Subsidy System Changes: भारत में खाद पर दी जाने वाली भारी सब्सिडी ने दशकों तक कृषि और खाद्य सुरक्षा को मजबूत बनाने में अहम भूमिका निभाई है। इसी व्यवस्था ने हरित क्रांति को गति दी और भारत को अनाज आयात पर निर्भर देश से दुनिया के बड़े कृषि उत्पादक देशों में पहुंचाने में मदद की। लेकिन अब बढ़ती लागत, महंगे आयात और रुपये पर दबाव के बीच यही मॉडल सरकार के लिए बड़ी आर्थिक चुनौती बनता जा रहा है।
देश में खेती का सबसे बड़ा सालाना सीजन चल रहा है और इस दौरान खाद की मांग सबसे ज्यादा रहती है। ऐसे में सरकार के सामने एक तरफ किसानों को सस्ती खाद उपलब्ध कराने की चुनौती है, तो दूसरी तरफ बढ़ते सब्सिडी बिल और आयात खर्च को नियंत्रित करने का दबाव है।
ईरान युद्ध ने बढ़ाई मुश्किल
अंतरराष्ट्रीय बाजार में ईंधन और उर्वरक की कीमतों में तेजी ने भारत की परेशानी बढ़ा दी है। ईरान युद्ध और मिडिल ईस्ट में सप्लाई से जुड़ी बाधाओं के कारण खाद और ऊर्जा की उपलब्धता प्रभावित हुई है। खाद के उत्पादन में इस्तेमाल होने वाली प्राकृतिक गैस की लागत बढ़ने से भारत के लिए आयात और घरेलू उत्पादन दोनों महंगे हुए हैं।
इसका सीधा असर सरकार के फर्टिलाइजर सब्सिडी बिल पर पड़ा है। साथ ही आयात के लिए बड़ी मात्रा में विदेशी मुद्रा खर्च होने से रुपये पर भी दबाव बढ़ा है।
कुछ नए उपायों के बाद खाद की कीमतों में नरमी जरूर आई है, लेकिन सरकार अब लंबे समय में इसके इस्तेमाल को कम करने और मौजूदा सब्सिडी व्यवस्था को अधिक टिकाऊ बनाने पर जोर दे रही है। यह राजनीतिक रूप से आसान फैसला नहीं होगा, क्योंकि देश के करोड़ों किसान सस्ती खाद पर निर्भर हैं।
सरकार किसानों को कर रही जागरूक
सरकार किसानों को मिट्टी की सेहत पर जरूरत से ज्यादा रासायनिक खाद के असर के बारे में जागरूक कर रही है। इसके साथ ही खाद की बिक्री और इस्तेमाल के तरीके में बदलाव लाने के लिए नई व्यवस्था का परीक्षण भी किया जा रहा है।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी कई मौकों पर रासायनिक खाद के इस्तेमाल को कम करने की अपील कर चुके हैं। सरकार का जोर ऐसी कृषि व्यवस्था पर है जिसमें किसानों की पैदावार और आय प्रभावित किए बिना रासायनिक इनपुट पर निर्भरता घटाई जा सके।
हालांकि, किसानों के लिए यह बदलाव आसान नहीं है। लंबे समय से यूरिया सस्ती होने के कारण इसका इस्तेमाल कृषि व्यवस्था का हिस्सा बन चुका है। अचानक इसमें बदलाव करने से खेती की लागत और उत्पादन पर असर पड़ने की आशंका रहती है।
सबसे अहम समय में खाद की चुनौती
भारत में खेती का सबसे बड़ा सीजन चल रहा है और इसी दौरान खाद की खपत भी अपने उच्च स्तर पर पहुंचती है। अगर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर गैस और उर्वरक की सप्लाई सामान्य नहीं होती है तो सरकार को खाद की उपलब्धता और कीमत दोनों को लेकर दबाव का सामना करना पड़ सकता है।
कुछ राज्यों में सहकारी समितियों की ओर से सप्लाई को सीमित करने जैसे कदम भी उठाए जा रहे हैं। इसका उद्देश्य उपलब्ध खाद को नियंत्रित तरीके से वितरित करना और सरकारी खर्च को काबू में रखना है।
कमजोर मॉनसून के साथ अगर खाद की उपलब्धता में भी समस्या आती है, तो फसलों की पैदावार प्रभावित हो सकती है। इसका असर सिर्फ भारत तक सीमित नहीं रहेगा। भारत दुनिया के प्रमुख कृषि उत्पादकों और चावल निर्यातकों में शामिल है, इसलिए घरेलू उत्पादन में कमी का असर अंतरराष्ट्रीय खाद्य कीमतों पर भी पड़ सकता है।
इंटरनेशनल फर्टिलाइजर एसोसिएशन की मार्केट इंटेलिजेंस डायरेक्टर लॉरा क्रॉस के मुताबिक, अगर होर्मुज स्ट्रेट से जुड़ी बाधाएं बनी रहती हैं तो चिंता केवल खाद की उपलब्धता की नहीं, बल्कि सही समय पर उसकी सप्लाई पहुंचने की भी होगी।
1960 के दशक से चली आ रही है यूरिया सब्सिडी
भारत में यूरिया सब्सिडी की जड़ें 1960 के दशक के खाद्य संकट तक जाती हैं। उस समय भारत बड़ी मात्रा में अनाज आयात करता था और देश को खाद्य सुरक्षा के लिए बाहरी देशों पर निर्भर रहना पड़ता था।
इसी दौर में हरित क्रांति को बढ़ावा दिया गया। गेहूं और चावल की पैदावार बढ़ाने के लिए सिंचाई, बेहतर बीज और सस्ते नाइट्रोजन आधारित उर्वरकों का इस्तेमाल तेजी से बढ़ाया गया।
सरकार ने यूरिया की कीमत को नियंत्रित रखा और बाजार कीमत तथा किसानों से ली जाने वाली कीमत के बीच के अंतर का बड़ा हिस्सा खुद वहन किया। इस व्यवस्था ने किसानों को सस्ती खाद उपलब्ध कराई और कृषि उत्पादन बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
आज भारत दुनिया के प्रमुख कृषि उत्पादकों में है और चावल के निर्यात में भी उसकी बड़ी हिस्सेदारी है। लेकिन समय के साथ यही सब्सिडी व्यवस्था सरकार के लिए बढ़ते वित्तीय बोझ का कारण बन गई है।
45 किलो यूरिया की बोरी सिर्फ 266.50 रुपये
भारत दुनिया के सबसे बड़े यूरिया खरीदारों में शामिल है। अंतरराष्ट्रीय बाजार में कीमत बढ़ने के बावजूद किसानों को यूरिया अपेक्षाकृत बेहद कम कीमत पर उपलब्ध कराया जाता है।
किसान अभी 45 किलो यूरिया की बोरी के लिए करीब 266.50 रुपये चुकाते हैं। यह कीमत अंतरराष्ट्रीय बाजार में सरकार की खरीद लागत की तुलना में काफी कम है। इस अंतर की भरपाई सरकार सब्सिडी के जरिए करती है।
इसके अलावा डीएपी और अन्य उर्वरकों पर भी सरकार सहायता देती है। हालांकि अलग-अलग उर्वरकों पर सब्सिडी की मात्रा अलग होती है। विशेषज्ञों का कहना है कि यूरिया की कीमत अपेक्षाकृत कम रहने के कारण किसान इसका इस्तेमाल दूसरे पोषक तत्वों की तुलना में अधिक करते हैं।
इससे मिट्टी में पोषक तत्वों का संतुलन बिगड़ने की समस्या भी सामने आती है।
3 लाख करोड़ रुपये से ज्यादा हो सकता है सब्सिडी बिल
मामले की जानकारी रखने वाले एक सरकारी अधिकारी के मुताबिक, चालू वित्त वर्ष में भारत का फर्टिलाइजर सब्सिडी बिल 3 लाख करोड़ रुपये से ज्यादा हो सकता है।
यह रकम बजट में निर्धारित करीब 1.71 लाख करोड़ रुपये के अनुमान से काफी अधिक है। अगर अंतरराष्ट्रीय कीमतें ऊंची बनी रहती हैं तो सरकार को अतिरिक्त खर्च का इंतजाम करना पड़ सकता है।
यह स्थिति ऐसे समय में सामने आई है जब सरकार राजकोषीय घाटे को नियंत्रित रखने और सार्वजनिक खर्च को प्राथमिकता के आधार पर करने की कोशिश कर रही है।
एक्सपर्ट बोले- मौजूदा मॉडल में बदलाव जरूरी
इंटरनेशनल फूड पॉलिसी रिसर्च इंस्टीट्यूट के सीनियर रिसर्च फेलो अविनाश किशोर के मुताबिक, फर्टिलाइजर सब्सिडी पर खर्च होने वाला पैसा मौजूदा व्यवस्था में हमेशा प्रभावी तरीके से इस्तेमाल नहीं हो रहा है।
उनका मानना है कि लंबे समय तक बेहद सस्ती यूरिया उपलब्ध रहने से ऐसी कृषि आदतें विकसित हुई हैं जो मिट्टी की सेहत और पर्यावरण के लिए नुकसानदायक हो सकती हैं। जरूरत से ज्यादा नाइट्रोजन का इस्तेमाल हर स्थिति में पैदावार बढ़ाने की गारंटी नहीं देता।
यही वजह है कि विशेषज्ञ खाद सब्सिडी को पूरी तरह खत्म करने के बजाय इसे अधिक संतुलित और लक्षित बनाने की जरूरत पर जोर देते हैं।
दूसरे देशों से क्या सीख सकता है भारत?
ऑस्ट्रेलिया और फ्रांस जैसे कुछ देशों में खाद की कीमत बढ़ने पर किसानों ने कम फर्टिलाइजर वाली फसलों और खेती के तरीकों को अपनाया है। इसका उद्देश्य बढ़ती लागत के बीच उत्पादन को आर्थिक रूप से टिकाऊ बनाए रखना है।
भारत में भी इसी तरह फसल चयन, मिट्टी की जांच, संतुलित पोषक तत्वों के इस्तेमाल और जैविक विकल्पों को बढ़ावा देने से रासायनिक खाद पर दबाव कम किया जा सकता है।
हालांकि भारत की परिस्थितियां अलग हैं। यहां बड़ी संख्या में छोटे और सीमांत किसान हैं, जिनके लिए खाद की कीमत में अचानक बढ़ोतरी सीधे खेती की लागत और आय को प्रभावित कर सकती है।
पीएम मोदी ने भी खाद का इस्तेमाल घटाने की अपील की
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने मई में एक भाषण के दौरान रासायनिक खाद की खपत कम करने को देश के लिए जरूरी बताया था। उन्होंने किसानों से केमिकल फर्टिलाइजर के इस्तेमाल को कम करने की दिशा में काम करने की अपील की।
सरकार का तर्क है कि खाद के आयात पर निर्भरता कम करने से विदेशी मुद्रा की बचत होगी, मिट्टी की सेहत बेहतर होगी और कृषि लागत को लंबे समय में नियंत्रित करने में मदद मिल सकती है।
हालांकि, इस बदलाव के लिए किसानों को वैकल्पिक कृषि तकनीक, बेहतर मिट्टी परीक्षण, संतुलित पोषक तत्व प्रबंधन और भरोसेमंद सप्लाई सिस्टम उपलब्ध कराना जरूरी होगा।
आगे क्या है रास्ता?
भारत के सामने चुनौती सिर्फ फर्टिलाइजर सब्सिडी का खर्च कम करने की नहीं है। सरकार को किसानों के हित, खाद्य सुरक्षा, मिट्टी की सेहत और विदेशी मुद्रा खर्च के बीच संतुलन बनाना होगा।
यूरिया की कीमत अचानक बढ़ाना किसानों के लिए मुश्किल पैदा कर सकता है, जबकि मौजूदा मॉडल को अनिश्चितकाल तक जारी रखना सरकारी खजाने पर भारी पड़ सकता है। इसलिए विशेषज्ञों के मुताबिक बदलाव धीरे-धीरे और लक्षित तरीके से किया जाना ज्यादा व्यावहारिक रास्ता हो सकता है।
भारत की हरित क्रांति में सस्ती खाद ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। अब बदलते वैश्विक बाजार और बढ़ती आयात लागत के दौर में उसी मॉडल को नए रूप में ढालना सरकार के सामने बड़ी नीति चुनौती बन गया है।


