Dollar vs Rupee: भारतीय रुपये पर एक बार फिर दबाव बढ़ गया है। अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में तेजी और घरेलू शेयर बाजार में गिरावट के कारण गुरुवार को रुपया अमेरिकी डॉलर के मुकाबले 44 पैसे कमजोर होकर 94.82 के अस्थायी स्तर पर बंद हुआ। कारोबार के दौरान रुपये ने 94.94 का निचला स्तर भी छुआ। पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव और महंगे क्रूड ने विदेशी मुद्रा बाजार की चिंता बढ़ा दी है।
बिजनेस डेस्क, नई दिल्ली। भारतीय मुद्रा के लिए गुरुवार का कारोबारी सत्र कमजोर रहा। अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में तेजी और घरेलू शेयर बाजार में बिकवाली के दबाव ने रुपये को नीचे खींच लिया। अमेरिकी डॉलर के मुकाबले रुपया 44 पैसे गिरकर 94.82 के अस्थायी स्तर पर बंद हुआ। इससे पहले बुधवार को रुपया 94.38 प्रति डॉलर पर बंद हुआ था।
इंटरबैंक फॉरेन एक्सचेंज मार्केट में गुरुवार को रुपया 94.47 प्रति डॉलर पर खुला। हालांकि, कारोबार आगे बढ़ने के साथ ही घरेलू और वैश्विक बाजारों से मिले कमजोर संकेतों का असर दिखाई देने लगा। रुपये पर दबाव बढ़ा और यह फिसलकर 94.94 प्रति डॉलर के निचले स्तर तक पहुंच गया। अंत में भारतीय मुद्रा 94.82 पर बंद हुई।
रुपये की इस गिरावट के पीछे केवल डॉलर की मजबूती नहीं, बल्कि कच्चे तेल की महंगाई, पश्चिम एशिया में बढ़ता भू-राजनीतिक तनाव और विदेशी निवेश से जुड़ी अनिश्चितता जैसे कई कारक रहे।
क्यों गिरा डॉलर के मुकाबले रुपया?
1. कच्चे तेल की कीमतों में तेज उछाल
भारतीय रुपये पर दबाव बढ़ने की प्रमुख वजह अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में तेजी रही। भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों का एक बड़ा हिस्सा आयात के माध्यम से पूरा करता है। ऐसे में जब अंतरराष्ट्रीय बाजार में क्रूड महंगा होता है, तो देश के तेल आयात का बिल बढ़ने की आशंका पैदा होती है।
इससे भारत को तेल खरीदने के लिए अधिक विदेशी मुद्रा, खासकर अमेरिकी डॉलर, की जरूरत पड़ सकती है। डॉलर की मांग बढ़ने पर रुपये पर दबाव बनता है।
गुरुवार को ब्रेंट क्रूड की कीमत में करीब 3.23 फीसदी की तेजी आई और यह 112.33 डॉलर प्रति बैरल के पार पहुंच गया। कच्चे तेल की कीमतों में इस उछाल के पीछे पश्चिम एशिया में बढ़ता तनाव और ऊर्जा आपूर्ति को लेकर चिंताएं प्रमुख कारण बताए गए।
2. पश्चिम एशिया में तनाव से बढ़ी चिंता
यमन के हूती विद्रोहियों द्वारा सऊदी अरब के ऊर्जा ठिकानों पर हमलों और अमेरिका-ईरान के बीच बढ़ते तनाव की खबरों ने वैश्विक बाजारों में अनिश्चितता बढ़ाई। ऊर्जा आपूर्ति से जुड़े जोखिम बढ़ने पर कच्चे तेल की कीमतों में तेजी आ सकती है।
ऐसी परिस्थितियों में निवेशक जोखिम वाले बाजारों में निवेश को लेकर सतर्क हो जाते हैं। इसका असर उभरते बाजारों की मुद्राओं और शेयर बाजारों पर भी पड़ सकता है।
भारत के लिए यह स्थिति इसलिए महत्वपूर्ण है, क्योंकि महंगा कच्चा तेल व्यापार घाटे और आयात बिल पर दबाव बढ़ा सकता है। यदि लंबे समय तक तेल की कीमतें ऊंची बनी रहती हैं, तो रुपये की चाल पर इसका असर दिखाई दे सकता है।
3. शेयर बाजार में भारी बिकवाली
घरेलू शेयर बाजार में गिरावट ने भी रुपये की कमजोरी को बढ़ाया। गुरुवार को बीएसई सेंसेक्स 460.30 अंक गिरकर 73,249.39 पर बंद हुआ। वहीं, एनएसई निफ्टी 123.70 अंक टूटकर 22,687.65 पर आ गया।
शेयर बाजार में गिरावट और वैश्विक अनिश्चितता के बीच विदेशी निवेशकों की गतिविधियां भी मुद्रा बाजार के लिए महत्वपूर्ण हो जाती हैं। विदेशी निवेशक भारतीय बाजारों से पैसा निकालते हैं, तो उस पूंजी को विदेशी मुद्रा में बदलने की जरूरत रुपये पर दबाव बढ़ा सकती है।
हालांकि, किसी एक कारोबारी सत्र में रुपये की गिरावट को केवल शेयर बाजार की बिकवाली से जोड़ना सही नहीं होगा। कच्चे तेल की कीमतें, डॉलर की मांग, विदेशी पूंजी का प्रवाह और वैश्विक जोखिम की स्थिति भी रुपये की चाल को प्रभावित करती हैं।
डॉलर इंडेक्स की नरमी से मिली कुछ राहत
रुपये में बड़ी गिरावट के बावजूद डॉलर इंडेक्स में हल्की नरमी से भारतीय मुद्रा को कुछ सहारा मिला। डॉलर इंडेक्स प्रमुख वैश्विक मुद्राओं के मुकाबले अमेरिकी डॉलर की चाल को दर्शाता है।
आमतौर पर डॉलर इंडेक्स में गिरावट आने पर दूसरी मुद्राओं को राहत मिल सकती है। हालांकि, इसका मतलब यह नहीं है कि हर स्थिति में रुपया मजबूत होगा। यदि घरेलू स्तर पर डॉलर की मांग अधिक हो या कच्चे तेल जैसी आयातित वस्तुएं महंगी हो जाएं, तो डॉलर इंडेक्स में नरमी के बावजूद रुपये पर दबाव बना रह सकता है।
गुरुवार को रुपये की चाल में भी यही अंतर दिखाई दिया। डॉलर इंडेक्स से कुछ राहत मिलने के बावजूद कच्चे तेल की तेजी और शेयर बाजार की कमजोरी का प्रभाव अधिक रहा।
जियो प्लेटफॉर्म्स IPO से बाजार को क्या मिला सहारा?
रिलायंस जियो प्लेटफॉर्म्स के आईपीओ को मिले मजबूत निवेशक प्रतिसाद ने भी बाजार का ध्यान आकर्षित किया। उपलब्ध कारोबारी जानकारी के अनुसार, आईपीओ में रिटेल निवेशकों के लिए आरक्षित हिस्सा खुलने के शुरुआती दो घंटों के भीतर पूरा सब्सक्राइब हो गया था।
बड़े आईपीओ में विदेशी संस्थागत निवेशकों की भागीदारी और निवेश से जुड़े संभावित पूंजी प्रवाह पर बाजार की नजर रहती है। हालांकि, किसी आईपीओ को मिलने वाला अच्छा रिस्पॉन्स अपने आप रुपये को मजबूत नहीं करता। वास्तविक प्रभाव इस बात पर निर्भर करता है कि निवेश में घरेलू और विदेशी पूंजी का हिस्सा कितना है तथा संबंधित विदेशी मुद्रा लेनदेन किस तरह होता है।
इसके अतिरिक्त, बुधवार को विदेशी संस्थागत निवेशकों (FII) ने भारतीय शेयर बाजार में 1,022.32 करोड़ रुपये की शुद्ध खरीदारी की थी। यह आंकड़ा बाजार के लिए सकारात्मक संकेत था, लेकिन गुरुवार को कच्चे तेल की तेजी और कमजोर बाजार धारणा के बीच रुपये को बड़ी गिरावट से नहीं बचा सका।
एक्सपर्ट्स ने रुपये और कच्चे तेल को लेकर क्या कहा?
एसबीआई सिक्योरिटीज के रिसर्च हेड सनी अग्रवाल के अनुसार, सऊदी अरामको से जुड़े हमले और पश्चिम एशिया में तनाव बढ़ने की खबरों के बाद कच्चे तेल की कीमतों में करीब 3 फीसदी की तेजी देखने को मिली।
वहीं, एलकेपी सिक्योरिटीज के वाइस प्रेसिडेंट और रिसर्च एनालिस्ट जतीन त्रिवेदी ने कहा कि कच्चे तेल का 110 डॉलर प्रति बैरल से ऊपर बने रहना और शेयर बाजार में कमजोरी रुपये पर दबाव डाल रहे हैं।
उनके मुताबिक, पश्चिम एशिया में अनिश्चितता के कारण भारत के आयात बिल में बढ़ोतरी का जोखिम है। इससे रुपये की चाल प्रभावित हो सकती है। उन्होंने आने वाले दिनों में रुपये के 94.45 से 95.25 प्रति डॉलर के दायरे में कारोबार करने की संभावना जताई थी।
यह अनुमान बाजार की उस समय की परिस्थितियों पर आधारित था। वास्तविक विनिमय दर कच्चे तेल की कीमतों, डॉलर की चाल, विदेशी निवेश और भू-राजनीतिक घटनाक्रम के आधार पर बदल सकती है।
रुपये में गिरावट का आम आदमी पर क्या असर पड़ सकता है?
डॉलर के मुकाबले रुपये की कमजोरी का असर केवल विदेशी मुद्रा बाजार तक सीमित नहीं रहता। यदि रुपया लंबे समय तक कमजोर बना रहता है, तो इसका प्रभाव आयात, कारोबार और आम उपभोक्ताओं पर भी पड़ सकता है।
पेट्रोल-डीजल और ईंधन: भारत कच्चे तेल का बड़ा आयातक है। तेल की अंतरराष्ट्रीय कीमतें बढ़ने और रुपया कमजोर होने से तेल आयात की लागत बढ़ सकती है। हालांकि, घरेलू पेट्रोल-डीजल की कीमतें केवल इन दो कारकों से तय नहीं होतीं; इनमें टैक्स, परिवहन लागत और अन्य घटक भी शामिल होते हैं।
इलेक्ट्रॉनिक्स और गैजेट्स: मोबाइल फोन, लैपटॉप और दूसरे इलेक्ट्रॉनिक उत्पादों के आयात या उनके निर्माण में इस्तेमाल होने वाले विदेशी कंपोनेंट की लागत बढ़ सकती है। कंपनियां इस अतिरिक्त लागत को उपभोक्ताओं तक पहुंचाती हैं या नहीं, यह उनकी कीमत नीति और अन्य कारोबारी परिस्थितियों पर निर्भर करता है।
विदेश में पढ़ाई और यात्रा: विदेश में पढ़ाई करने वाले छात्रों तथा विदेश यात्रा की योजना बना रहे लोगों के लिए डॉलर में होने वाले खर्च रुपये के हिसाब से महंगे हो सकते हैं। ट्यूशन फीस, होटल, टिकट और अन्य खर्चों के लिए अधिक रुपये खर्च करने पड़ सकते हैं।
महंगाई पर असर: आयातित कच्चे माल, ऊर्जा और दूसरे सामान की लागत बढ़ने पर कंपनियों के उत्पादन खर्च में इजाफा हो सकता है। यदि यह बढ़ोतरी उपभोक्ताओं तक पहुंचती है, तो महंगाई पर दबाव बढ़ सकता है।
हालांकि, रुपये में एक दिन की गिरावट से इन सभी वस्तुओं की कीमतें तुरंत बढ़ना जरूरी नहीं है। इसका प्रभाव गिरावट की अवधि, अंतरराष्ट्रीय कीमतों और कंपनियों की लागत पर निर्भर करता है।
आगे रुपये की चाल किन बातों पर निर्भर करेगी?
आने वाले कारोबारी सत्रों में रुपये की दिशा तय करने में कच्चे तेल की कीमतें महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती हैं। यदि ब्रेंट क्रूड 110 डॉलर प्रति बैरल से ऊपर बना रहता है, तो भारत के आयात बिल को लेकर चिंताएं बनी रह सकती हैं। दूसरी ओर, पश्चिम एशिया में तनाव कम होने और तेल की कीमतों में नरमी आने से रुपये को राहत मिल सकती है।
इसके अलावा अमेरिकी डॉलर की वैश्विक चाल, भारतीय शेयर बाजार में विदेशी निवेशकों की खरीद-बिक्री और घरेलू आर्थिक संकेतकों पर भी नजर रहेगी। भारतीय रिजर्व बैंक की नीतिगत कार्रवाई और विदेशी मुद्रा बाजार में उसकी गतिविधियां भी बाजार की परिस्थितियों के अनुसार महत्वपूर्ण हो सकती हैं।
फिलहाल रुपये की कमजोरी यह संकेत देती है कि वैश्विक ऊर्जा बाजार और भू-राजनीतिक घटनाक्रम भारतीय अर्थव्यवस्था तथा वित्तीय बाजारों के लिए अहम बने हुए हैं। हालांकि, किसी निश्चित स्तर पर रुपये के पहुंचने की गारंटी नहीं दी जा सकती।
निष्कर्ष: गुरुवार को डॉलर के मुकाबले रुपया 44 पैसे गिरकर 94.82 के अस्थायी स्तर पर बंद हुआ। कच्चे तेल की कीमतों में तेजी, पश्चिम एशिया में तनाव और घरेलू शेयर बाजार की गिरावट ने भारतीय मुद्रा पर दबाव बढ़ाया। डॉलर इंडेक्स की नरमी और आईपीओ से जुड़ी सकारात्मक गतिविधियों के बावजूद रुपये को पर्याप्त सहारा नहीं मिला। आगे रुपये की चाल इस बात पर निर्भर करेगी कि कच्चे तेल की कीमतें और वैश्विक बाजार की अनिश्चितता किस दिशा में जाती हैं।
डिस्क्लेमर: यह लेख सामान्य आर्थिक और बाजार संबंधी जानकारी के उद्देश्य से तैयार किया गया है। इसे निवेश या विदेशी मुद्रा कारोबार की सलाह न समझें।


