Nepal Flood: त्रिशूली नदी की विनाशकारी बाढ़ के बीच प्रिंसिपल राजेंद्र दवाड़ी के एक फैसले ने 1,643 छात्रों की जिंदगी बचा दी। अब तबाह हो चुके स्कूल के पुनर्निर्माण में भारत मदद करेगा।
Nepal Flood: नेपाल में 26 अगस्त को आई विनाशकारी बाढ़ ने नुवाकोट जिले के त्रिभुवन त्रिशूली सेकेंडरी स्कूल को पूरी तरह तबाह कर दिया। तेज बहाव में स्कूल की इमारत और आसपास की कई संरचनाएं बह गईं। लेकिन इस भयानक आपदा के बीच स्कूल के प्रिंसिपल राजेंद्र दवाड़ी ने जिस तेजी से फैसला लिया, उसने 1,643 बच्चों की जान बचाने में अहम भूमिका निभाई।
बाढ़ का खतरा बढ़ते ही दवाड़ी ने स्कूल खाली कराने का आदेश दिया। बच्चों और शिक्षकों को सुरक्षित ऊंचाई की ओर भेजा गया। अब उन्हें नेपाल ही नहीं, बल्कि दुनियाभर में उनकी सूझबूझ और साहस के लिए सराहा जा रहा है।
सुबह एक फोन कॉल से शुरू हुआ खतरे का अंदेशा
Met Rajendra Dawadi, Principal, Tribhuvan Trishuli Secondary School, Bidur, Nuwakot. His timely action saved lives of more than 1600 school children just before the school was swept away in #Rasuwa flash flood. This school was set up in 1950s; Designed by Indian engineer,… pic.twitter.com/XoVkKRvR8x
— Naveen Srivastava, Ambassador of India in Nepal (@navsri6619) September 1, 2026 राजेंद्र दवाड़ी के मुताबिक, उस दिन स्कूल में सब कुछ सामान्य था। सुबह करीब 9:20 बजे उन्हें एक दोस्त का फोन आया। फोन पर बताया गया कि आसपास के एक गांव में नदी का पानी तेजी से घुस रहा है।
कुछ ही देर बाद एक अभिभावक भी स्कूल पहुंचा और नदी का जलस्तर तेजी से बढ़ने की जानकारी दी। इसके बाद दवाड़ी को अंदाजा हो गया कि खतरा स्कूल तक पहुंच सकता है।
स्कूल की तीन मंजिला इमारत नदी से करीब 60 मीटर की ऊंचाई पर थी, लेकिन हालात इतनी तेजी से बदल रहे थे कि किसी भी तरह की देरी बच्चों के लिए खतरनाक साबित हो सकती थी।
तुरंत बजवाई स्कूल की घंटी, बच्चों को सुरक्षित जगह भेजा
खतरे का अंदाजा लगते ही प्रिंसिपल ने स्कूल की घंटी बजाने का आदेश दिया। शिक्षकों को निर्देश दिया गया कि वे तुरंत कक्षाएं खाली कराएं और बच्चों को ऊंची और सुरक्षित जगह की ओर ले जाएं।
इस दौरान स्कूल में मौजूद सैकड़ों बच्चों को तेजी से बाहर निकाला गया। दवाड़ी खुद भी बच्चों के साथ रहे और उन्हें सुरक्षित स्थान तक पहुंचाने में मदद करते रहे।
एक बस के लिए खुद सड़क पर उतर गए प्रिंसिपल
बाढ़ के बीच स्कूल बसों को लेकर भी बड़ा खतरा पैदा हो गया था। दवाड़ी ने बस ड्राइवरों से संपर्क कर उन्हें वापस लौटने के लिए कहा। हालांकि, एक बस से संपर्क नहीं हो पाया।
जब प्रिंसिपल ने बाहर जाकर देखा तो वह बस लोहे के पुल को पार करके स्कूल की तरफ बढ़ रही थी। दूसरी ओर नदी का पानी तेजी से उफान मार रहा था।
दवाड़ी ने जोर-जोर से चिल्लाकर और हाथ हिलाकर ड्राइवर को रुकने का संकेत दिया। ड्राइवर ने तुरंत बस को पीछे किया और सुरक्षित दूरी पर ले गया।
इसके कुछ ही पल बाद वह लोहे का पुल तेज बहाव की चपेट में आकर ताश के पत्तों की तरह ढह गया और नदी में समा गया।
अगर बस कुछ देर और आगे बढ़ती, तो उसमें सवार बच्चों और स्टाफ की जान पर बड़ा खतरा पैदा हो सकता था।
पहाड़ी की तरफ भागे बच्चे, एक छात्रा को मोटरसाइकिल से पहुंचाया गया
जैसे-जैसे बाढ़ का पानी बढ़ता गया, बच्चों को स्कूल परिसर से दूर पहाड़ी की ओर ले जाया गया। अधिकांश छात्र पैदल ही सुरक्षित ऊंचाई की तरफ चले गए।
इस दौरान एक छात्रा को पैनिक अटैक आया। उसे मोटरसाइकिल की मदद से सुरक्षित जगह तक पहुंचाया गया। बाकी बच्चों को भी लगातार निगरानी में रखा गया।
बाढ़ से बचने के दौरान छात्रों ने एक बोधि वृक्ष के नीचे शरण ली। प्रिंसिपल राजेंद्र दवाड़ी इस पूरे समय बच्चों के साथ मौजूद रहे।
स्कूल बह गया, लेकिन 1,643 बच्चे सुरक्षित रहे
बाढ़ का पानी जब घाटी में तेजी से फैला तो स्कूल की इमारत और नदी किनारे मौजूद कई दूसरी संरचनाएं इसकी चपेट में आ गईं। देखते ही देखते स्कूल बुरी तरह क्षतिग्रस्त हो गया।
हालांकि सबसे बड़ी राहत यह रही कि स्कूल में मौजूद सभी 1,643 छात्र सुरक्षित बच गए।
इस आपदा में स्कूल ने अपने दो साथियों को खो दिया। 32 वर्षीय सोशल हिस्ट्री शिक्षक संतोष परियार क्लास लेने के बाद खाना बनाने अपने कमरे की तरफ गए थे, लेकिन बाढ़ के पानी में बह गए।
स्कूल के सफाईकर्मी सुल्तान लामा की भी मौत हो गई। बताया जाता है कि वह स्कूल को सुरक्षित करने के लिए वापस लौटे थे।
‘मैं करता भी तो क्या?’—बच्चों को बचाना सबसे जरूरी था
दुनियाभर की मीडिया में हीरो के तौर पर चर्चा में आने के बावजूद राजेंद्र दवाड़ी इस घटना को अपनी बहादुरी नहीं मानते।
स्कूल के मलबे को देखते हुए उन्होंने बेहद सादगी से कहा कि उस समय बच्चों की जिंदगी से ज्यादा महत्वपूर्ण कुछ नहीं था। उनका कहना था कि उन्होंने वही किया जो उस परिस्थिति में करना जरूरी था।
लेकिन जिस तेजी से उन्होंने खतरे को पहचाना, स्कूल खाली कराया और बस को समय रहते वापस करवाया, उसने निश्चित तौर पर सैकड़ों बच्चों को बेहद खतरनाक स्थिति से बाहर निकालने में मदद की।
अब भारत से स्कूल को दोबारा बनाने की उम्मीद
बच्चों की जान बचाने के बाद अब राजेंद्र दवाड़ी के सामने एक नई चुनौती है—स्कूल को फिर से खड़ा करना।
स्कूल की इमारत तबाह हो चुकी है और बड़ी संख्या में बच्चों की पढ़ाई प्रभावित हुई है। ऐसे में दवाड़ी ने भारत सरकार से स्कूल के पुनर्निर्माण में मदद की अपील की है, ताकि छात्रों को जल्द से जल्द पढ़ाई के लिए सुरक्षित जगह मिल सके।
भारत ने दिया स्कूल के पुनर्निर्माण में मदद का भरोसा
नेपाल में भारत के राजदूत नवीन श्रीवास्तव ने राजेंद्र दवाड़ी से मुलाकात की। उन्होंने सोशल मीडिया पोस्ट के जरिए बताया कि नुवाकोट के बिदुर स्थित त्रिभुवन त्रिशूली सेकेंडरी स्कूल के प्रिंसिपल ने अचानक आई बाढ़ से ठीक पहले समय पर फैसला लेकर 1,600 से ज्यादा बच्चों की जान बचाने में अहम भूमिका निभाई।
उन्होंने बताया कि यह स्कूल 1950 के दशक में बनाया गया था। इसके डिजाइन में एक भारतीय इंजीनियर की भूमिका थी, जो त्रिशूली हाइड्रोपावर प्लांट के निर्माण से जुड़े थे। स्कूल के निर्माण में भी भारत की मदद रही थी।
इसके बाद 2022 में भी भारत की मदद से HICDP कार्यक्रम के तहत स्कूल की नई इमारत बनाई गई थी।
भारत के राजदूत ने राजेंद्र दवाड़ी को भरोसा दिलाया है कि भारत, नेपाल में भारतीय दूतावास के माध्यम से स्कूल के पुनर्निर्माण में आगे भी मदद करेगा।
बच्चों की जिंदगी बचाने के बाद अब भविष्य बचाने की चुनौती
त्रिभुवन त्रिशूली सेकेंडरी स्कूल की इमारत भले ही बाढ़ में बह गई हो, लेकिन प्रिंसिपल राजेंद्र दवाड़ी के समय पर लिए गए फैसले ने स्कूल के 1,643 बच्चों को सुरक्षित रखा।
अब भारत की मदद से इस स्कूल को दोबारा खड़ा करने की उम्मीद है। एक तरफ यह घटना नेपाल की प्राकृतिक आपदा की भयावहता दिखाती है, तो दूसरी तरफ यह भी बताती है कि संकट के समय सही वक्त पर लिया गया एक फैसला कितनी जिंदगियां बचा सकता है।


