नई दिल्ली: अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल (Crude Oil) की कीमतों में एक बार फिर तेजी देखने को मिल रही है। 15 मई 2026 को क्रूड ऑयल का भाव बढ़कर 108.21 डॉलर प्रति बैरल पहुंच गया, जो पिछले कारोबारी स्तर की तुलना में 2.46 डॉलर ज्यादा है। पश्चिम एशिया में जारी भू-राजनीतिक तनाव, सप्लाई को लेकर बढ़ती चिंताएं और डॉलर की मजबूती के बीच तेल बाजार में अस्थिरता लगातार बनी हुई है।
भारत जैसे बड़े तेल आयातक देश के लिए यह स्थिति चिंता बढ़ाने वाली है क्योंकि देश अपनी जरूरत का लगभग 85% कच्चा तेल विदेशों से खरीदता है। ऐसे में अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल महंगा होने का सीधा असर पेट्रोल-डीजल, ट्रांसपोर्ट, एविएशन और घरेलू महंगाई पर पड़ सकता है।
पिछले कुछ दिनों में तेल बाजार में भारी उतार-चढ़ाव देखने को मिला है। मई 2026 में क्रूड ऑयल का उच्चतम स्तर 113.63 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच चुका है, जबकि न्यूनतम स्तर 100.63 डॉलर रहा। हालांकि पूरे महीने का प्रदर्शन अभी भी हल्की गिरावट दिखा रहा है, लेकिन मौजूदा तेजी ने बाजार और सरकार दोनों की चिंता बढ़ा दी है।
मई 2026 में कच्चे तेल की चाल
| तारीख | कीमत |
|---|---|
| 1 मई 2026 | $107.64 |
| 15 मई 2026 | $108.21 |
| मई का उच्चतम स्तर | $113.63 |
| मई का न्यूनतम स्तर | $100.63 |
| कुल प्रदर्शन | -0.07% |
बाजार विशेषज्ञों का कहना है कि तेल की कीमतों में यह तेजी केवल डिमांड की वजह से नहीं है, बल्कि इसके पीछे भू-राजनीतिक कारण ज्यादा प्रभावी हैं। पश्चिम एशिया में जारी तनाव के कारण निवेशकों को डर है कि अगर सप्लाई प्रभावित हुई तो आने वाले हफ्तों में कीमतें और ऊपर जा सकती हैं।
भारत के लिए क्यों बढ़ी चिंता?
भारत दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा कच्चा तेल आयातक देश है। देश हर साल अरबों डॉलर का तेल आयात करता है। जब अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल महंगा होता है तो भारत का आयात बिल बढ़ जाता है। इससे चालू खाते का घाटा (Current Account Deficit) बढ़ने का खतरा पैदा होता है और रुपये पर दबाव आता है।
हाल के दिनों में रुपया भी डॉलर के मुकाबले रिकॉर्ड निचले स्तरों के करीब पहुंचा है। ऐसे में तेल की कीमतों में तेजी भारत के लिए दोहरी मार साबित हो सकती है। एक तरफ डॉलर मजबूत हो रहा है और दूसरी तरफ तेल महंगा हो रहा है। इसका असर सरकारी वित्तीय गणनाओं से लेकर आम आदमी की जेब तक दिखाई दे सकता है।
विशेषज्ञ मानते हैं कि अगर ब्रेंट क्रूड लंबे समय तक 110 डॉलर के ऊपर बना रहता है तो भारत में पेट्रोल और डीजल की कीमतों में फिर बढ़ोतरी देखने को मिल सकती है। इससे पहले तेल कंपनियां लागत बढ़ने का दबाव झेल चुकी हैं और हाल में ईंधन कीमतों में बढ़ोतरी भी की गई थी।
पेट्रोल-डीजल फिर हो सकते हैं महंगे
कच्चे तेल की कीमत और घरेलू ईंधन कीमतों के बीच सीधा संबंध होता है। जब अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल महंगा होता है तो ऑयल मार्केटिंग कंपनियों की लागत बढ़ती है। अगर सरकार टैक्स में राहत नहीं देती तो कंपनियां कीमतें बढ़ा सकती हैं।
इसका असर केवल पेट्रोल पंप तक सीमित नहीं रहता। डीजल महंगा होने से ट्रकों की ऑपरेटिंग लागत बढ़ती है, जिससे खाद्य पदार्थों, FMCG उत्पादों, निर्माण सामग्री और रोजमर्रा के सामान की कीमतों पर असर पड़ता है।
2022 के रूस-यूक्रेन युद्ध के दौरान भी भारत को इसी तरह के दबाव का सामना करना पड़ा था। उस समय रूस से डिस्काउंट पर तेल खरीदने से भारत को कुछ राहत मिली थी, लेकिन इस बार स्थिति ज्यादा जटिल मानी जा रही है क्योंकि वैश्विक शिपिंग रूट और इंश्योरेंस कॉस्ट भी प्रभावित हो रहे हैं।
एविएशन और उद्योगों पर भी असर
तेल की कीमतों में तेजी का असर एविएशन सेक्टर पर भी पड़ सकता है। एयरलाइंस कंपनियों के लिए एविएशन टर्बाइन फ्यूल (ATF) सबसे बड़े खर्चों में से एक होता है। ATF महंगा होने पर एयर टिकट की कीमतें बढ़ सकती हैं।
इसके अलावा पेंट, केमिकल, प्लास्टिक, सीमेंट और लॉजिस्टिक्स सेक्टर पर भी दबाव बढ़ सकता है क्योंकि इनमें से कई उद्योग सीधे या अप्रत्यक्ष रूप से पेट्रोलियम उत्पादों पर निर्भर हैं।
भारत की मैन्युफैक्चरिंग लागत बढ़ने से निर्यात प्रतिस्पर्धा पर भी असर पड़ सकता है। ऐसे समय में जब वैश्विक अर्थव्यवस्था पहले से धीमी वृद्धि और महंगाई की चुनौती झेल रही है, तेल की तेजी कई देशों के लिए नई परेशानी बन सकती है।
क्या RBI की रणनीति बदल सकती है?
अगर तेल की कीमतें लगातार ऊंची बनी रहती हैं तो भारत में महंगाई बढ़ सकती है। इससे रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया (RBI) के लिए ब्याज दरों में कटौती करना मुश्किल हो सकता है।
महंगाई बढ़ने पर RBI आमतौर पर सतर्क रुख अपनाता है ताकि कीमतों पर नियंत्रण रखा जा सके। ऐसे में होम लोन, ऑटो लोन और बिजनेस लोन की EMI पर असर पड़ सकता है।
कई अर्थशास्त्रियों का मानना है कि अगर कच्चा तेल 115 डॉलर के करीब पहुंचता है तो भारत के चालू खाते के घाटे और वित्तीय घाटे दोनों पर दबाव बढ़ सकता है। इससे विदेशी निवेशकों की धारणा भी प्रभावित हो सकती है।
आगे क्या?
बाजार की नजर अब पश्चिम एशिया की स्थिति, OPEC+ देशों के फैसलों और अमेरिकी इन्वेंट्री डेटा पर बनी हुई है। अगर सप्लाई को लेकर डर बढ़ता है तो तेल की कीमतें फिर तेजी पकड़ सकती हैं। दूसरी ओर अगर वैश्विक मांग कमजोर पड़ती है तो कीमतों में कुछ राहत देखने को मिल सकती है।
हालांकि फिलहाल संकेत यही हैं कि आने वाले समय में तेल बाजार में उतार-चढ़ाव जारी रह सकता है। भारत के लिए सबसे बड़ी चुनौती महंगे तेल और कमजोर रुपये के बीच संतुलन बनाए रखने की होगी।
Source: GoodReturns commodity data, international crude oil market trends, commodity trading updates.
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