Judicial Backlog in India: देश की न्याय व्यवस्था के सामने लंबित मामलों का बढ़ता बोझ एक बड़ी चुनौती बनता जा रहा है। केंद्र सरकार ने राज्यसभा में जानकारी देते हुए बताया कि सुप्रीम कोर्ट में 10 हजार से अधिक मामले ऐसे हैं, जो एक दशक से ज्यादा समय से लंबित हैं। वहीं, देश के हाई कोर्टों में 80,660 मामले ऐसे हैं, जिनका निपटारा 30 साल से अधिक समय से नहीं हो पाया है। ये आंकड़े देश में बढ़ते ज्यूडिशियल बैकलॉग (Judicial Backlog) की गंभीर स्थिति को दर्शाते हैं।
केंद्रीय कानून मंत्री अर्जुन राम मेघवाल ने राज्यसभा में एक लिखित जवाब में बताया कि देश की सबसे बड़ी अदालत यानी सुप्रीम कोर्ट में वर्तमान समय में 96,000 से ज्यादा मामले लंबित हैं। इनमें से 10 हजार से अधिक केस ऐसे हैं, जो 10 साल से ज्यादा पुराने हैं।
सुप्रीम कोर्ट में दशकों पुराने केस लंबित
कानून मंत्री के अनुसार, सुप्रीम कोर्ट में लंबित मामलों में:
- 10 हजार से ज्यादा केस 10 साल से अधिक पुराने हैं।
- 558 मामले ऐसे हैं, जो 20 साल से ज्यादा समय से लंबित हैं।
- 26 केस तीन दशक से अधिक समय से अदालत में अटके हुए हैं।
इतने लंबे समय तक मामलों का लंबित रहना न्याय मिलने में देरी को दर्शाता है। विशेषज्ञों के अनुसार, किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था में समय पर न्याय मिलना बेहद जरूरी है, क्योंकि लंबे समय तक चलने वाले मुकदमे आम नागरिकों के विश्वास को प्रभावित कर सकते हैं।
हाई कोर्ट में 80 हजार से ज्यादा मामले 30 साल पुराने
न्यायिक बैकलॉग का सबसे बड़ा असर देश के हाई कोर्टों में दिखाई दे रहा है। सरकार ने बताया कि देश के विभिन्न हाई कोर्टों में 80,660 मामले 30 साल से ज्यादा समय से लंबित हैं।
केंद्र सरकार के अनुसार, मामलों के निपटारे में देरी के पीछे कई कारण जिम्मेदार हैं। इनमें मुकदमों की जटिलता, साक्ष्यों की प्रकृति, जांच प्रक्रिया में देरी और पक्षकारों के बीच सहयोग की कमी शामिल है।
देशभर में 5.64 करोड़ से ज्यादा केस पेंडिंग
नेशनल ज्यूडिशियल डेटा ग्रिड (NJDG) के आंकड़ों के मुताबिक, सुप्रीम कोर्ट, हाई कोर्ट और जिला एवं अधीनस्थ अदालतों को मिलाकर देशभर में 5.64 करोड़ से अधिक मामले लंबित हैं।
यह आंकड़ा बताता है कि भारतीय न्याय व्यवस्था पर लगातार दबाव बढ़ रहा है। बड़ी संख्या में लंबित मामलों के कारण नए मामलों की सुनवाई में भी देरी हो सकती है।
सरकार ने बताई न्याय में देरी की वजह
राज्यसभा में पूछे गए सवाल के जवाब में कानून मंत्री अर्जुन राम मेघवाल ने कहा कि मामलों का निपटारा पूरी तरह न्यायपालिका के अधिकार क्षेत्र में आता है। सरकार अदालतों को मामलों के निपटारे के लिए कोई निश्चित समय सीमा निर्धारित नहीं करती।
उन्होंने कहा कि मुकदमों के लंबित रहने के पीछे कई व्यावहारिक कारण होते हैं। इनमें शामिल हैं:
- मामलों की जटिलता
- सबूतों की प्रकृति
- गवाहों की उपलब्धता
- जांच एजेंसियों की प्रक्रिया
- वकीलों और पक्षकारों का सहयोग
- अदालतों में काम का बढ़ता दबाव
जजों की कमी भी बड़ी वजह
न्यायिक मामलों में देरी के पीछे न्यायाधीशों और कोर्ट इंफ्रास्ट्रक्चर की कमी भी एक अहम कारण माना जाता है।
रिपोर्ट्स के अनुसार, देश के 25 हाई कोर्टों में जजों की कुल स्वीकृत संख्या 1,122 है, जिनमें से करीब 341 पद खाली हैं। वहीं, जिला और निचली अदालतों में जजों के कुल 30,868 स्वीकृत पदों में से 7,311 पद खाली हैं।
खाली पदों की वजह से अदालतों पर मौजूद काम का दबाव और बढ़ जाता है, जिससे लंबित मामलों के निपटारे की गति प्रभावित होती है।
न्यायिक सुधारों की जरूरत
भारत में तेजी से बढ़ते मुकदमों के बोझ को कम करने के लिए लंबे समय से न्यायिक सुधारों की मांग उठती रही है। विशेषज्ञों का मानना है कि खाली न्यायिक पदों को जल्द भरना, अदालतों में डिजिटल सुविधाओं का विस्तार करना और प्रक्रियाओं को आसान बनाना जरूरी है।
ई-कोर्ट परियोजना, ऑनलाइन सुनवाई और डिजिटल केस मैनेजमेंट जैसी पहलें न्याय व्यवस्था को तेज बनाने की दिशा में कदम हैं, लेकिन लंबित मामलों की संख्या को देखते हुए अभी और बड़े स्तर पर सुधारों की जरूरत है।
निष्कर्ष
देश की अदालतों में करोड़ों मामलों का लंबित होना न्याय प्रणाली के सामने बड़ी चुनौती है। सुप्रीम कोर्ट में हजारों पुराने केस और हाई कोर्टों में दशकों से लंबित मामले यह दिखाते हैं कि तेज और प्रभावी न्याय के लिए जजों की नियुक्ति, बेहतर इंफ्रास्ट्रक्चर और न्यायिक प्रक्रियाओं में सुधार बेहद जरूरी है।


