाजार की चाल तय करेंगे।
क्या दुनिया फिर मंदी की ओर बढ़ रही है?
फिलहाल स्थिति पूरी तरह 2008 जैसी नहीं मानी जा रही, क्योंकि: कई देशों की अर्थव्यवस्था पहले से ज्यादा विविध हो चुकी है सेंट्रल बैंक अधिक सक्रिय हैं ऊर्जा दक्षता बढ़ी है लेकिन लगातार ऊंचे तेल दाम, भू-राजनीतिक तनाव और महंगाई मिलकर वैश्विक विकास को धीमा कर सकते हैं। अगर होर्मुज स्ट्रेट जल्दी नहीं खुलता तो आने वाले महीनों में दुनिया की अर्थव्यवस्था पर इसका असर और गंभीर हो सकता है।
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