El Nino Impact 2026: पश्चिम एशिया और यूक्रेन युद्ध, अल नीनो और भारत के मानसून ने वैश्विक खाद्य सुरक्षा को लेकर चिंता बढ़ा दी है। जानिए FAO की चेतावनी और भारत पर इसका कितना असर पड़ेगा।
El Nino Impact: अल नीनो और युद्ध के बीच दुनिया पर मंडरा रहा खाद्य महंगाई का नया खतरा
साल 2022 में दुनिया ने रिकॉर्ड खाद्य महंगाई का दौर देखा था और अब एक बार फिर ऐसा ही संकट लौटने की आशंका जताई जा रही है। पश्चिम एशिया और यूक्रेन में जारी युद्ध, कच्चे तेल और उर्वरक (फर्टिलाइजर) की बढ़ती कीमतें, साथ ही अल नीनो की संभावित वापसी और भारत में मानसून की धीमी शुरुआत ने वैश्विक खाद्य सुरक्षा को लेकर चिंताएं बढ़ा दी हैं।
रिपोर्टों के अनुसार यदि आने वाले महीनों में मौसम सामान्य नहीं रहा और ऊर्जा संकट बना रहा तो वर्ष 2026 के अंत से खाद्य पदार्थों की कीमतों में तेजी देखने को मिल सकती है। इसका बड़ा असर 2027 के दौरान दुनिया के कई देशों में महसूस किया जा सकता है।
क्यों बढ़ रही है दुनिया की चिंता?
वैश्विक खाद्य बाजार इस समय तीन बड़े जोखिमों का सामना कर रहा है।
- पश्चिम एशिया और यूक्रेन में जारी युद्ध
- अल नीनो से जुड़ा मौसमीय खतरा
- भारत में मानसून की शुरुआत में देरी
इन तीनों कारकों का सीधा असर कृषि उत्पादन, परिवहन लागत और वैश्विक खाद्य आपूर्ति पर पड़ सकता है।
FAO ने क्यों दी खाद्य महंगाई बढ़ने की चेतावनी?
संयुक्त राष्ट्र के खाद्य एवं कृषि संगठन (FAO) के मुख्य अर्थशास्त्री मैक्सिमो टोरेरो के अनुसार फिलहाल अंतरराष्ट्रीय बाजार में खाद्य कीमतें अपेक्षाकृत नियंत्रित हैं, लेकिन यह स्थिति ज्यादा समय तक नहीं रह सकती।
उनका कहना है कि कमोडिटी कीमतों में बढ़ोतरी का असर खुदरा बाजार तक पहुंचने में आमतौर पर 3 से 6 महीने लगते हैं। ऐसे में वर्ष 2026 के अंत से खाद्य महंगाई फिर तेज हो सकती है और इसका असर 2027 में अधिक स्पष्ट दिखाई देगा।
युद्ध ने कैसे बढ़ाई खेती की लागत?
पश्चिम एशिया में तनाव के कारण स्ट्रेट ऑफ होर्मुज की सुरक्षा को लेकर चिंता बनी हुई है। यह दुनिया का सबसे महत्वपूर्ण ऊर्जा समुद्री मार्ग माना जाता है।
यदि यहां किसी तरह की बाधा आती है तो इसका असर कई क्षेत्रों पर पड़ सकता है।
- कच्चे तेल की कीमतें बढ़ेंगी।
- सिंचाई और कृषि मशीनरी का खर्च बढ़ेगा।
- पैकेजिंग और परिवहन महंगा होगा।
- प्राकृतिक गैस महंगी होने से उर्वरक उत्पादन की लागत बढ़ेगी।
इसी तरह रूस-यूक्रेन युद्ध के कारण डीजल और गैस की आपूर्ति भी प्रभावित हुई है, जिससे दुनिया भर के किसानों की लागत बढ़ रही है।
भारत का मानसून पूरी दुनिया के लिए क्यों अहम है?
भारत दुनिया का सबसे बड़ा चावल निर्यातक और दूसरा सबसे बड़ा उत्पादक देश है। इसलिए भारत में मानसून की स्थिति का असर केवल घरेलू बाजार तक सीमित नहीं रहता बल्कि पूरी दुनिया की खाद्य आपूर्ति पर पड़ता है।
इस वर्ष मानसून की शुरुआत अपेक्षाकृत धीमी रही, जिससे शुरुआती दौर में धान की बुवाई को लेकर चिंता बढ़ी। यदि चावल उत्पादन में बड़ी कमी आती है तो वैश्विक बाजार में सप्लाई घट सकती है और कीमतों में तेज उछाल देखने को मिल सकता है।
भारत के लिए राहत की खबर भी
हालांकि भारत के लिए तस्वीर पूरी तरह नकारात्मक नहीं है।
बजाज एसेट मैनेजमेंट की रिपोर्ट के अनुसार—
- जून के आखिर से बारिश में तेजी आई।
- जुलाई में मानसून मजबूत रहा।
- प्रमुख जलाशयों में जल स्तर बेहतर है।
- सरकारी गोदामों में अनाज का भंडार तय बफर नॉर्म्स से लगभग पांच गुना अधिक है।
यही वजह है कि भारत में खाद्य कीमतों पर वैश्विक संकट का असर अपेक्षाकृत सीमित रहने की संभावना जताई गई है।
2027 में कितनी रह सकती है महंगाई?
रिपोर्ट के मुताबिक वित्त वर्ष 2027 में भारत की खुदरा महंगाई (CPI) औसतन 5 से 5.5 प्रतिशत के बीच रह सकती है। हालांकि खाद्य आपूर्ति से जुड़ा दबाव अस्थायी माना जा रहा है जबकि कोर इन्फ्लेशन अभी भी नियंत्रण में है।
ग्रामीण अर्थव्यवस्था भी मजबूत बनी हुई है।
- ट्रैक्टर बिक्री में लगभग 19% की वृद्धि दर्ज की गई।
- कृषि ऋण में करीब 15% की बढ़ोतरी हुई।
- गैर-कृषि आय मजबूत रहने से ग्रामीण मांग बनी हुई है।
दुनिया भर के किसान क्यों घटा रहे हैं खेती?
ऊंची लागत ने कई देशों के किसानों की चिंता बढ़ा दी है।
- अमेरिका में कई किसानों ने कम उर्वरक वाली फसलों की ओर रुख किया है।
- अमेरिकी कृषि संगठनों का अनुमान है कि अतिरिक्त सरकारी सहायता नहीं मिलने पर किसानों को अरबों डॉलर का नुकसान हो सकता है।
- ऑस्ट्रेलिया ने भी महंगे फ्यूल और खाद के कारण सर्दियों की फसल उत्पादन में लगभग 21 प्रतिशत गिरावट की आशंका जताई है।
यदि यह स्थिति लंबे समय तक बनी रहती है तो वैश्विक खाद्य आपूर्ति और कमजोर हो सकती है।
अल नीनो क्यों बढ़ा रहा है खतरा?
विशेषज्ञों के अनुसार यदि आने वाले महीनों में अल नीनो प्रभाव मजबूत होता है तो कई देशों में सामान्य से कम बारिश और अधिक तापमान देखने को मिल सकता है।
इससे—
- फसलों की पैदावार घट सकती है।
- खाद्य आपूर्ति प्रभावित होगी।
- अंतरराष्ट्रीय बाजार में कीमतें बढ़ेंगी।
- करोड़ों लोगों के सामने खाद्य सुरक्षा का संकट गहरा सकता है।
ऊर्जा संकट, युद्ध, जलवायु परिवर्तन और अल नीनो मिलकर वैश्विक कृषि क्षेत्र के लिए एक “परफेक्ट स्टॉर्म” जैसी स्थिति पैदा कर सकते हैं।
भारत के लिए आगे क्या संकेत?
विशेषज्ञों का मानना है कि पूरे मानसून का आकलन केवल जून के आधार पर नहीं किया जा सकता। यदि अगस्त और सितंबर में अच्छी बारिश होती है तो मानसून की शुरुआती कमी काफी हद तक पूरी हो सकती है।
भारत के पास पर्याप्त खाद्यान्न भंडार, बेहतर जलाशय स्तर और मजबूत ग्रामीण अर्थव्यवस्था होने के कारण वैश्विक संकट का घरेलू अर्थव्यवस्था पर व्यापक असर सीमित रहने की उम्मीद है। हालांकि अंतरराष्ट्रीय बाजार में खाद्य कीमतों और ऊर्जा लागत पर लगातार नजर रखना जरूरी होगा।


