Gold Investment: सोने की कीमतों में पिछले कुछ वर्षों में जबरदस्त तेजी देखने को मिली है, लेकिन क्या मौजूदा स्तर पर निवेश करना सही रहेगा? ब्रोकरेज फर्म Motilal Oswal Financial Services (MOFSL) का मानना है कि निवेशकों को इस समय एकमुश्त निवेश करने से बचना चाहिए। ब्रोकरेज का कहना है कि सोने में पहले 6% से 8% तक की गिरावट आ सकती है, जिसके बाद अगले 12 से 15 महीनों में इसमें फिर से मजबूत तेजी देखने को मिल सकती है। ऐसे में चरणबद्ध (SIP या स्टैगर्ड) निवेश की रणनीति अधिक फायदेमंद हो सकती है।
सोने में निवेश की रणनीति क्यों बदलने की जरूरत?
हाल के वर्षों में सोना निवेशकों के लिए सबसे बेहतर प्रदर्शन करने वाली संपत्तियों में शामिल रहा है। बढ़ती वैश्विक अनिश्चितता, केंद्रीय बैंकों की खरीदारी और महंगाई की चिंताओं ने इसकी कीमतों को नई ऊंचाइयों तक पहुंचाया।
हालांकि, MOFSL का मानना है कि अब केवल भू-राजनीतिक तनाव ही सोने की कीमतों को प्रभावित नहीं करता। अमेरिकी महंगाई, फेडरल रिजर्व की ब्याज दरें, रियल यील्ड और वैश्विक लिक्विडिटी जैसे आर्थिक कारक भी सोने की दिशा तय करने में अहम भूमिका निभा रहे हैं।
क्या अभी सोना खरीदना चाहिए?
ब्रोकरेज की सलाह है कि लंबी अवधि के निवेशक जल्दबाजी में बड़ी रकम निवेश न करें। यदि किसी निवेशक का लक्ष्य लंबी अवधि का है, तो वह अलग-अलग स्तरों पर धीरे-धीरे निवेश करे।
MOFSL का अनुमान है कि मौजूदा स्तर से सोने की कीमतों में 6% से 8% तक का करेक्शन देखने को मिल सकता है। इसके बाद अगले 12 से 15 महीनों में सोना फिर से मजबूत तेजी दिखा सकता है।
भारतीय निवेशकों के लिए अहम स्तर
ब्रोकरेज के अनुसार:
- ₹1.30 लाख से ₹1.33 लाख प्रति 10 ग्राम का स्तर खरीदारी के लिए आकर्षक माना जा सकता है।
- मीडियम टर्म लक्ष्य: ₹1.68 लाख प्रति 10 ग्राम
- लॉन्ग टर्म लक्ष्य: ₹1.93 लाख प्रति 10 ग्राम
इसलिए निवेशकों को गिरावट का इंतजार करते हुए चरणबद्ध निवेश की रणनीति अपनाने की सलाह दी गई है।
ब्याज दरें सोने के लिए क्यों अहम हैं?
सोना ऐसी संपत्ति है जो नियमित आय (Interest Income) नहीं देती। इसके विपरीत फिक्स्ड डिपॉजिट, बॉन्ड और अन्य डेट इंस्ट्रूमेंट्स निवेशकों को ब्याज प्रदान करते हैं।
ऐसे में जब रियल यील्ड बढ़ती है, तो निवेशक ब्याज देने वाले विकल्पों की ओर आकर्षित होते हैं, जिससे सोने पर दबाव बढ़ सकता है। वहीं यदि ब्याज दरों में कटौती की संभावना बनती है या रियल यील्ड घटती है, तो सोने की मांग बढ़ सकती है।
किन फैक्टर्स पर रखें नजर?
ब्रोकरेज का कहना है कि आने वाले महीनों में निवेशकों को इन प्रमुख संकेतकों पर नजर रखनी चाहिए—
- अमेरिकी महंगाई (US Inflation)
- फेडरल रिजर्व की ब्याज दरों पर फैसले
- रियल यील्ड में बदलाव
- वैश्विक लिक्विडिटी
- केंद्रीय बैंकों की सोने की खरीदारी
- गोल्ड ETF में निवेश का ट्रेंड
- वैश्विक आर्थिक और भू-राजनीतिक घटनाक्रम
इन सभी कारकों का सीधा असर सोने की कीमतों पर पड़ सकता है।
चांदी को लेकर क्या है ब्रोकरेज की राय?
MOFSL का कहना है कि चांदी की चाल अक्सर सोने से अलग रहती है। इसकी सबसे बड़ी वजह यह है कि चांदी केवल निवेश का माध्यम नहीं बल्कि एक महत्वपूर्ण औद्योगिक धातु भी है।
इलेक्ट्रॉनिक्स, सोलर एनर्जी, रिन्यूएबल एनर्जी, इलेक्ट्रिक व्हीकल्स और अन्य औद्योगिक क्षेत्रों में चांदी की मजबूत मांग रहती है। इसलिए इसकी कीमतों में सोने की तुलना में अधिक उतार-चढ़ाव देखने को मिल सकता है।
चांदी की कीमतों पर इन कारकों का विशेष प्रभाव पड़ता है—
- औद्योगिक मांग
- वैश्विक आर्थिक गतिविधियां
- निवेशकों की खरीदारी
- ब्याज दरों में बदलाव
- डॉलर इंडेक्स की चाल
निवेशकों के लिए क्या है सलाह?
ब्रोकरेज का मानना है कि सोना और चांदी दोनों ही लंबी अवधि में पोर्टफोलियो में विविधता (Diversification) लाने के लिए अच्छे विकल्प बने रहेंगे। हालांकि निवेशकों को छोटी अवधि की तेजी या गिरावट के आधार पर निर्णय लेने के बजाय अनुशासित और चरणबद्ध निवेश की रणनीति अपनानी चाहिए।
विशेषज्ञों का मानना है कि आने वाले समय में महंगाई, ब्याज दरों और केंद्रीय बैंकों की नीतियां कीमती धातुओं की दिशा तय करने में सबसे महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगी।
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