Anil Agarwal Net Worth: वेदांता ग्रुप के चेयरमैन अनिल अग्रवाल ने अपनी संपत्ति को लेकर बड़ा संकल्प लिया है। कभी स्क्रैप यानी कबाड़ के कारोबार से अपने सफर की शुरुआत करने वाले अनिल अग्रवाल आज दुनिया के जाने-माने उद्योगपतियों में शामिल हैं। उनकी अनुमानित संपत्ति करीब ₹43,500 करोड़ बताई जाती है। हालांकि, अब उन्होंने अपनी दौलत का बड़ा हिस्सा अपने परिवार के लिए रखने के बजाय समाज के कल्याण में लगाने का फैसला किया है।
अनिल अग्रवाल ने अपनी 75 फीसदी संपत्ति सामाजिक कार्यों और जनकल्याण के लिए दान करने का संकल्प लिया है। उनके परोपकारी प्रयासों में बच्चों की शिक्षा और पोषण के साथ-साथ महिला सशक्तिकरण और युवाओं के लिए रोजगार के अवसर पैदा करना प्रमुख लक्ष्य हैं।
अनिल अग्रवाल की 75% दौलत कहां खर्च होगी?
अनिल अग्रवाल का मानना है कि कारोबार से अर्जित संपत्ति का इस्तेमाल केवल निजी जरूरतों और परिवार तक सीमित नहीं रहना चाहिए। समाज के कमजोर वर्गों के जीवन में सकारात्मक बदलाव लाने के लिए भी इसका उपयोग होना चाहिए।
उन्होंने अपनी संपत्ति का 75 फीसदी हिस्सा सामाजिक कार्यों के लिए समर्पित करने की बात कही है। इसके तहत खासतौर पर बच्चों की शिक्षा, पोषण, स्वास्थ्य, महिला सशक्तिकरण और युवाओं को रोजगार जैसे क्षेत्रों पर ध्यान दिया जाएगा।
जनवरी 2026 में अपने बेटे अग्निवेश अग्रवाल के निधन के बाद भी उन्होंने इस संकल्प को दोहराया था। इस दौरान उन्होंने ऐसे भारत की कल्पना की, जहां किसी बच्चे को भूखे पेट न सोना पड़े और आर्थिक परेशानी उसकी पढ़ाई में बाधा न बने।
बच्चों और महिलाओं के लिए काम कर रहे हैं अनिल अग्रवाल
अनिल अग्रवाल के परोपकारी कार्यों में बच्चों और महिलाओं से जुड़े कार्यक्रमों को खास महत्व दिया गया है। उनका उद्देश्य शुरुआती उम्र में बच्चों को बेहतर शिक्षा और पोषण उपलब्ध कराने के साथ महिलाओं को आर्थिक रूप से मजबूत बनाना है।
इसी सोच से जुड़ी उनकी प्रमुख पहलों में ‘नंद घर’ परियोजना शामिल है। इस पहल के जरिए देश के आंगनवाड़ी केंद्रों को आधुनिक सुविधाओं से लैस करने का प्रयास किया जा रहा है।
नंद घर के माध्यम से बच्चों को बेहतर पोषण और शुरुआती शिक्षा उपलब्ध कराने के साथ महिलाओं को कौशल प्रशिक्षण और आत्मनिर्भर बनने के अवसर देने पर जोर दिया जाता है।
क्या है नंद घर परियोजना?
नंद घर परियोजना का उद्देश्य पारंपरिक आंगनवाड़ी केंद्रों को ऐसे आधुनिक केंद्रों में बदलना है, जहां बच्चों और महिलाओं दोनों के लिए बेहतर सुविधाएं उपलब्ध हों।
इस पहल के तहत बच्चों के लिए प्री-स्कूल शिक्षा, पोषण और स्वास्थ्य सुविधाओं पर ध्यान दिया जाता है। वहीं महिलाओं के लिए कौशल विकास और आजीविका से जुड़े अवसर उपलब्ध कराने की कोशिश की जाती है।
अनिल अग्रवाल का मानना है कि यदि बच्चों को शुरुआती उम्र से अच्छी शिक्षा और पोषण मिले तथा महिलाओं को आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बनाया जाए, तो इसका असर आने वाली पीढ़ियों पर भी पड़ता है।
कबाड़ के कारोबार से शुरू हुआ सफर
अनिल अग्रवाल की सफलता की कहानी भी काफी दिलचस्प है। बिहार के पटना से निकलकर उन्होंने बेहद छोटे स्तर से अपना कारोबारी सफर शुरू किया था। शुरुआती दौर में उन्होंने स्क्रैप यानी कबाड़ के कारोबार में हाथ आजमाया।
समय के साथ उनका कारोबार बढ़ता गया और उन्होंने मेटल, माइनिंग और अन्य क्षेत्रों में अपना कारोबार फैलाया। इसी सफर ने आगे चलकर वेदांता ग्रुप जैसे बड़े कारोबारी समूह का रूप लिया।
एक साधारण कारोबारी शुरुआत से वैश्विक स्तर के उद्योगपति बनने तक का उनका सफर अक्सर उद्यमिता और संघर्ष की मिसाल के तौर पर देखा जाता है।
दौलत से ज्यादा सामाजिक विरासत पर जोर
अनिल अग्रवाल के 75 फीसदी संपत्ति दान करने के संकल्प से यह संकेत मिलता है कि वह अपनी संपत्ति को केवल व्यक्तिगत उपलब्धि के तौर पर नहीं देखते। उनका जोर इस बात पर है कि आर्थिक संसाधनों का इस्तेमाल समाज के उन वर्गों के लिए भी किया जाए, जिन्हें इसकी सबसे ज्यादा जरूरत है।
बच्चों की शिक्षा और पोषण से लेकर महिलाओं को आत्मनिर्भर बनाने और युवाओं को सम्मानजनक रोजगार देने तक, उनके परोपकारी प्रयासों का दायरा काफी व्यापक है।
उनकी सोच के मुताबिक, किसी व्यक्ति की असली विरासत केवल उसकी संपत्ति या कारोबारी साम्राज्य नहीं होती, बल्कि समाज पर उसके काम का पड़ने वाला प्रभाव भी महत्वपूर्ण होता है।


