Gold Silver Price Today: अमेरिकी फेडरल रिजर्व के ब्याज दरों से जुड़े फैसले के बाद ग्लोबल कमोडिटी मार्केट में तेज उतार-चढ़ाव देखने को मिला है। इसके बावजूद 18 सितंबर को घरेलू वायदा बाजार यानी मल्टी कमोडिटी एक्सचेंज (MCX) पर सोने और चांदी की कीमतों में रिकवरी जारी रही। सोने की कीमत जहां फिर से ऊंचे स्तर पर पहुंची, वहीं चांदी में भी मजबूत खरीदारी देखने को मिली।
18 सितंबर को MCX पर अक्टूबर कॉन्ट्रैक्ट का सोना करीब ₹1.53 लाख प्रति 10 ग्राम के स्तर पर कारोबार कर रहा था। दूसरी ओर चांदी में करीब 1.20 फीसदी की तेजी रही और यह लगभग ₹2.41 लाख प्रति किलोग्राम के स्तर पर पहुंच गई। हाल की तेजी को देखते हुए निवेशकों के बीच यह सवाल भी उठ रहा है कि कीमती धातुओं में यह तेजी मजबूत बुनियादी कारणों पर आधारित है या फिर बाजार में बना हुआ एक अस्थायी “बबल” है।
हालांकि, उपलब्ध बाजार संकेतों और विशेषज्ञों की राय से यह स्पष्ट है कि मौजूदा तेजी के पीछे एक ही कारण नहीं है। अमेरिकी डॉलर की चाल, अमेरिकी ट्रेजरी यील्ड, फेड की मौद्रिक नीति, कच्चे तेल की कीमतें, रुपये की स्थिति और भू-राजनीतिक घटनाक्रम जैसे कई कारक सोने-चांदी को प्रभावित कर रहे हैं।
कमजोर डॉलर और ट्रेजरी यील्ड से मिला सपोर्ट
ग्लोबल मार्केट में सोने की कीमतों के लिए अमेरिकी डॉलर और ट्रेजरी यील्ड का विशेष महत्व होता है। जब डॉलर कमजोर होता है या अमेरिकी बॉन्ड यील्ड में कमी आती है, तो सोने जैसे नॉन-यील्डिंग एसेट की मांग को सपोर्ट मिल सकता है।
हाल में अमेरिकी फेडरल रिजर्व की ब्याज दरों को लेकर बाजार में काफी अस्थिरता रही। दरों को लेकर संकेतों के कारण अमेरिकी ट्रेजरी यील्ड में तेजी आई थी, लेकिन उसके बाद यील्ड में नरमी देखने को मिली। इसी बदलाव ने कीमती धातुओं को दोबारा सपोर्ट दिया।
आनंद राठी शेयर एंड स्टॉक ब्रोकर्स की कमोडिटीज और करेंसी रिसर्च एनालिस्ट वेदिका नार्वेकर के मुताबिक, हालिया रिकवरी के पीछे ट्रेजरी यील्ड में आई कमी एक प्रमुख कारण है। उन्होंने यह भी बताया कि तेल की कीमतों में नरमी से महंगाई को लेकर कुछ चिंताएं कम हुई हैं, जिसका असर बाजार की उम्मीदों पर पड़ा है।
क्या फेड की पॉलिसी सोने के लिए चुनौती बनी हुई है?
सोने की मौजूदा तेजी के बावजूद जोखिम पूरी तरह खत्म नहीं हुए हैं। अमेरिकी फेडरल रिजर्व की आगे की ब्याज दर नीति अभी भी बाजार की दिशा तय करने वाले प्रमुख कारकों में शामिल है।
अगर अमेरिका में ब्याज दरों को लंबे समय तक ऊंचे स्तर पर बनाए रखने के संकेत मिलते हैं, तो अमेरिकी डॉलर और बॉन्ड यील्ड को सपोर्ट मिल सकता है। ऐसी स्थिति में सोने पर दबाव आ सकता है। इसके उलट ब्याज दरों में नरमी की उम्मीद बढ़ने पर सोने को फायदा मिल सकता है।
वेदिका नार्वेकर ने पिछले कुछ सप्ताह की अस्थिरता के बावजूद गोल्ड ETF में निवेश जारी रहने की ओर भी ध्यान दिलाया है। उनके अनुसार, ETF में लगातार निवेश लंबी अवधि के नजरिए से सोने की मांग को सपोर्ट करने वाला संकेत है। हालांकि, फेड की आगे की नीति अभी भी बाजार के लिए एक महत्वपूर्ण चुनौती बनी हुई है।
चांदी में सोने से ज्यादा उतार-चढ़ाव क्यों?
सोने के साथ-साथ चांदी में भी तेज रिकवरी देखने को मिली है। लेमन (Lemonn) के रिसर्च हेड गौरव गर्ग के मुताबिक, हालिया बिकवाली के बाद अमेरिकी डॉलर और ट्रेजरी यील्ड में नरमी से दोनों कीमती धातुओं में रिकवरी हुई है। हालांकि, चांदी में यह रिकवरी अपेक्षाकृत ज्यादा मजबूत रही है।
इसका एक बड़ा कारण चांदी की दोहरी मांग है। सोने की तरह चांदी में निवेश की मांग तो रहती ही है, लेकिन इसका इस्तेमाल इंडस्ट्रियल सेक्टर में भी बड़े पैमाने पर होता है। इसलिए चांदी की कीमत केवल ब्याज दर और डॉलर की चाल से प्रभावित नहीं होती, बल्कि औद्योगिक गतिविधियों और आर्थिक विकास की उम्मीदों का भी इस पर असर पड़ता है।
यही वजह है कि चांदी में तेजी के दौरान कीमतें तेजी से ऊपर जा सकती हैं, लेकिन बाजार का सेंटीमेंट बदलने पर इसमें सोने की तुलना में ज्यादा उतार-चढ़ाव भी देखने को मिल सकता है।
रुपये की चाल से MCX पर क्या असर पड़ेगा?
भारतीय निवेशकों के लिए अंतरराष्ट्रीय सोने और चांदी की कीमतों के साथ रुपये की विनिमय दर भी बेहद महत्वपूर्ण है। भारत अपनी घरेलू जरूरत का बड़ा हिस्सा कीमती धातुओं के आयात के जरिए पूरा करता है। ऐसे में डॉलर के मुकाबले रुपये में कमजोरी या मजबूती घरेलू कीमतों पर सीधा असर डाल सकती है।
गौरव गर्ग के मुताबिक, डॉलर के मुकाबले रुपया करीब ₹95.94 के आसपास था। अगर रुपया कमजोर रहता है, तो अंतरराष्ट्रीय बाजार में सोने या चांदी की कीमतों में गिरावट का पूरा फायदा घरेलू बाजार को नहीं मिल सकता। वहीं रुपये में मजबूती आने पर अंतरराष्ट्रीय कीमतों की तेजी का कुछ असर कम हो सकता है।
Giottus.com के CEO विक्रम सुब्बुराज ने भी करेंसी मूवमेंट को भारतीय बुलियन बाजार के लिए महत्वपूर्ण कारक बताया है। उनके मुताबिक, रुपये में उतार-चढ़ाव के कारण घरेलू कीमतों का प्रदर्शन अंतरराष्ट्रीय बाजार से अलग हो सकता है।
त्योहार और शादी का सीजन बढ़ा सकता है फिजिकल डिमांड
भारत में त्योहारों और शादियों का सीजन शुरू होने के साथ सोने की फिजिकल डिमांड भी बाजार के लिए महत्वपूर्ण हो सकती है। कीमतें ऊंचे स्तर पर होने के बावजूद त्योहारी खरीदारी में सोने की भूमिका बनी रहती है।
Aspect Bullion & Refinery के CEO दर्शन देसाई के अनुसार, हालिया गिरावट के बाद कुछ खरीदार बाजार में वापस आए हैं। हालांकि, ऊंची कीमतों के कारण ग्राहक फिलहाल खरीदारी को लेकर सतर्क हैं और जरूरत के हिसाब से खरीदारी कर रहे हैं।
उनके मुताबिक, त्योहारों का सीजन आगे बढ़ने पर फिजिकल डिमांड में धीरे-धीरे सुधार देखने को मिल सकता है। खासतौर पर सिक्कों, बार और कम वजन वाली ज्वेलरी की मांग बढ़ सकती है।
इसका मतलब यह है कि घरेलू बाजार में केवल अंतरराष्ट्रीय कीमतें ही महत्वपूर्ण नहीं होंगी। अगर त्योहारी और शादी के सीजन में वास्तविक मांग मजबूत होती है, तो यह घरेलू बुलियन कीमतों को अतिरिक्त सपोर्ट दे सकती है।
क्या सोने-चांदी की तेजी महज “बबल” है?
सोने और चांदी में तेजी को केवल “बबल” कहना अभी जल्दबाजी होगी। बाजार में कीमतें निश्चित रूप से काफी ऊंचे स्तर पर हैं और हालिया उतार-चढ़ाव यह दिखाता है कि कीमती धातुओं में जोखिम भी मौजूद है। लेकिन मौजूदा कीमतों के पीछे कई वास्तविक बाजार कारक भी काम कर रहे हैं।
कमजोर डॉलर, अमेरिकी ट्रेजरी यील्ड में बदलाव, फेड की ब्याज दरों को लेकर उम्मीदें, केंद्रीय बैंकों और निवेशकों की मांग, रुपये की चाल, भू-राजनीतिक जोखिम और भारत में फिजिकल डिमांड जैसे कारक कीमतों को प्रभावित कर रहे हैं।
दूसरी तरफ, अगर अमेरिकी डॉलर मजबूत होता है, ट्रेजरी यील्ड में फिर तेजी आती है या फेड की मौद्रिक नीति बाजार की मौजूदा उम्मीदों से ज्यादा सख्त रहती है, तो सोने-चांदी में मुनाफावसूली देखने को मिल सकती है।
इसलिए मौजूदा तेजी को सिर्फ एक दिशा में चलने वाला ट्रेंड मानना जोखिमपूर्ण हो सकता है। खासकर चांदी में औद्योगिक मांग और निवेश मांग दोनों होने के कारण कीमतों में उतार-चढ़ाव अधिक रह सकता है।
निवेशकों को किन बातों पर नजर रखनी चाहिए?
भारतीय निवेशकों के लिए आगे सोने और चांदी की दिशा समझने के लिए कुछ प्रमुख संकेतकों पर नजर रखना जरूरी होगा। इनमें अमेरिकी फेड की अगली नीति और उसके संकेत, अमेरिकी डॉलर इंडेक्स, ट्रेजरी यील्ड, कच्चे तेल की कीमत, रुपये की विनिमय दर और भू-राजनीतिक घटनाक्रम शामिल हैं।
इसके अलावा भारत में त्योहारी और शादी के सीजन की फिजिकल डिमांड भी महत्वपूर्ण रहेगी। अगर ऊंची कीमतों के बावजूद खरीदारी बनी रहती है, तो घरेलू बाजार को सपोर्ट मिल सकता है। वहीं मांग कमजोर पड़ने पर ऊंची कीमतें मुनाफावसूली का कारण बन सकती हैं।
विक्रम सुब्बुराज ने भी मौजूदा तेजी को बाजार में जारी उतार-चढ़ाव के संदर्भ में देखने की बात कही है। उन्होंने लंबी अवधि के निवेशकों के लिए चरणबद्ध तरीके से निवेश करने का सुझाव दिया है। वहीं फ्यूचर्स में लेवरेज के साथ ट्रेडिंग करने वाले निवेशकों के लिए जोखिम अधिक हो सकता है, क्योंकि कीमतों में छोटी अवधि में तेज बदलाव देखने को मिल सकते हैं।
आगे क्या हो सकता है सोने-चांदी का रुख?
फिलहाल सोने और चांदी के लिए तस्वीर कई कारकों पर निर्भर है। अगर डॉलर और अमेरिकी यील्ड में नरमी बनी रहती है तथा भू-राजनीतिक जोखिमों के कारण सुरक्षित निवेश की मांग मजबूत रहती है, तो कीमती धातुओं को सपोर्ट मिल सकता है।
इसके विपरीत, अमेरिकी ब्याज दरों को लेकर सख्त रुख, डॉलर में मजबूती और बॉन्ड यील्ड में बढ़ोतरी से कीमतों पर दबाव बन सकता है। भारत में रुपये की कमजोरी घरेलू कीमतों को अंतरराष्ट्रीय बाजार की तुलना में ऊंचे स्तर पर बनाए रखने में भूमिका निभा सकती है।
इसलिए MCX पर आई मौजूदा रिकवरी को सिर्फ तेजी या “बबल” के नजरिए से देखने के बजाय उन आर्थिक और वैश्विक संकेतकों को समझना जरूरी है, जो इन कीमतों को प्रभावित कर रहे हैं। निवेशकों को अपनी जोखिम क्षमता और निवेश अवधि को ध्यान में रखकर ही कोई फैसला लेना चाहिए।
Source: यह लेख उपलब्ध बाजार जानकारी और विशेषज्ञों के विचारों पर आधारित है।
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