भारत में टूटे चावल (Broken Rice) की कीमतों में लगातार तेजी देखने को मिल रही है। घरेलू बाजार में बढ़ती मांग और अंतरराष्ट्रीय खरीदारों की दिलचस्पी ने इस कारोबार को एक बार फिर चर्चा में ला दिया है। खासतौर पर एथनॉल बनाने वाली कंपनियों और पोल्ट्री फीड इंडस्ट्री में टूटे चावल की खपत बढ़ने से इसकी उपलब्धता पर दबाव पड़ रहा है। ऐसे में आशंका जताई जा रही है कि सरकार एक बार फिर इसके निर्यात पर प्रतिबंध लगाने पर विचार कर सकती है।
इंडियन राइस एक्सपोर्टर्स फेडरेशन (IREF) ने भी टूटे चावल की बढ़ती कीमतों को लेकर चिंता जाहिर की है। संगठन ने निर्यातकों को नए सौदे करते समय सावधानी बरतने की सलाह दी है। वहीं, सरकार से भी आग्रह किया है कि निर्यात को लेकर कोई बड़ा फैसला लेने से पहले उद्योग से जुड़े लोगों के साथ बातचीत की जाए।
टूटे चावल की कीमतें 360 डॉलर प्रति टन के पार
भारत में 100 फीसदी टूटे चावल की अंतरराष्ट्रीय कीमत 360 डॉलर प्रति टन के पार पहुंच गई है। कीमतों में इस तेजी के पीछे घरेलू औद्योगिक मांग के साथ-साथ विदेशी खरीदारों की बढ़ती दिलचस्पी को भी प्रमुख वजह माना जा रहा है।
उपभोक्ता मामलों के विभाग के आंकड़ों के मुताबिक, 2 नवंबर 2026 को देश में टूटे चावल की औसत थोक कीमत 3,036 रुपये प्रति क्विंटल रही। इसकी तुलना अगर 10 अक्टूबर 2026 से करें तो उस समय कीमत 2,883 रुपये प्रति क्विंटल थी।
इस तरह तीन सप्ताह से कुछ अधिक समय में टूटे चावल की थोक कीमत में 153 रुपये प्रति क्विंटल यानी करीब 5.3 फीसदी की बढ़ोतरी दर्ज की गई है।
वहीं, महंगाई के मोर्चे पर भी टूटे चावल की कीमतों में दबाव दिखाई दे रहा है। सितंबर 2026 में इसकी थोक महंगाई दर सालाना आधार पर 5.38 फीसदी रही, जबकि अगस्त में यह आंकड़ा 4.37 फीसदी था।
इन आंकड़ों से संकेत मिलता है कि टूटे चावल की कीमतों में तेजी केवल अंतरराष्ट्रीय बाजार तक सीमित नहीं है, बल्कि घरेलू बाजार में भी इसका असर दिखाई देने लगा है।
IREF ने निर्यातकों को दी सावधानी बरतने की सलाह
इंडियन राइस एक्सपोर्टर्स फेडरेशन (IREF) के डायरेक्टर जनरल विनोद कौल ने टूटे चावल की कीमतों में हो रही बढ़ोतरी पर ध्यान देने की जरूरत बताई है।
उनके मुताबिक, एथनॉल उत्पादन और पोल्ट्री फीड जैसे उद्योगों में टूटे चावल की मांग बढ़ रही है। इसके अलावा अंतरराष्ट्रीय बाजार में भी भारतीय टूटे चावल के खरीदार सक्रिय हैं।
इससे घरेलू उद्योगों और निर्यात कारोबार के बीच प्रतिस्पर्धा बढ़ रही है। अगर मांग इसी तरह बढ़ती रही और कीमतों में तेजी जारी रही तो सरकार इसके निर्यात पर दोबारा प्रतिबंध लगाने पर विचार कर सकती है।
IREF ने निर्यातकों को सलाह दी है कि वे मौजूदा परिस्थितियों को देखते हुए नए निर्यात सौदे करने में सतर्कता बरतें। इसकी वजह यह है कि अगर सरकार अचानक निर्यात नीति में बदलाव करती है तो पहले से किए गए कारोबारी समझौतों को पूरा करना मुश्किल हो सकता है।
एथनॉल कंपनियों की बढ़ती मांग से क्यों महंगा हो रहा टूटे चावल?
टूटे चावल की मांग बढ़ने के पीछे एथनॉल उद्योग की अहम भूमिका है। भारत में पेट्रोल के साथ एथनॉल मिलाने के कार्यक्रम को बढ़ावा दिया जा रहा है। इसके लिए अलग-अलग अनाजों का इस्तेमाल किया जाता है, जिनमें मक्का, टूटे चावल और भारतीय खाद्य निगम (FCI) का अतिरिक्त चावल शामिल हैं।
सरकार ने एथनॉल उत्पादन के लिए FCI के अतिरिक्त चावल के इस्तेमाल की अनुमति दी है। इसके बावजूद निजी डिस्टिलरी कंपनियां अपनी जरूरतों को पूरा करने के लिए खुले बाजार से भी चावल खरीदती हैं।
ऐसी स्थिति में एथनॉल कंपनियों की ओर से बढ़ती खरीद का सीधा असर बाजार में उपलब्ध टूटे चावल पर पड़ सकता है।
दरअसल, टूटे चावल की कीमत अपेक्षाकृत कम होने के कारण इसका इस्तेमाल औद्योगिक जरूरतों में किया जाता है। जब एथनॉल कंपनियां बड़ी मात्रा में इसकी खरीद करती हैं तो पोल्ट्री फीड निर्माताओं और अन्य खरीदारों के लिए उपलब्धता प्रभावित हो सकती है।
यही वजह है कि एथनॉल उद्योग की बढ़ती मांग को मौजूदा कीमतों में तेजी का एक महत्वपूर्ण कारण माना जा रहा है।
पोल्ट्री फीड इंडस्ट्री में भी बढ़ रही खपत
टूटे चावल का इस्तेमाल केवल एथनॉल बनाने में ही नहीं होता, बल्कि पोल्ट्री फीड उद्योग के लिए भी यह एक महत्वपूर्ण कच्चा माल है।
पोल्ट्री उद्योग में मुर्गियों के चारे के लिए अलग-अलग अनाजों का इस्तेमाल किया जाता है। टूटे चावल को भी इस काम में उपयोग किया जाता है। इसकी कीमत और उपलब्धता पोल्ट्री फीड बनाने वाली कंपनियों के लिए महत्वपूर्ण होती है।
जब एथनॉल कंपनियां और पोल्ट्री फीड निर्माता एक ही कृषि उत्पाद की खरीद के लिए बाजार में सक्रिय होते हैं तो मांग बढ़ने से कीमतों पर दबाव बन सकता है।
इसके अलावा विदेशी खरीदारों की मांग भी बढ़ रही है। ऐसे में घरेलू उद्योगों और निर्यातकों के बीच टूटे चावल की खरीद को लेकर प्रतिस्पर्धा तेज होने की आशंका है।
अगर कीमतें इसी तरह बढ़ती रहीं तो इसका असर पोल्ट्री फीड की लागत और अन्य औद्योगिक खरीदारों के खर्च पर भी पड़ सकता है।
पहले भी टूटे चावल के निर्यात पर लग चुका है प्रतिबंध
भारत सरकार इससे पहले भी घरेलू बाजार में उपलब्धता बनाए रखने और कीमतों को नियंत्रित करने के लिए टूटे चावल के निर्यात पर प्रतिबंध लगा चुकी है।
सितंबर 2022 में सरकार ने 100 फीसदी टूटे चावल के निर्यात पर रोक लगा दी थी। उस समय घरेलू बाजार में चावल की उपलब्धता और कीमतों को लेकर चिंता जताई जा रही थी।
यह प्रतिबंध 7 मार्च 2025 तक लागू रहा। इसके बाद सरकार ने टूटे चावल को दोबारा फ्री एक्सपोर्ट कैटेगरी में शामिल कर दिया। यानी निर्यातकों को इसके निर्यात की अनुमति मिल गई।
अब कीमतों में तेजी और घरेलू उद्योगों की बढ़ती मांग के बीच एक बार फिर निर्यात प्रतिबंध की आशंका सामने आने लगी है।
हालांकि, फिलहाल सरकार की तरफ से टूटे चावल के निर्यात पर दोबारा रोक लगाने को लेकर कोई आधिकारिक घोषणा नहीं की गई है।
रिकॉर्ड चावल उत्पादन के बावजूद क्यों बढ़ रही चिंता?
भारत में चावल का उत्पादन लगातार मजबूत बना हुआ है। IREF के मुताबिक, वित्त वर्ष 2025-26 में देश में चावल का रिकॉर्ड 15.40 करोड़ टन उत्पादन होने का अनुमान है। इससे पिछले साल यानी 2024-25 में उत्पादन करीब 15.01 करोड़ टन था।
इसके अलावा भारत ने इस दौरान लगभग 2.15 करोड़ टन चावल का निर्यात भी किया।
सामान्य तौर पर अधिक उत्पादन का मतलब बाजार में ज्यादा उपलब्धता माना जाता है, लेकिन टूटे चावल के मामले में स्थिति थोड़ी अलग हो सकती है।
दरअसल, कुल चावल उत्पादन और 100 फीसदी टूटे चावल की उपलब्धता एक जैसी चीजें नहीं हैं। चावल की किस्म, मिलिंग प्रक्रिया, घरेलू खपत और औद्योगिक मांग के आधार पर टूटे चावल की उपलब्धता प्रभावित होती है।
इसीलिए IREF का मानना है कि देश में चावल का कुल उत्पादन रिकॉर्ड स्तर पर होने के बावजूद यह जरूरी नहीं है कि टूटे चावल की उपलब्धता भी पर्याप्त हो।
सरकार से IREF ने क्या मांग की?
IREF ने सरकार से आग्रह किया है कि टूटे चावल के निर्यात को लेकर कोई भी नीतिगत फैसला लेने से पहले निर्यातकों, मिलर्स और उद्योग से जुड़े अन्य हितधारकों के साथ बातचीत की जाए।
संगठन का कहना है कि अगर सरकार निर्यात पर प्रतिबंध लगाने का फैसला करती है तो पहले से किए गए निर्यात सौदों को पूरा करने के लिए पर्याप्त समय दिया जाना चाहिए।
इससे निर्यातकों को अपने कारोबारी समझौतों को व्यवस्थित करने और विदेशी खरीदारों के साथ प्रतिबद्धताओं को पूरा करने में मदद मिल सकती है।
फिलहाल टूटे चावल के निर्यात पर किसी नए प्रतिबंध की आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है। लेकिन अंतरराष्ट्रीय कीमतों का 360 डॉलर प्रति टन के पार पहुंचना और घरेलू औद्योगिक मांग में बढ़ोतरी इस बाजार के लिए महत्वपूर्ण संकेत हैं।
आने वाले दिनों में सरकार की नीति और घरेलू बाजार में टूटे चावल की उपलब्धता पर कारोबारियों की नजर रहेगी। अगर कीमतों में तेजी जारी रहती है तो निर्यात नीति में बदलाव की संभावना पर चर्चा और तेज हो सकती है।
Source: इंडियन राइस एक्सपोर्टर्स फेडरेशन (IREF) और उपभोक्ता मामलों के विभाग के उपलब्ध आंकड़ों एवं रिपोर्ट के आधार पर।


