Asmita Dey Gold Medal Commonwealth Games 2026: कॉमनवेल्थ गेम्स 2026 में भारत की युवा जुडोका अस्मिता डे ने इतिहास रचते हुए महिलाओं की 48 किलोग्राम वर्ग में गोल्ड मेडल जीत लिया। लेकिन इस ऐतिहासिक जीत के बाद सबसे भावुक पल तब आया, जब पदक जीतने के तुरंत बाद अस्मिता अपने दिवंगत पिता को याद कर फूट-फूटकर रो पड़ीं। उन्होंने कहा कि अगर आज उनके पिता होते तो यह पल सबसे पहले उन्हीं के साथ साझा करतीं।
Highlights
- कॉमनवेल्थ गेम्स 2026 में महिलाओं की 48 किग्रा वर्ग में भारत को गोल्ड
- गोल्ड जीतने वाली पहली भारतीय महिला जुडोका बनीं अस्मिता डे
- जीत के बाद दिवंगत पिता को याद कर भावुक हुईं
- पिता साइकिल रिपेयर कर परिवार का पालन-पोषण करते थे
- मां ने पिता के निधन के बाद टूटने नहीं दिया और फिर से ट्रेनिंग के लिए प्रेरित किया
गोल्ड जीतते ही छलक पड़े आंसू
VIDEO | Glasgow: The first person judoka Asmita Dey wanted to tell about her Commonwealth Games gold was the one person she no longer could do it. Her father, a cycle mechanic who earned barely Rs 300 a day and raised his family in a mud house in a small village in Tripura, died… pic.twitter.com/9dT56LxX4L
— Press Trust of India (@PTI_News) July 31, 2026 कॉमनवेल्थ गेम्स 2026 में भारत के लिए ऐतिहासिक गोल्ड मेडल जीतने के बाद 23 वर्षीय अस्मिता डे खुद को भावनाओं से नहीं रोक सकीं। पोडियम पर खड़े होकर उन्होंने अपने पिता को याद किया और कहा कि यह जीत जितनी उनकी है, उतनी ही उनके पिता की भी है।
अस्मिता ने भावुक होकर कहा,
“जब मेरे पिता गुजर गए, तो मुझे लगा कि सब कुछ खत्म हो गया है क्योंकि वही मेरा सबसे बड़ा सहारा थे। उन्होंने हमेशा मेरा साथ दिया और मुझे बड़े सपने देखने की हिम्मत दी।”
उनकी आंखों से बहते आंसू बता रहे थे कि यह सिर्फ एक गोल्ड मेडल नहीं, बल्कि वर्षों के संघर्ष, त्याग और परिवार के विश्वास की जीत है।
बेहद साधारण परिवार से निकलकर रचा इतिहास
असम के पड़ोसी राज्य त्रिपुरा के एक छोटे से गांव में पली-बढ़ीं अस्मिता डे का बचपन आर्थिक कठिनाइयों के बीच बीता। उनका परिवार मिट्टी के घर में रहता था और उनके पिता साइकिल रिपेयर करके मुश्किल से करीब 300 रुपये प्रतिदिन कमा पाते थे।
कम आय होने के बावजूद उन्होंने कभी अपनी बेटी के सपनों को छोटा नहीं होने दिया। परिवार की आर्थिक स्थिति कमजोर थी, लेकिन पिता ने हर संभव कोशिश की कि अस्मिता की जूडो ट्रेनिंग कभी न रुके।
अस्मिता ने कहा,
“मैं बहुत छोटे गांव से हूं, जहां लोग इतने बड़े सपने नहीं देखते। लेकिन मेरे पापा हमेशा कहते थे कि मेहनत करो, एक दिन जरूर सफल होगी।”
घुटने की चोट आई, लेकिन पिता ने हार नहीं मानने दी
अपने करियर के शुरुआती दौर में अस्मिता को गंभीर घुटने की चोट लगी थी। उस समय ऐसा लगने लगा था कि उनका खेल करियर खत्म हो सकता है।
लेकिन उनके पिता उन्हें इलाज के लिए दिल्ली लेकर आए, दवाइयों का इंतजाम किया और अपनी सीमित आय के बावजूद हर संभव खर्च उठाया।
अस्मिता ने उस दौर को याद करते हुए कहा,
“पापा मुझे इलाज के लिए दिल्ली लाए थे। उन्होंने मेरे लिए दवाइयां खरीदीं और हमेशा विश्वास दिलाया कि मैं फिर से मैट पर लौटूंगी।”
पिता के निधन ने तोड़ दिया था सपना
दिसंबर 2025 में ब्रेन स्ट्रोक के कारण उनके पिता का निधन हो गया। यह घटना अस्मिता के जीवन का सबसे बड़ा झटका साबित हुई।
उन्होंने बताया कि पिता के जाने के बाद उन्हें लगा कि अब उनका सपना भी खत्म हो गया है, क्योंकि वही उनके सबसे बड़े प्रेरणास्रोत थे।
कई दिनों तक वह मानसिक रूप से टूट चुकी थीं और ट्रेनिंग जारी रखना भी मुश्किल लग रहा था।
मां ने निभाई पिता की भूमिका
जब अस्मिता दुख से उबर नहीं पा रही थीं, तब उनकी मां ने पूरे परिवार को संभाला।
पति के अंतिम संस्कार के केवल 10 दिन बाद ही उन्होंने अस्मिता से कहा कि उन्हें फिर से ट्रेनिंग शुरू करनी चाहिए।
मां के शब्द आज भी अस्मिता के लिए सबसे बड़ी ताकत हैं।
“अगर मैं तुम्हें आज रोकती हूं, तो तुम्हारे पिता को लगेगा कि मैं तुम्हारे सपने तोड़ रही हूं।”
यही शब्द अस्मिता को दोबारा मैट तक वापस ले आए और वह भोपाल स्थित स्पोर्ट्स अथॉरिटी ऑफ इंडिया (SAI) सेंटर में ट्रेनिंग के लिए लौट गईं।
गोल्ड से पहले कई रातों तक नहीं आई नींद
कॉमनवेल्थ गेम्स से पहले अस्मिता लगातार मानसिक दबाव में थीं।
उन्होंने बताया कि वह कई-कई रात बिना सोए बिताती थीं। मुकाबलों के बारे में सोचते-सोचते पूरी रात निकल जाती थी और फिर सुबह 5:30 बजे ट्रेनिंग के लिए उठना पड़ता था।
उन्होंने कहा,
“मैंने इस मेडल के लिए बहुत मेहनत की है। भारत में रहते हुए मैं ठीक से सो भी नहीं पाती थी। बस यही सोचती रहती थी कि मुझे जीतना है।”
ग्लासगो पहुंचने के बाद भी उनका तनाव कम नहीं हुआ। लेकिन उन्होंने अपने लक्ष्य पर पूरा ध्यान बनाए रखा।
पसंदीदा मिठाई भी नहीं खाई
अस्मिता ने बताया कि उनके भाई ने उनकी पसंदीदा मिठाई ‘लौंग लत्ता’ लाकर फ्रिज में रखी थी।
कई बार उनका मन उसे खाने का हुआ, लेकिन उन्होंने खुद को रोक लिया क्योंकि उनका पूरा ध्यान सिर्फ गोल्ड मेडल जीतने पर था।
उन्होंने मुस्कुराते हुए कहा,
“मैं कई बार उसे खाने वाली थी, लेकिन फिर खुद को रोक लेती थी। मुझे सिर्फ जीत के बारे में सोचना था।”
भारतीय जूडो के लिए ऐतिहासिक उपलब्धि
शुक्रवार को हासिल किया गया यह गोल्ड मेडल भारतीय जूडो के इतिहास में एक नया अध्याय जोड़ गया। महिलाओं की 48 किलोग्राम वर्ग में कॉमनवेल्थ गेम्स का गोल्ड जीतने वाली अस्मिता डे पहली भारतीय खिलाड़ी बन गई हैं।
उनकी यह सफलता सिर्फ एक व्यक्तिगत उपलब्धि नहीं, बल्कि उन हजारों खिलाड़ियों के लिए प्रेरणा है जो सीमित संसाधनों के बावजूद बड़े सपने देखने का साहस रखते हैं।


