भारत में क्रिप्टोकरेंसी (Cryptocurrency) और वर्चुअल डिजिटल एसेट्स (VDA) को लेकर लंबे समय से स्पष्ट नियम-कानून की मांग की जा रही है। फिलहाल देश में क्रिप्टो ट्रेडिंग पर टैक्स तो लागू है, लेकिन इसके संचालन के लिए कोई अलग रेगुलेटरी फ्रेमवर्क मौजूद नहीं है। अब इस दिशा में एक अहम कदम उठाते हुए संसद की वित्त संबंधी स्थायी समिति ने केंद्र सरकार से क्रिप्टो के लिए एक स्पष्ट नियामकीय ढांचा (Regulatory Framework) तैयार करने की सिफारिश की है।
समिति का मानना है कि स्पष्ट नियम बनने से निवेशकों के हितों की बेहतर सुरक्षा होगी, बाजार में पारदर्शिता बढ़ेगी और मनी लॉन्ड्रिंग, धोखाधड़ी तथा बाजार में हेरफेर जैसे जोखिमों को कम किया जा सकेगा।
संसद की समिति ने क्या सिफारिश की?
संसद की स्थायी समिति ने अपनी रिपोर्ट में कहा है कि क्रिप्टोकरेंसी, नॉन-फंजिबल टोकन (NFT), डीसेंट्रलाइज्ड फाइनेंस (DeFi) टोकन और अन्य सभी वर्चुअल डिजिटल एसेट्स (VDA) के लिए एक Self-Regulatory Organization (SRO) बनाया जाना चाहिए।
समिति के अनुसार यह SRO एक अंतरिम व्यवस्था के तौर पर काम करे और मौजूदा वित्तीय नियामकों की निगरानी में संचालित हो। जब तक सरकार व्यापक कानूनी ढांचा तैयार नहीं करती, तब तक यह व्यवस्था उद्योग में अनुशासन बनाए रखने और निवेशकों की सुरक्षा सुनिश्चित करने में मदद कर सकती है।
SRO क्या होता है?
Self-Regulatory Organization (SRO) ऐसा संगठन होता है जिसे उद्योग के प्रतिभागी मिलकर संचालित करते हैं, लेकिन वह संबंधित सरकारी नियामक की निगरानी में कार्य करता है।
ऐसा संगठन आमतौर पर निम्नलिखित कार्य करता है:
- उद्योग के लिए आचार संहिता (Code of Conduct) तैयार करना।
- पारदर्शिता और खुलासे (Disclosure) सुनिश्चित करना।
- निवेशकों की शिकायतों का समाधान करना।
- नियमों के पालन की निगरानी करना।
- बाजार में अनुशासन बनाए रखना।
समिति ने क्यों जताई चिंता?
समिति ने अपनी रिपोर्ट में कहा कि वर्तमान समय में भारत में क्रिप्टो सेक्टर रेगुलेशन के लिहाज से एक “ग्रे एरिया” बना हुआ है। रिजर्व बैंक (RBI) पहले भी कई बार क्रिप्टोकरेंसी से जुड़े मनी लॉन्ड्रिंग, अवैध लेनदेन और वित्तीय स्थिरता पर पड़ने वाले संभावित जोखिमों को लेकर चिंता जता चुका है।
ऐसे में यदि कोई निवेशक धोखाधड़ी या बाजार में हेरफेर का शिकार होता है तो उसके पास कानूनी सुरक्षा और शिकायत समाधान के सीमित विकल्प मौजूद हैं।
निवेशकों की सुरक्षा पर रहेगा फोकस
समिति ने सरकार को सुझाव दिया है कि भविष्य में बनने वाले रेगुलेटरी फ्रेमवर्क में निम्नलिखित प्रमुख बिंदुओं को शामिल किया जाए—
- गवर्नेंस और जवाबदेही
- पारदर्शिता
- अनिवार्य डिस्क्लोजर
- निवेशकों की सुरक्षा
- शिकायत निवारण तंत्र
- आचार संहिता का पालन
- प्रभावी नियामकीय निगरानी
समिति का कहना है कि ऐसा ढांचा बाजार में विश्वास बढ़ाएगा और निवेशकों को बेहतर सुरक्षा प्रदान करेगा।
अभी भारत में क्या हैं नियम?
फिलहाल भारत में क्रिप्टोकरेंसी पर कोई अलग कानून लागू नहीं है। हालांकि सरकार ने टैक्स से जुड़े नियम लागू किए हुए हैं।
वर्तमान व्यवस्था के तहत:
- क्रिप्टो से होने वाले लाभ पर टैक्स लगाया जाता है।
- लेनदेन पर लागू टीडीएस (TDS) के नियम प्रभावी हैं।
- क्रिप्टो एक्सचेंजों को सरकारी एजेंसियों को लेनदेन की जानकारी उपलब्ध करानी होती है।
- लेकिन निवेशकों की सुरक्षा और उद्योग के संचालन के लिए अलग रेगुलेटरी फ्रेमवर्क मौजूद नहीं है।
इंडस्ट्री एक्सपर्ट्स ने किया स्वागत
Mudrex के संस्थापक और CEO एडुल पटेल ने संसदीय समिति की सिफारिशों का स्वागत करते हुए कहा कि भारत में VDA के लिए स्पष्ट रेगुलेशन की कमी लंबे समय से उद्योग की सबसे बड़ी चिंता रही है।
उन्होंने कहा कि उपभोक्ता सुरक्षा, बाजार में पारदर्शिता और शिकायत निवारण के लिए नियमों का अभाव निवेशकों के लिए जोखिम बढ़ाता है। ऐसे में किसी नियामक की निगरानी में SRO की व्यवस्था एक व्यावहारिक और संतुलित कदम साबित हो सकती है।
पटेल के अनुसार भारतीय क्रिप्टो इंडस्ट्री गवर्नेंस स्टैंडर्ड, डिस्क्लोजर, निवेशकों की सुरक्षा और शिकायत निवारण से जुड़े फ्रेमवर्क को अपनाने के लिए तैयार है, जबकि सरकार व्यापक कानूनी व्यवस्था पर आगे विचार कर सकती है।
दूसरे देशों में क्या है व्यवस्था?
दुनिया के कई देशों ने पहले ही क्रिप्टो एसेट्स के लिए अलग-अलग नियामकीय ढांचे तैयार कर लिए हैं।
- जापान: क्रिप्टो एसेट्स को सिक्योरिटीज कानून के तहत नियामकीय दायरे में रखा गया है।
- अमेरिका: कई मामलों में क्रिप्टो एसेट्स पर Howey Test लागू होता है ताकि यह तय किया जा सके कि कोई एसेट सिक्योरिटी है या नहीं।
- सिंगापुर: सिक्योरिटीज एंड फ्यूचर्स एक्ट के तहत कई डिजिटल एसेट्स को रेगुलेट किया जाता है।
- ब्रिटेन: सरकार ने 2026 में क्रिप्टोएसेट्स से जुड़े नए रेगुलेशन जारी किए हैं।
आगे क्या हो सकता है?
यदि केंद्र सरकार संसद की समिति की सिफारिशों पर अमल करती है तो भारत में पहली बार क्रिप्टोकरेंसी और अन्य डिजिटल एसेट्स के लिए एक व्यवस्थित नियामकीय ढांचा तैयार हो सकता है। इससे निवेशकों का भरोसा बढ़ेगा, उद्योग को स्पष्ट दिशा मिलेगी और डिजिटल एसेट मार्केट अधिक पारदर्शी एवं सुरक्षित बन सकेगा।


