Sainik Farm Legal Status: दिल्ली का सैनिक फार्म देश के सबसे महंगे और चर्चित इलाकों में गिना जाता है। विशाल फार्महाउस, आलीशान बंगले और करोड़ों-अरबों रुपये की संपत्तियां इसकी पहचान हैं। लेकिन इसकी चमक-दमक के पीछे एक लंबा कानूनी विवाद भी है। दक्षिण दिल्ली का यह इलाका आज भी आधिकारिक तौर पर अनधिकृत और अनरेगुलराइज्ड माना जाता है। यहां निर्माण को लेकर करीब दो दशक से ज्यादा समय से कानूनी पेंच फंसा हुआ है।
हाल ही में दिल्ली हाई कोर्ट ने सैनिक फार्म की कानूनी स्थिति को लेकर केंद्र सरकार, दिल्ली सरकार, दिल्ली विकास प्राधिकरण (DDA) और दिल्ली नगर निगम (MCD) को मिलकर समाधान निकालने का निर्देश दिया है। अदालत ने अधिकारियों को दो महीने के भीतर संयुक्त बैठक करने और नवंबर में अगली सुनवाई के दौरान ठोस योजना या नीतिगत फैसला पेश करने को कहा है।
हाई कोर्ट ने कहा- लोगों को अनिश्चितता में नहीं रख सकते
चीफ जस्टिस देवेंद्र कुमार उपाध्याय और जस्टिस तेजस कारिया की पीठ ने मामले की सुनवाई के दौरान अधिकारियों के रवैये पर कड़ी टिप्पणी की। अदालत ने कहा कि अगर किसी इलाके में निर्माण को लेकर लंबे समय से स्थिति स्पष्ट नहीं है और वहां रहने वाले लोग अपनी संपत्तियों की मरम्मत तक नहीं करा पा रहे हैं, तो सरकारों को कोई न कोई स्पष्ट फैसला लेना होगा।
अदालत ने यह भी सवाल उठाया कि जब सरकारें दिल्ली की दूसरी अनधिकृत कॉलोनियों को अलग-अलग नीतियों के जरिए नियमित करती रही हैं, तो सैनिक फार्म के मामले में भी स्थायी समाधान क्यों नहीं निकाला जा रहा।
कोर्ट के रुख से साफ है कि अब केवल एक-दूसरे पर जिम्मेदारी डालने से काम नहीं चलेगा। केंद्र और दिल्ली सरकार के साथ DDA तथा MCD को सैनिक फार्म के भविष्य पर एक स्पष्ट रोडमैप तैयार करना होगा।
सरकार की दलील- मरम्मत की अनुमति का हुआ गलत इस्तेमाल
सुनवाई के दौरान केंद्र सरकार की ओर से यह तर्क दिया गया कि अतीत में जब सैनिक फार्म के निवासियों को मरम्मत की अनुमति दी गई, तो उसका इस्तेमाल कई मामलों में बड़े पैमाने पर नए निर्माण के लिए किया गया।
सरकार का कहना था कि मरम्मत की आड़ में कई जगहों पर इतने बड़े निर्माण किए गए कि वहां सामान्य मकानों के बजाय बेहद विशाल और आलीशान ढांचे खड़े हो गए। यही वजह है कि अधिकारियों के लिए निर्माण गतिविधियों को नियंत्रित करना और इलाके की मौजूदा स्थिति को नियमित करना चुनौती बना हुआ है।
सैनिक फार्म की शुरुआत कैसे हुई?
सैनिक फार्म की कहानी आज की हाई-प्रोफाइल कॉलोनी से बिल्कुल अलग थी। इसकी शुरुआत 1960 के दशक में हुई थी। इसे मूल रूप से युद्ध में शहीद हुए सैनिकों की विधवाओं और सेवानिवृत्त रक्षा कर्मियों के लिए एक कोऑपरेटिव सोसाइटी के रूप में विकसित किया गया था।
समय के साथ यहां जमीन के छोटे-बड़े हिस्सों का विभाजन और बिक्री होने लगी। शुरुआती दौर में सीमित फार्म और ढांचों की अवधारणा धीरे-धीरे बदलती गई। देखते ही देखते बड़े फार्महाउस, आलीशान बंगले और विशाल निजी संपत्तियां बनने लगीं।
इसी दौरान इलाके में निर्माण और लेआउट को लेकर जरूरी सरकारी मंजूरियों का सवाल भी सामने आया। DDA की स्वीकृत योजना के अनुरूप विकास नहीं होने के कारण सैनिक फार्म की कानूनी स्थिति विवादित बनी रही।
2009 में संसद में भी उठा था मामला
सैनिक फार्म की अनधिकृत स्थिति का मुद्दा नया नहीं है। वर्ष 2009 में तत्कालीन शहरी विकास राज्य मंत्री सौगत रॉय ने संसद में बताया था कि सैनिक फार्म एक अनधिकृत कॉलोनी है और वहां निर्माण निर्धारित मानकों के अनुरूप नहीं हुआ था।
उस समय MCD के सर्वेक्षण में इलाके में करीब 1,650 पते और इमारतें चिन्हित किए गए थे। इससे अंदाजा लगाया जा सकता है कि तब तक सैनिक फार्म में बड़े पैमाने पर निर्माण हो चुका था।
20 साल से ज्यादा समय से क्यों अटका है मामला?
सैनिक फार्म के नियमितीकरण की मांग लंबे समय से चल रही है। दिल्ली हाई कोर्ट ने वर्ष 2001 से ही यहां नए निर्माण पर रोक लगा रखी है। इस रोक के कारण संपत्ति मालिकों के लिए निर्माण, विस्तार और कई तरह के बदलाव करना मुश्किल बना हुआ है।
अगस्त 2025 में भी दिल्ली हाई कोर्ट ने सैनिक फार्म के मामले में केंद्र और दिल्ली सरकार के बीच जिम्मेदारी टालने की प्रवृत्ति पर नाराजगी जताई थी।
मामले की सबसे बड़ी पेचीदगी यह है कि दिल्ली की अन्य अनधिकृत कॉलोनियों को नियमित करने के लिए बनी कई नीतियों का लाभ सैनिक फार्म को नहीं मिला। वर्ष 2009 में सरकार ने स्पष्ट किया था कि सैनिक फार्म उन 1,218 कॉलोनियों में शामिल नहीं था जिन्हें अनंतिम रूप से नियमित करने की प्रक्रिया में लिया गया था।
2007 में संशोधित दिशानिर्देशों के तहत अपेक्षाकृत समृद्ध वर्गों की अनधिकृत कॉलोनियों को नियमितीकरण के दायरे से बाहर रखा गया था। सैनिक फार्म की प्रकृति और वहां मौजूद महंगी संपत्तियों के कारण यह इलाका इसी तरह के अपवादों में आता रहा।
PM-UDAY योजना में भी सैनिक फार्म को नहीं मिली जगह
दिल्ली की अनधिकृत कॉलोनियों के निवासियों को मालिकाना हक देने के लिए केंद्र सरकार ने वर्ष 2019 में PM-UDAY योजना शुरू की थी। इसके तहत पात्र अनधिकृत कॉलोनियों में संपत्ति के अधिकार को नियमित करने की प्रक्रिया शुरू की गई।
अप्रैल 2026 में केंद्र ने बताया कि दिल्ली की 1,731 पात्र कॉलोनियों में से 1,511 को नियमित किया जाएगा। हालांकि सैनिक फार्म समेत 69 समृद्ध कॉलोनियों और वन या संरक्षित भूमि पर बसी कॉलोनियों को इस व्यवस्था से बाहर रखा गया है।
यही कारण है कि सैनिक फार्म के निवासी अभी भी अपनी संपत्तियों की कानूनी स्थिति को लेकर स्पष्ट समाधान का इंतजार कर रहे हैं।
करोड़ों के घर, लेकिन बुनियादी सुविधाओं के लिए RWA पर निर्भरता
सैनिक फार्म की स्थिति का सबसे दिलचस्प पहलू यह है कि यहां संपत्तियों की कीमत बेहद ज्यादा है, लेकिन इलाके का आधिकारिक दर्जा कई बुनियादी नागरिक सुविधाओं के रास्ते में बाधा बना हुआ है।
कई जरूरी व्यवस्थाओं के लिए स्थानीय निवासी और उनकी रेजिडेंट वेलफेयर एसोसिएशन यानी RWA महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। पानी के टैंकर, कम्युनिटी बोरवेल, सड़कों की मरम्मत, कचरा प्रबंधन और सुरक्षा जैसी व्यवस्थाओं में RWA की भूमिका रहती है।
यानी एक तरफ यहां देश के बेहद अमीर लोगों के आलीशान घर हैं, वहीं दूसरी तरफ इलाके को नियमित कॉलोनी जैसी सभी सरकारी नागरिक सुविधाएं सहज रूप से उपलब्ध नहीं हैं।
DDA की कार्रवाई भी जारी
कानूनी विवाद के बीच अवैध निर्माण के खिलाफ DDA की कार्रवाई भी समय-समय पर होती रही है। हाल के महीनों में कई संपत्तियों पर सीलिंग और ध्वस्तीकरण की कार्रवाई की गई।
अप्रैल में DDA ने सैनिक फार्म में 23 फार्महाउसों को ध्वस्त किया था। इसके बाद जून में भी एक संपत्ति को ध्वस्त करने और 10 अन्य संपत्तियों को सील करने की कार्रवाई की गई।
इन कार्रवाइयों से यह साफ होता है कि जब तक सैनिक फार्म के लिए कोई स्थायी कानूनी और नीतिगत समाधान नहीं निकलता, तब तक यहां निर्माण से जुड़े विवाद बने रहेंगे।
अब नवंबर की सुनवाई पर टिकी नजर
दिल्ली हाई कोर्ट के ताजा निर्देश के बाद सैनिक फार्म का मामला एक महत्वपूर्ण मोड़ पर पहुंच गया है। अदालत ने केंद्र सरकार, दिल्ली सरकार, DDA और MCD को साथ बैठकर समाधान निकालने के लिए दो महीने का समय दिया है।
नवंबर में होने वाली अगली सुनवाई में अधिकारियों को अपनी योजना या नीतिगत निर्णय अदालत के सामने रखना होगा। ऐसे में अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि सरकार सैनिक फार्म को नियमित करने का रास्ता निकालती है, मौजूदा निर्माण को लेकर कोई नई नीति बनाती है या किसी दूसरे विकल्प पर आगे बढ़ती है।
फिलहाल इतना तय है कि दिल्ली के इस चर्चित और बेहद महंगे इलाके की चमक-दमक के पीछे छिपा कानूनी विवाद अभी खत्म नहीं हुआ है। हाई कोर्ट की सख्ती ने जरूर सरकार और संबंधित एजेंसियों पर एक स्पष्ट समाधान निकालने का दबाव बढ़ा दिया है।


