Highlights
- असम से पहली बार कानूनी रूप से अगरवुड चिप्स का निर्यात
- सऊदी अरब और यूएई भेजी गई 2.35 करोड़ रुपये की खेप
- ‘ऊद’ के नाम से मशहूर अगरवुड की खाड़ी देशों में भारी मांग
- लग्जरी परफ्यूम, कॉस्मेटिक्स और धार्मिक उत्पादों में होता है इस्तेमाल
नई दिल्ली। भारत के पूर्वोत्तर राज्य असम से एक ऐसी “अनमोल” चीज दुनिया के बड़े लग्जरी बाजारों तक पहुंची है, जिसकी खुशबू के दीवाने सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात (UAE) जैसे खाड़ी देश लंबे समय से रहे हैं। यह चीज है ‘अगरवुड’, जिसे अंतरराष्ट्रीय बाजार में ‘ऊद’ (Oud) के नाम से जाना जाता है। दुनिया की सबसे महंगी और दुर्लभ सुगंधित सामग्रियों में शामिल अगरवुड की पहली विधिक रूप से स्वीकृत खेप असम से सऊदी अरब और यूएई भेजी गई है।
यह सिर्फ एक एक्सपोर्ट डील नहीं मानी जा रही, बल्कि इसे भारत के अगरवुड उद्योग और असम की कृषि-वनीकरण अर्थव्यवस्था के लिए एक बड़े टर्निंग पॉइंट के तौर पर देखा जा रहा है। उद्योग से जुड़े लोगों का कहना है कि आने वाले वर्षों में यह कारोबार हजारों करोड़ रुपये के स्तर तक पहुंच सकता है।
क्या होता है अगरवुड या ऊद?
अगरवुड एक बेहद दुर्लभ और सुगंधित लकड़ी होती है, जो विशेष प्रकार के पेड़ों में प्राकृतिक संक्रमण के बाद बनती है। यह मुख्य रूप से Aquilaria प्रजाति के पेड़ों से प्राप्त होती है। जब पेड़ में फंगल संक्रमण होता है, तब वह अपनी सुरक्षा के लिए एक गहरे रंग का सुगंधित रेजिन पैदा करता है। यही रेजिन समय के साथ दुनिया की सबसे महंगी खुशबूदार लकड़ियों में बदल जाता है।
अगरवुड की खास बात इसकी गहरी, मीठी और लंबे समय तक टिकने वाली खुशबू है। इसी वजह से इसे अरब देशों में धार्मिक, सांस्कृतिक और लग्जरी जीवनशैली का अहम हिस्सा माना जाता है। खाड़ी देशों में ऊद का इस्तेमाल केवल परफ्यूम तक सीमित नहीं है, बल्कि शाही मेहमाननवाजी, धार्मिक आयोजनों और घरों की खुशबू के लिए भी किया जाता है।
दुनिया के सबसे महंगे कच्चे पदार्थों में क्यों शामिल है?
अगरवुड की कीमत उसकी गुणवत्ता, तेल की मात्रा और सुगंध की गहराई पर निर्भर करती है। उच्च गुणवत्ता वाला अगरवुड अंतरराष्ट्रीय बाजार में लाखों रुपये प्रति किलोग्राम तक बिकता है। कुछ प्रीमियम ग्रेड ऊद ऑयल की कीमत सोने से भी अधिक बताई जाती है।
विशेषज्ञों के अनुसार, इसकी महंगाई के पीछे सबसे बड़ा कारण इसकी दुर्लभता है। हर पेड़ में अगरवुड नहीं बनता और इसे तैयार होने में कई साल लग जाते हैं। इसके अलावा, वैश्विक स्तर पर इसकी मांग लगातार बढ़ रही है, खासकर सऊदी अरब, UAE, कतर और कुवैत जैसे देशों में।
यूरोप और दक्षिण-पूर्व एशिया में भी लग्जरी परफ्यूम इंडस्ट्री में ऊद आधारित उत्पादों की मांग तेजी से बढ़ी है। कई अंतरराष्ट्रीय ब्रांड अब ऊद को प्रीमियम फ्रेगरेंस कैटेगरी में शामिल कर रहे हैं।
असम से पहली बड़ी निर्यात खेप
ऑल असम अगरवुड प्लांटर्स एंड ट्रेडर्स एसोसिएशन के मुताबिक, असम से 2.35 करोड़ रुपये मूल्य की अगरwood चिप्स की पहली कानूनी खेप सऊदी अरब और UAE भेजी गई है। इसमें सऊदी अरब को 100 किलोग्राम और UAE को 12 किलोग्राम अगरवुड चिप्स निर्यात किए गए।
यह खेप गुवाहाटी स्थित लोकप्रिय गोपीनाथ बोरदोलोई अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे के कार्गो टर्मिनल से भेजी गई। अधिकारियों ने बताया कि निर्यात से पहले सभी वैधानिक मंजूरियां और अंतरराष्ट्रीय नियमों का पालन किया गया।
यह इसलिए भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है क्योंकि लंबे समय तक अगरवुड व्यापार कानूनी और नियामकीय जटिलताओं से घिरा रहा। अब सरकार और उद्योग संगठनों के सहयोग से इसे व्यवस्थित और वैध व्यापार के रूप में विकसित किया जा रहा है।
असम का अगरवुड क्यों है खास?
अगरवुड उद्योग से जुड़े विशेषज्ञों का कहना है कि असम में उगाया गया अगरवुड अपनी उच्च गुणवत्ता, बेहतर तेल सामग्री और समृद्ध सुगंध के लिए दुनियाभर में पहचाना जाता है।
पूर्वोत्तर भारत की जलवायु और मिट्टी इस पेड़ के लिए बेहद अनुकूल मानी जाती है। यही वजह है कि अंतरराष्ट्रीय खरीदार असम के अगरवुड को प्रीमियम कैटेगरी में रखते हैं।
ऑल असम अगरवुड प्लांटर्स एंड ट्रेडर्स एसोसिएशन के चेयरमैन जहीरुल इस्लाम ने कहा कि यह उपलब्धि कई वर्षों की रिसर्च, किसानों की भागीदारी, नीतिगत प्रयासों और अंतरराष्ट्रीय मानकों के अनुपालन का परिणाम है।
उनके अनुसार, अगरवुड उद्योग आने वाले समय में असम के ग्रामीण क्षेत्रों में रोजगार और आय का बड़ा स्रोत बन सकता है।
किसानों और अर्थव्यवस्था को कैसे होगा फायदा?
अगरवुड की बढ़ती वैश्विक मांग का सबसे बड़ा फायदा किसानों को मिल सकता है। असम और पूर्वोत्तर के कई इलाकों में किसान अब पारंपरिक खेती के साथ अगरवुड प्लांटेशन की ओर भी बढ़ रहे हैं।
विशेषज्ञों का मानना है कि अगर सरकार और उद्योग मिलकर सप्लाई चेन, प्रोसेसिंग और निर्यात को मजबूत करें तो यह सेक्टर हजारों युवाओं को रोजगार दे सकता है।
इसके अलावा:
- ग्रामीण क्षेत्रों में निवेश बढ़ेगा
- छोटे किसानों की आय में सुधार होगा
- भारत का लग्जरी फ्रेगरेंस एक्सपोर्ट मजबूत होगा
- विदेशी मुद्रा कमाने का नया स्रोत बनेगा
खाड़ी देशों में इतनी ज्यादा मांग क्यों?
सऊदी अरब और UAE जैसे देशों में ऊद सिर्फ एक खुशबू नहीं, बल्कि संस्कृति और सामाजिक प्रतिष्ठा का हिस्सा माना जाता है। वहां ऊद आधारित परफ्यूम और धूप का इस्तेमाल सदियों से होता आ रहा है।
शादी, धार्मिक कार्यक्रम, त्योहार और शाही आयोजनों में ऊद का विशेष महत्व है। यही वजह है कि खाड़ी देशों में इसकी मांग हमेशा ऊंची रहती है।
बाजार विशेषज्ञों के अनुसार, मिडिल ईस्ट में लग्जरी फ्रेगरेंस मार्केट तेजी से बढ़ रहा है और भारतीय अगरवुड इस बाजार में बड़ी हिस्सेदारी हासिल कर सकता है।
भारत के लिए क्यों अहम है यह निर्यात?
भारत लंबे समय से चाय, मसाले और हस्तशिल्प जैसे उत्पादों के लिए वैश्विक पहचान रखता है। अब अगरवुड जैसे हाई-वैल्यू उत्पाद देश के निर्यात पोर्टफोलियो को नई दिशा दे सकते हैं।
यह निर्यात ऐसे समय में हुआ है जब भारत वैल्यू-एडेड कृषि और वन आधारित उत्पादों को बढ़ावा देने की रणनीति पर काम कर रहा है। अगरवुड उद्योग को बढ़ावा मिलने से भारत लग्जरी फ्रेगरेंस और नैचुरल एरोमा मार्केट में मजबूत खिलाड़ी बन सकता है।
विशेषज्ञ मानते हैं कि अगर निर्यात प्रक्रिया आसान बनी रही और गुणवत्ता मानकों पर फोकस किया गया, तो आने वाले वर्षों में भारत का अगरवुड उद्योग वैश्विक बाजार में बड़ी पहचान बना सकता है।
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