Crude Oil Price: अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में सोमवार, 14 सितंबर को जोरदार तेजी देखने को मिली। सऊदी अरब में एक अहम पाइपलाइन पर हुए हमले के बाद उसके संचालन को एहतियातन रोक दिया गया है। इससे पहले से दबाव में चल रही वैश्विक तेल आपूर्ति को लेकर चिंता और बढ़ गई है। सप्लाई बाधित होने की आशंका के बीच ब्रेंट क्रूड की कीमत करीब 3.6 फीसदी उछलकर 108 डॉलर प्रति बैरल के करीब पहुंच गई, जबकि अमेरिकी वेस्ट टेक्सास इंटरमीडिएट (WTI) क्रूड 103 डॉलर प्रति बैरल के आसपास पहुंच गया।
तेल बाजार में इस तेजी को केवल एक पाइपलाइन के बंद होने से जोड़कर नहीं देखा जा रहा है। पश्चिम एशिया में लगातार बढ़ता भू-राजनीतिक तनाव, अहम समुद्री मार्गों पर जोखिम और तेल निर्यात को लेकर बढ़ती अनिश्चितता ने ट्रेडर्स की चिंता बढ़ा दी है। अगर सऊदी अरब की सप्लाई व्यवस्था लंबे समय तक प्रभावित रहती है, तो आने वाले दिनों में कच्चे तेल की कीमतों पर और दबाव देखने को मिल सकता है।
सऊदी अरब ने क्यों रोकी ईस्ट-वेस्ट पाइपलाइन?
सऊदी अरब ने शुक्रवार को बाजार बंद होने के बाद बताया कि पिछले दिन हुए हमलों के बाद एहतियाती कदम के तौर पर उसने अपनी ईस्ट-वेस्ट पाइपलाइन का संचालन रोक दिया है। यह पाइपलाइन सऊदी अरब के तेल परिवहन ढांचे का महत्वपूर्ण हिस्सा है और इसके जरिए देश के पूर्वी हिस्से से तेल को पश्चिमी तट की ओर पहुंचाया जाता है।
सबसे बड़ी चिंता यह है कि सऊदी अरब ने अभी तक यह स्पष्ट नहीं किया है कि पाइपलाइन सामान्य क्षमता के साथ कब दोबारा काम करना शुरू करेगी। यही अनिश्चितता तेल बाजार में जोखिम प्रीमियम को बढ़ा रही है।
तेल बाजार में किसी प्रमुख उत्पादक देश की लॉजिस्टिक व्यवस्था में व्यवधान की खबर आने पर ट्रेडर्स भविष्य की उपलब्धता को लेकर कीमतों में तेजी से बदलाव करते हैं। मौजूदा स्थिति में भी यही देखने को मिला है।
यानबू स्टोरेज से कितने दिन संभल सकती है सप्लाई?
DBS बैंक के सुवरो सरकार के मुताबिक, सऊदी अरब में मौजूद यानबू स्टोरेज करीब पांच से सात दिनों तक तेल निर्यात को बनाए रखने में मदद कर सकता है। हालांकि, अगर इस अवधि के भीतर पाइपलाइन की मरम्मत और सामान्य संचालन को लेकर स्पष्टता नहीं आती है, तो इसके बाद सप्लाई में बड़ी रुकावट का जोखिम बढ़ सकता है।
यही वजह है कि बाजार की नजर अब इस बात पर है कि सऊदी अरब पाइपलाइन को कब तक सामान्य स्थिति में ला पाता है। यदि व्यवधान लंबा खिंचता है तो वैश्विक बाजार में उपलब्ध अतिरिक्त तेल की मात्रा पर दबाव पड़ सकता है।
सुवरो सरकार का अनुमान है कि मरम्मत के समय को लेकर स्पष्टता नहीं आने तक कच्चे तेल की कीमत निकट भविष्य में 120 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच सकती है। हालांकि यह एक बाजार अनुमान है और वास्तविक कीमतें सप्लाई, मांग, भू-राजनीतिक घटनाओं और प्रमुख तेल उत्पादक देशों की प्रतिक्रिया पर निर्भर करेंगी।
होर्मुज जलडमरूमध्य को लेकर भी बढ़ी चिंता
तेल बाजार की चिंता केवल सऊदी पाइपलाइन तक सीमित नहीं है। सोमवार को ईरान और कई अन्य खाड़ी देशों के बीच प्रस्तावित बैठक भी टाल दी गई। बहरीन ने ईस्ट-वेस्ट पाइपलाइन पर हुए हमलों का हवाला देते हुए बैठक में शामिल होने से इनकार किया है।
रिपोर्टों के मुताबिक, सऊदी अरब को भी बैठक को लेकर कुछ आपत्तियां हैं। इस बैठक में होर्मुज जलडमरूमध्य से होकर एक अस्थायी शिपिंग लेन बनाने के मुद्दे पर चर्चा होनी थी।
होर्मुज दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण ऊर्जा मार्गों में से एक है। इसलिए इस क्षेत्र में किसी भी तरह का व्यवधान या जहाजों की आवाजाही को लेकर अनिश्चितता अंतरराष्ट्रीय तेल बाजार के लिए बड़ा जोखिम बन सकती है।
बाब अल-मंडेब पर हूतियों की गतिविधि भी चिंता का कारण
ट्रेडर्स पश्चिम एशिया के एक अन्य महत्वपूर्ण समुद्री मार्ग बाब अल-मंडेब जलडमरूमध्य पर भी नजर बनाए हुए हैं। यहां हूतियों की बढ़ती गतिविधियों को लेकर चिंता बनी हुई है।
बाब अल-मंडेब और होर्मुज जलडमरूमध्य अलग-अलग समुद्री मार्ग हैं, लेकिन दोनों वैश्विक ऊर्जा सप्लाई चेन के लिए रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण हैं। इन मार्गों पर जहाजों की आवाजाही में किसी भी बड़े व्यवधान से तेल और अन्य ऊर्जा उत्पादों के परिवहन की लागत और समय दोनों बढ़ सकते हैं।
ऐसे में बाजार केवल मौजूदा सप्लाई को नहीं देख रहा है, बल्कि भविष्य में संभावित व्यवधानों के जोखिम को भी कच्चे तेल की कीमत में शामिल कर रहा है।
अमेरिका भी ईरान पर बढ़ा सकता है आर्थिक दबाव
इसी बीच अमेरिका की ओर से ईरान पर आर्थिक दबाव और बढ़ाए जाने की संभावना ने भी बाजार का ध्यान खींचा है। अमेरिकी ट्रेजरी सेक्रेटरी स्कॉट बेसेंट सोमवार को ईरान की आर्थिक क्षमताओं पर और रोक लगाने के उद्देश्य से एक बड़े बैंक के खिलाफ प्रतिबंधों की घोषणा करने की योजना बना रहे हैं।
अगर ईरान पर नए प्रतिबंध लगाए जाते हैं, तो पश्चिम एशिया में पहले से मौजूद तनाव और बढ़ सकता है। तेल बाजार में ईरान से जुड़े किसी भी घटनाक्रम को बेहद संवेदनशील माना जाता है, क्योंकि इससे क्षेत्रीय सप्लाई और शिपिंग रूट दोनों प्रभावित होने की आशंका रहती है।
भारत पर क्या हो सकता है असर?
कच्चे तेल की कीमतों में लगातार तेजी भारत जैसे बड़े तेल आयातक देश के लिए महत्वपूर्ण है। भारत अपनी घरेलू जरूरत का बड़ा हिस्सा आयात के जरिए पूरा करता है। इसलिए अंतरराष्ट्रीय बाजार में क्रूड महंगा होने पर देश के आयात बिल, रुपये की स्थिति और महंगाई पर दबाव बढ़ सकता है।
अगर ब्रेंट क्रूड लंबे समय तक 100 डॉलर से ऊपर बना रहता है और आगे 110-120 डॉलर के स्तर की ओर जाता है, तो इसका असर पेट्रोल-डीजल की कीमतों के साथ-साथ परिवहन, लॉजिस्टिक्स और कई उद्योगों की लागत पर भी पड़ सकता है। हालांकि घरेलू ईंधन की कीमतों पर वास्तविक असर कई अन्य कारकों पर भी निर्भर करता है।
तेल महंगा होने से भारत का व्यापार घाटा भी बढ़ सकता है और डॉलर की मांग बढ़ने की स्थिति में रुपये पर दबाव आ सकता है। इसका अप्रत्यक्ष असर उन कंपनियों पर भी पड़ सकता है जिनकी लागत में कच्चे तेल या उससे जुड़े उत्पादों की बड़ी हिस्सेदारी होती है।
अभी बाजार की नजर किन बातों पर?
फिलहाल कच्चे तेल के बाजार के लिए तीन बातें सबसे अहम हैं। पहली, सऊदी अरब की ईस्ट-वेस्ट पाइपलाइन कितने समय में सामान्य होती है। दूसरी, होर्मुज और बाब अल-मंडेब जैसे रणनीतिक समुद्री मार्गों पर तनाव किस दिशा में जाता है। तीसरी, अमेरिका और ईरान के बीच आर्थिक एवं राजनीतिक तनाव कितना बढ़ता है।
अगर सऊदी पाइपलाइन जल्द सामान्य हो जाती है और समुद्री मार्गों पर कोई बड़ा व्यवधान नहीं आता, तो कीमतों में आई कुछ तेजी वापस भी हो सकती है। लेकिन यदि पाइपलाइन की मरम्मत लंबी चलती है और पश्चिम एशिया में तनाव बढ़ता है, तो वैश्विक तेल बाजार में सप्लाई रिस्क और बढ़ सकता है।
Source: अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों और पश्चिम एशिया में सप्लाई जोखिम से जुड़ी रिपोर्टों पर आधारित।
डिस्क्लेमर: कच्चे तेल की कीमतें लगातार बदलती रहती हैं। अंतरराष्ट्रीय क्रूड की कीमतों में बदलाव का घरेलू पेट्रोल-डीजल की कीमतों पर असर तुरंत और समान अनुपात में हो, यह जरूरी नहीं है।


