देश में खाने-पीने की चीजों की गुणवत्ता और मिलावट को लेकर चिंता लगातार बढ़ रही है। खासकर बच्चों के बीच जंक और अल्ट्रा-प्रोसेस्ड फूड की बढ़ती लोकप्रियता ने अभिभावकों की चिंता बढ़ा दी है। स्कूलों के अंदर और आसपास मोमो, पिज्जा, बर्गर जैसे फूड आइटम्स की बिक्री आम है। ऐसे में खाद्य पदार्थों की सुरक्षा और उनकी गुणवत्ता सुनिश्चित करने के लिए सरकार और Food Safety and Standards Authority of India (FSSAI) की भूमिका अहम हो जाती है।
FSSAI के CEO राजित पुनहानी ने NBT को दिए एक इंटरव्यू में फूड सेफ्टी, मिलावट, एनालॉग पनीर, जंक फूड, ऑनलाइन बिकने वाले पैकेज्ड फूड और गलत विज्ञापनों से जुड़े कई अहम सवालों के जवाब दिए। उन्होंने संकेत दिया कि एनालॉग पनीर के इस्तेमाल पर देशभर में रोक लगाने की तैयारी चल रही है।
एनालॉग पनीर पर जल्द लग सकता है देशभर में बैन
एनालॉग पनीर को लेकर FSSAI ने सख्त रुख अपनाया है। राजित पुनहानी के मुताबिक, यह सिर्फ दिल्ली तक सीमित मुद्दा नहीं है, बल्कि देश के दूसरे हिस्सों में भी इसे लेकर चिंता है।
उन्होंने बताया कि राज्यों के फूड कंट्रोल विभागों के लिए भी एनालॉग पनीर एक महत्वपूर्ण मुद्दा बन चुका है। इसके इस्तेमाल को पूरी तरह रोकने को लेकर सहमति बन रही है और जल्द ही इसके इस्तेमाल पर बैन लगाने की घोषणा की जा सकती है।
यानी आने वाले समय में बाजार में मिलने वाले ऐसे उत्पादों पर खाद्य सुरक्षा अधिकारियों की निगरानी और ज्यादा सख्त हो सकती है।
FSSAI तय करता है फूड सेफ्टी के मानक
FSSAI का मुख्य काम देश में खाद्य पदार्थों के लिए सुरक्षित और वैज्ञानिक मानक तय करना है। इसके लिए अलग-अलग क्षेत्रों के विशेषज्ञों वाली करीब 21 साइंटिफिक पैनल काम करती हैं।
इन पैनल में पेस्टिसाइड, फूड कलर, मीट, वेजिटेबल ऑयल, फिश और दूसरे खाद्य क्षेत्रों से जुड़े मानकों पर काम किया जाता है।
हालांकि इन मानकों को जमीन पर लागू करने की मुख्य जिम्मेदारी राज्यों की होती है। देश में जारी होने वाले अधिकांश फूड लाइसेंस भी राज्य सरकारों के माध्यम से जारी किए जाते हैं।
असुरक्षित खाना मिला तो हो सकती है जेल
FSSAI CEO ने साफ किया कि अगर कोई खाद्य पदार्थ वास्तव में असुरक्षित पाया जाता है और उससे स्वास्थ्य को नुकसान पहुंचने की आशंका होती है, तो मामले में आपराधिक कार्रवाई हो सकती है।
राज्यों के फूड सेफ्टी अधिकारी खाद्य प्रतिष्ठानों का निरीक्षण करते हैं और जरूरत पड़ने पर खाने के सैंपल लेकर उन्हें लैब में जांच के लिए भेजते हैं। FSSAI के पास देशभर में करीब 250 लैब और लगभग 300 मोबाइल लैब होने की बात भी सामने आई है।
अगर जांच में खाद्य पदार्थ असुरक्षित पाया जाता है, तो संबंधित व्यक्ति या कारोबारी के खिलाफ क्रिमिनल केस दर्ज किया जा सकता है।
मिसब्रैंडिंग और सब-स्टैंडर्ड फूड पर क्या होगा?
हर खराब गुणवत्ता वाले खाद्य पदार्थ को असुरक्षित नहीं माना जाता। उदाहरण के लिए किसी पैकेट पर 5 ग्राम प्रोटीन लिखा है, लेकिन जांच में सिर्फ 2 ग्राम प्रोटीन पाया गया, तो यह मिसब्रैंडिंग या सब-स्टैंडर्ड की श्रेणी में आ सकता है।
ऐसे मामलों में जनविश्वास कानून के तहत कई प्रावधानों को डिक्रिमिनलाइज किया गया है। यानी हर मामले में आपराधिक केस या जेल की कार्रवाई के बजाय पेनल्टी का प्रावधान हो सकता है।
बच्चों के जंक फूड पर FSSAI की नजर
स्कूलों और उनके आसपास बिकने वाले जंक फूड को लेकर भी FSSAI काम कर रहा है। खास तौर पर अल्ट्रा-प्रोसेस्ड फूड को पहचानने के लिए फैट, नमक और चीनी की मात्रा को आधार बनाने की दिशा में ड्राफ्ट तैयार किया गया है।
FSSAI के मुताबिक, इस ड्राफ्ट को वेबसाइट पर जारी किया गया है और आम लोगों तथा अन्य स्टेकहोल्डर्स से इस पर 60 दिनों के भीतर सुझाव मांगे गए हैं।
अल्ट्रा-प्रोसेस्ड फूड को परिभाषित करना आसान नहीं है। कई पारंपरिक खाद्य पदार्थ भी किसी न किसी स्तर पर प्रोसेस किए जाते हैं। इसलिए FSSAI मानकों और चेकलिस्ट के आधार पर यह तय करने की कोशिश कर रहा है कि किसी खाद्य पदार्थ को किस श्रेणी में रखा जाए।
क्या मोमो, पिज्जा और बर्गर खाना सुरक्षित है?
FSSAI CEO से जब मोमो, पिज्जा और बर्गर जैसे लोकप्रिय खाद्य पदार्थों के बारे में सवाल किया गया तो उन्होंने कहा कि ‘सेफ’ का मतलब यह है कि भोजन स्वास्थ्य के लिए नुकसानदेह न हो।
हालांकि इसका मतलब यह नहीं है कि ऐसे खाद्य पदार्थों को रोजाना या ज्यादा मात्रा में खाना बेहतर है। FSSAI लोगों को इस तरह के भोजन का सेवन सीमित करने के लिए प्रोत्साहित करता है।
इसी उद्देश्य से ‘Eat Right India’ जैसे अभियान भी चलाए जा रहे हैं, जिनका मकसद लोगों को बेहतर और संतुलित खान-पान के लिए जागरूक करना है।
पैकेज्ड फूड के पैकेट पर मिलेगी ज्यादा जानकारी
पैकेज्ड फूड की गुणवत्ता और उसमें मौजूद सामग्री को लेकर भी कई सवाल उठते हैं। FSSAI के मुताबिक, पैकेट के फ्रंट पर चेतावनी संकेत लाने की प्रक्रिया चल रही है।
इसके अलावा QR कोड के जरिए उत्पाद की विस्तृत जानकारी उपलब्ध कराने की दिशा में भी काम किया जा रहा है। इससे ग्राहक किसी उत्पाद को खरीदने से पहले उसके बारे में ज्यादा जानकारी हासिल कर सकेंगे।
ऑनलाइन बिकने वाले फूड प्रोडक्ट पर भी सख्ती
ई-कॉमर्स प्लेटफॉर्म पर खाद्य उत्पाद बेचने वाली कंपनियों को भी उत्पाद की मैन्युफैक्चरिंग डेट और एक्सपायरी डेट स्पष्ट रूप से दिखानी होगी।
FSSAI ने ऑनलाइन प्लेटफॉर्म को इस व्यवस्था के लिए 30 सितंबर तक का समय दिया है। कंपनियों की ओर से बताया गया है कि इसके लिए उन्हें अपने टेक्नोलॉजी सिस्टम और सॉफ्टवेयर में बदलाव करना होगा।
गलत तरीके से ‘हेल्दी’ बताने पर होगी कार्रवाई
आजकल सोशल मीडिया और विज्ञापनों में कई फूड प्रोडक्ट्स को ‘हेल्दी’, ‘100% नैचुरल’ या इसी तरह के दावों के साथ प्रमोट किया जाता है।
FSSAI CEO ने कहा कि अगर किसी उत्पाद को नियमों के खिलाफ गलत तरीके से हेल्दी बताया जाता है, तो कार्रवाई की जा सकती है। उदाहरण के तौर पर किसी उत्पाद को 100 फीसदी शहद बताया जाए, जबकि वह वास्तव में ऐसा न हो, तो इसे गलत दावा माना जा सकता है।
हालांकि गलत दावा और असुरक्षित भोजन एक ही चीज नहीं हैं। किसी उत्पाद का दावा गलत होना अलग उल्लंघन हो सकता है, जबकि खाद्य पदार्थ का स्वास्थ्य के लिए असुरक्षित होना अलग मामला है।
पाम ऑयल को लेकर FSSAI ने क्या कहा?
पाम ऑयल के स्वास्थ्य पर असर को लेकर भी लंबे समय से चर्चा होती रही है। FSSAI के एडिबल ऑयल्स पैनल ने इसका अध्ययन किया है।
CEO के मुताबिक, पाम ऑयल को अपने आप में खतरनाक नहीं माना गया है। हालांकि उन्होंने यह भी कहा कि दूसरे तेलों की तरह तेल का सेवन भी सीमित मात्रा में करना चाहिए।
बिस्किट और कई प्रोसेस्ड खाद्य उत्पादों में पाम ऑयल का इस्तेमाल किया जाता है।
खुले दूध-पनीर की निगरानी कौन करता है?
खुले में बिकने वाले दूध, पनीर, खोया और दाल जैसे खाद्य पदार्थों में मिलावट की निगरानी मुख्य रूप से राज्य सरकारों की जिम्मेदारी है।
FSSAI राष्ट्रीय स्तर पर खाद्य सुरक्षा के मानक तय करता है, जबकि राज्य के फूड सेफ्टी अधिकारी बाजार, दुकानों और रेस्टोरेंट समेत स्थानीय स्तर पर नियमों के पालन की निगरानी करते हैं।
खाने में मिलावट की शिकायत कैसे करें?
अगर किसी ग्राहक को किसी खाद्य पदार्थ में मिलावट या गुणवत्ता को लेकर शिकायत है तो वह Food Safety Connect ऐप के जरिए शिकायत दर्ज करा सकता है।
शिकायत के साथ संबंधित उत्पाद की तस्वीर भी अपलोड की जा सकती है। इसके बाद शिकायत संबंधित राज्य के फूड सेफ्टी कमिश्नर तक भेजी जाती है। FSSAI के मुताबिक, शिकायत पर करीब 30 दिनों के भीतर जवाब देने की कोशिश की जाती है।
रेस्टोरेंट की किचन की सफाई कैसे जांची जाती है?
रेस्टोरेंट की हाइजीन जांचने के लिए चेकलिस्ट तैयार की गई है। इसी के आधार पर खाद्य प्रतिष्ठानों को हाइजीन के मामले में स्कोर दिया जाता है।
रेस्टोरेंट की किचन में CCTV लगाया जाए या नहीं, इसका फैसला राज्यों पर छोड़ा गया है। यानी हर जगह इसके लिए एक जैसा नियम लागू होना जरूरी नहीं है।
बाजार में आएगा ‘मैजिक बॉक्स’
आम ग्राहक खुद खाद्य पदार्थों की शुरुआती जांच कर सके, इसके लिए FSSAI ‘मैजिक बॉक्स’ पर काम कर रहा है।
इसके व्यावसायिक रूप से निर्माण को लेकर निर्माताओं से बातचीत की जा रही है। कुछ मार्केट एसोसिएशन भी ऐसी मशीनों को लगाने के लिए जगह उपलब्ध कराने में रुचि दिखा रहे हैं।
अगर यह व्यवस्था बड़े स्तर पर लागू होती है तो मिलावट के खिलाफ जागरूकता और शुरुआती जांच में ग्राहकों को मदद मिल सकती है।
छोटे फूड स्टार्टअप को भी बढ़ावा
FSSAI का मानना है कि छोटे कारोबार और नए फूड स्टार्टअप को भी बढ़ावा मिलना चाहिए। बड़े कारोबारियों के दबदबे से बाजार में मार्केटिंग का प्रभाव बढ़ सकता है और लोगों की फूड प्रेफरेंस प्रभावित हो सकती है।
CEO के मुताबिक, युवा पीढ़ी के कई स्टार्टअप हेल्दी फूड प्रोडक्ट तैयार कर रहे हैं और ऐसे कारोबार को आगे बढ़ने के लिए प्रोत्साहित किया जा रहा है।
‘Eat Right India’ से लोगों को जागरूक करने की कोशिश
FSSAI लोगों को सुरक्षित और बेहतर खाना चुनने के लिए कई अभियान चला रहा है। इनमें ‘Eat Right India’, ‘Eat Right Thali’, ‘Ayurveda Aahar’, ‘हर लेबल कुछ कहता है’ और ‘No to Adulteration’ जैसे अभियान शामिल हैं।
FSSAI के मुताबिक, ‘Eat Right Thali’ के तहत अलग-अलग राज्यों की खान-पान की आदतों और स्थानीय भोजन को ध्यान में रखते हुए संतुलित थाली की अवधारणा पर काम किया गया है।
निष्कर्ष
देश में खाद्य पदार्थों की गुणवत्ता को लेकर बढ़ती चिंता के बीच FSSAI की ओर से कई स्तरों पर नियमों को मजबूत करने की कोशिश की जा रही है। एनालॉग पनीर पर संभावित देशव्यापी रोक, अल्ट्रा-प्रोसेस्ड फूड की पहचान, ऑनलाइन फूड प्रोडक्ट की जानकारी और गलत हेल्थ क्लेम पर कार्रवाई जैसे कदमों का सीधा असर ग्राहकों पर पड़ सकता है।
हालांकि फूड सेफ्टी के नियमों को प्रभावी तरीके से लागू करने में राज्यों की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण है। ऐसे में आने वाले समय में केंद्र और राज्य एजेंसियों के बीच बेहतर निगरानी और तेज कार्रवाई इस व्यवस्था की असली परीक्षा होगी।


