बिहार के बक्सर जिले में स्थित डुमरांव अपनी अनोखी परंपरा के लिए देशभर में खास पहचान रखता है। यहां 15 अगस्त के साथ-साथ 16 अगस्त को भी स्वतंत्रता दिवस मनाया जाता है। इसके पीछे 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन से जुड़ी शहादत की ऐसी कहानी है, जो देशभक्ति, साहस और बलिदान की मिसाल है।
भारत में हर साल 15 अगस्त को स्वतंत्रता दिवस पूरे उत्साह और गर्व के साथ मनाया जाता है। देशभर में तिरंगा फहराया जाता है और स्वतंत्रता सेनानियों के बलिदान को याद किया जाता है। लेकिन बिहार का एक शहर ऐसा भी है, जहां आजादी का जश्न 16 अगस्त को मनाने की अनोखी परंपरा है।
बक्सर जिले का डुमरांव 16 अगस्त को स्वतंत्रता दिवस मनाने के लिए जाना जाता है। इस दिन यहां तिरंगा फहराने के साथ उन चार वीर स्वतंत्रता सेनानियों को श्रद्धांजलि दी जाती है, जिन्होंने 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान अंग्रेजी हुकूमत की गोलीबारी में अपने प्राण न्योछावर कर दिए थे।
अनोखी परंपरा की कहानी

जहां देश के बाकी हिस्सों में 15 अगस्त को स्वतंत्रता दिवस मनाया जाता है, वहीं डुमरांव में 16 अगस्त का दिन भी बेहद खास माना जाता है। इस दिन स्थानीय लोग शहीद स्मारक पर पहुंचते हैं, तिरंगा फहराते हैं और स्वतंत्रता संग्राम के शहीदों को नमन करते हैं।
यह परंपरा कई दशकों से चली आ रही है। 16 अगस्त का आयोजन सिर्फ एक उत्सव नहीं, बल्कि उन लोगों की याद में मनाया जाता है जिन्होंने अंग्रेजी शासन के खिलाफ संघर्ष करते हुए अपनी जान दे दी थी।
1942 में अंग्रेजों के खिलाफ उठी थी आवाज
साल 1942 में महात्मा गांधी के ‘करो या मरो’ के आह्वान के बाद देशभर में भारत छोड़ो आंदोलन तेज हो गया था। डुमरांव भी इस आंदोलन से अछूता नहीं रहा। बड़ी संख्या में स्थानीय लोग हाथों में तिरंगा लेकर अंग्रेजी शासन के खिलाफ प्रदर्शन करने के लिए पुलिस थाने की ओर बढ़े।
प्रदर्शनकारियों का मकसद ब्रिटिश शासन के कब्जे वाली इमारत पर तिरंगा फहराना था। इस आंदोलन में युवाओं के साथ महिलाएं और बच्चे भी शामिल हुए। लोगों के भीतर आजादी हासिल करने का जोश इतना ज्यादा था कि वे अंग्रेजी हुकूमत के विरोध में पीछे हटने को तैयार नहीं थे।
तिरंगा फहराने के लिए दे दी जान
प्रदर्शनकारियों को रोकने के लिए अंग्रेज पुलिस ने गोलीबारी शुरू कर दी। इस गोलीकांड में कपिल मुनि, गोपाल कहार, रामदास सोनार और रामदास लोहार शहीद हो गए।
चारों स्वतंत्रता सेनानियों की शहादत के बावजूद आंदोलनकारियों का हौसला नहीं टूटा। उनके बलिदान ने लोगों के भीतर आजादी की भावना को और मजबूत किया। आखिरकार प्रदर्शनकारियों ने तिरंगा फहराकर अपना संकल्प पूरा किया।
इन्हीं वीरों की शहादत की याद में डुमरांव में 16 अगस्त को स्वतंत्रता दिवस मनाने की परंपरा शुरू हुई, जो आज भी जारी है।
पुलिस थाने को बना दिया गया शहीद स्मारक
आजादी के बाद उस स्थान को, जहां अंग्रेज पुलिस ने प्रदर्शनकारियों पर गोली चलाई थी, चारों शहीदों की स्मृति से जोड़ दिया गया। बाद में वहां शहीद स्मारक बनाया गया। यह स्मारक आज भी डुमरांव के लोगों के लिए स्वतंत्रता संग्राम की याद और गौरव का प्रतीक है।
हर साल 16 अगस्त को यहां कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं। बड़ी संख्या में स्थानीय लोग पहुंचकर शहीदों को श्रद्धांजलि देते हैं और उनके बलिदान को याद करते हैं।
सरकारी स्तर पर भी मिली पहचान
डुमरांव की इस ऐतिहासिक परंपरा को समय के साथ सरकारी स्तर पर भी पहचान मिली। बिहार सरकार ने वर्ष 2015 में 16 अगस्त को होने वाले आयोजन को आधिकारिक पहचान दी। इसके बाद इस दिन आयोजित होने वाले कार्यक्रमों को और महत्व मिला।
वर्ष 2017 में बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने शहीद स्मारक पर चारों वीर स्वतंत्रता सेनानियों की प्रतिमाओं का अनावरण किया। इसका उद्देश्य आने वाली पीढ़ियों को भी उनके संघर्ष और बलिदान से परिचित कराना था।
आज भी जिंदा है शहादत की याद
डुमरांव में 16 अगस्त को मनाया जाने वाला स्वतंत्रता दिवस इस बात की याद दिलाता है कि भारत की आजादी केवल एक दिन या एक तारीख की कहानी नहीं है। इसके पीछे देश के अलग-अलग हिस्सों में हुए आंदोलनों, संघर्षों और असंख्य लोगों के बलिदान की लंबी गाथा है।
डुमरांव के चार शहीदों की कहानी भी इसी इतिहास का हिस्सा है। 16 अगस्त को यहां मनाया जाने वाला आयोजन उन वीरों को सम्मान देने का एक अनोखा तरीका है, जिन्होंने तिरंगे की आन के लिए अपने प्राण न्योछावर कर दिए।


