El Nino Impact on India GDP: अल-नीनो को लेकर भारत की अर्थव्यवस्था पर चिंता जरूर जताई जा रही है, लेकिन हालिया आर्थिक आंकड़े फिलहाल राहत देने वाले हैं। सिटीग्रुप के एमडी और चीफ इकोनॉमिस्ट (इंडिया) समीरन चक्रवर्ती के मुताबिक, अल-नीनो के कारण वित्त वर्ष 2026-27 में भारत की GDP ग्रोथ में 20 से 30 बेसिस पॉइंट की कमी आ सकती है। हालांकि, मजबूत घरेलू मांग और ग्रामीण अर्थव्यवस्था के बेहतर प्रदर्शन से इस झटके की काफी हद तक भरपाई संभव है।
अल-नीनो से GDP पर कितना असर पड़ सकता है?
अल-नीनो की वजह से मानसून और कृषि उत्पादन पर असर पड़ने की आशंका रहती है। इसका सीधा प्रभाव ग्रामीण आय, खाद्य कीमतों और निजी खपत पर पड़ सकता है। इसी वजह से भारतीय अर्थव्यवस्था की ग्रोथ को लेकर भी चिंता जताई जा रही है।
सिटीग्रुप के अर्थशास्त्री समीरन चक्रवर्ती ने मनीकंट्रोल को दिए एक इंटरव्यू में अनुमान जताया कि FY27 में अल-नीनो के कारण भारत की GDP ग्रोथ में करीब 20 से 30 बेसिस पॉइंट की कमी हो सकती है। हालांकि, उनका कहना है कि फिलहाल हाई-फ्रीक्वेंसी आर्थिक आंकड़ों में अल-नीनो का बड़ा असर नजर नहीं आ रहा है।
उनके मुताबिक, इस बार अल-नीनो का प्रभाव खरीफ फसल की तुलना में रबी सीजन पर अधिक दिखाई दे सकता है। ऐसे में आने वाले महीनों में मौसम और कृषि उत्पादन के आंकड़े काफी महत्वपूर्ण रहेंगे।
ग्रामीण अर्थव्यवस्था से मिल रहे मजबूत संकेत
अल-नीनो की आशंकाओं के बीच ग्रामीण मांग से जुड़े कई आंकड़े सकारात्मक तस्वीर पेश कर रहे हैं। FADA के आंकड़ों के मुताबिक, अप्रैल से जुलाई 2026 यानी FY27 की शुरुआत से देश में ट्रैक्टर बिक्री में सालाना आधार पर करीब 21 फीसदी की बढ़ोतरी हुई है।
इसी अवधि में टू-व्हीलर बिक्री भी लगभग 17 फीसदी बढ़ी है। ग्रामीण इलाकों में ट्रैक्टर और दोपहिया वाहनों की बढ़ती बिक्री को उपभोक्ता मांग और ग्रामीण आय की मजबूती के संकेत के तौर पर देखा जा सकता है।
यानी मौसम से जुड़ी आशंकाओं के बावजूद फिलहाल ग्रामीण बाजार में कमजोरी के स्पष्ट संकेत नहीं दिखाई दे रहे हैं।
मानसून और खाद्य महंगाई की स्थिति
अल-नीनो का सबसे बड़ा जोखिम मानसून और कृषि उत्पादन को लेकर माना जाता है। जून में कम बारिश के कारण देश में कुल बारिश सामान्य से करीब 13 फीसदी कम रही थी। हालांकि, जुलाई और अगस्त में बारिश की स्थिति में सुधार हुआ है।
इसके साथ ही बुवाई का रकबा भी पिछले साल के आसपास बना हुआ है। अभी सब्जियों और अनाज की कीमतों में भी ऐसी असामान्य तेजी नहीं दिख रही है, जिससे खाद्य महंगाई को लेकर तत्काल बड़ी चिंता पैदा हो।
जुलाई 2026 में खाद्य महंगाई दर 5.52 फीसदी रही। हालांकि, मौसम से जुड़ा जोखिम पूरी तरह खत्म नहीं हुआ है। सिटीग्रुप के अनुमान के अनुसार, बड़ा जोखिम वित्त वर्ष 2026-27 की चौथी तिमाही यानी जनवरी से मार्च 2027 के दौरान सामने आ सकता है, खासकर अगर उस समय तापमान सामान्य से काफी अधिक रहता है।
न्यूनतम मजदूरी बढ़ने से ग्रामीण मांग को सहारा
ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूत करने में बढ़ती मजदूरी भी अहम भूमिका निभा रही है। सिटीग्रुप के अर्थशास्त्री के मुताबिक, पिछले करीब दो वर्षों से ग्रामीण मांग शहरी मांग की तुलना में बेहतर बनी हुई है।
2025 से कई राज्यों में न्यूनतम मजदूरी में दोहरे अंकों में बढ़ोतरी हुई है। इससे ग्रामीण आबादी की आय और खर्च करने की क्षमता को सहारा मिला है।
पिछले कुछ वर्षों में कंपनियों की तुलना में श्रमिकों की सौदेबाजी की स्थिति कमजोर रही थी। लेकिन वेतन में हुए समायोजन के बाद लोगों की आय में बढ़ोतरी हुई है। इसका असर रोजमर्रा की खपत और ग्रामीण बाजार की मांग पर भी दिखाई दे रहा है।
सरकारी कदमों से भी बढ़ी घरेलू मांग
भारतीय अर्थव्यवस्था को घरेलू मांग से भी मजबूत समर्थन मिला है। पिछले साल सरकार और रिजर्व बैंक की ओर से उठाए गए राजकोषीय और मौद्रिक कदमों ने अर्थव्यवस्था में मांग और तरलता को सहारा दिया।
इनकम टैक्स में राहत, GST दरों में बदलाव और ब्याज दरों में कटौती जैसे उपायों से लोगों और कारोबारियों के पास खर्च एवं निवेश के लिए अधिक गुंजाइश बनी है।
इसके अलावा बैंकिंग सिस्टम में क्रेडिट ग्रोथ भी मजबूत बनी हुई है। RBI के आंकड़ों के अनुसार, 31 जुलाई 2026 तक सभी शेड्यूल्ड बैंकों का कुल बैंक क्रेडिट करीब ₹225.87 लाख करोड़ पहुंच गया था। यह पिछले साल की समान अवधि के मुकाबले लगभग 19 फीसदी अधिक है।
FMCG कंपनियों की बिक्री ने भी दिया भरोसा
ग्रामीण और छोटे शहरों की मांग का एक अहम संकेत FMCG सेक्टर से भी मिलता है। वित्त वर्ष 2026-27 की पहली तिमाही में कई FMCG कंपनियों ने बिक्री वॉल्यूम में मजबूत वृद्धि दर्ज की है।
FMCG उत्पादों की मांग बढ़ना इस बात का संकेत है कि घरेलू खपत फिलहाल कमजोर नहीं हुई है। अगर ग्रामीण आय, मजदूरी और रोजगार की स्थिति मजबूत बनी रहती है, तो यह मांग आने वाली तिमाहियों में भी अर्थव्यवस्था को सहारा दे सकती है।
क्या भारत अल-नीनो के झटके से बच पाएगा?
फिलहाल उपलब्ध आंकड़ों को देखें तो भारत की अर्थव्यवस्था पर अल-नीनो का असर उतना गंभीर नहीं दिख रहा है, जितनी आशंका पहले जताई जा रही थी। ट्रैक्टर और दोपहिया वाहनों की बिक्री, FMCG वॉल्यूम ग्रोथ, बढ़ती मजदूरी और बैंक क्रेडिट जैसे संकेत घरेलू मांग की मजबूती की ओर इशारा कर रहे हैं।
हालांकि, इसका मतलब यह नहीं है कि अल-नीनो का जोखिम पूरी तरह खत्म हो गया है। अगर रबी सीजन के दौरान मौसम प्रतिकूल रहता है या जनवरी-मार्च 2027 में असामान्य गर्मी पड़ती है, तो कृषि उत्पादन और खाद्य महंगाई पर दबाव बढ़ सकता है।
इसलिए आने वाले महीनों में मानसून, रबी बुवाई, खाद्य कीमतें, ग्रामीण आय और उपभोक्ता मांग के आंकड़े यह तय करने में अहम होंगे कि अल-नीनो भारत की GDP ग्रोथ को कितना प्रभावित करता है।
निष्कर्ष: सिटीग्रुप का अनुमान GDP ग्रोथ में 20-30 बेसिस पॉइंट की संभावित कमी का है, लेकिन फिलहाल मजबूत घरेलू और ग्रामीण मांग भारत को इस मौसम संबंधी जोखिम से काफी हद तक बचाती दिख रही है।
Disclaimer: यह लेख केवल सूचना के उद्देश्य से है। शेयर बाजार और अन्य निवेश बाजार जोखिमों के अधीन हैं। किसी भी निवेश का निर्णय लेने से पहले अपने वित्तीय सलाहकार से सलाह जरूर लें। NewsJagran.in किसी भी व्यक्ति को निवेश करने की सलाह नहीं देता।


