भारत की ऊर्जा जरूरतों को पूरा करने के लिए कच्चे तेल और एलपीजी (LPG) का आयात लगातार बढ़ रहा है। जुलाई 2026 में भारत ने रूस से रिकॉर्ड मात्रा में कच्चे तेल का आयात किया, जिससे कुल आयात में रूस की हिस्सेदारी 55% से अधिक हो गई। वहीं दूसरी ओर घरेलू गैस की मांग पूरी करने के लिए भारत की अमेरिका पर निर्भरता भी काफी बढ़ गई है। जुलाई में आयात किए गए एलपीजी का करीब 73 फीसदी हिस्सा अकेले अमेरिका से आया।
यूक्रेन युद्ध के बाद पश्चिमी देशों द्वारा रूस पर लगाए गए प्रतिबंधों के बावजूद भारत ने रियायती कीमतों का लाभ उठाते हुए रूसी कच्चे तेल की खरीद लगातार बढ़ाई है। यही वजह है कि रूस भारत का सबसे बड़ा क्रूड ऑयल सप्लायर बना हुआ है।
जुलाई में रूस से कच्चे तेल का आयात ऑल-टाइम हाई
शिप-ट्रैकिंग और कमोडिटी डेटा उपलब्ध कराने वाली संस्था Kpler के आंकड़ों के अनुसार जुलाई में भारत ने रूस से औसतन 28 लाख बैरल प्रतिदिन (BPD) कच्चे तेल का आयात किया। जून में यह आंकड़ा 27 लाख बैरल प्रतिदिन था। इस बढ़ोतरी के साथ भारत के कुल कच्चे तेल आयात में रूस की हिस्सेदारी बढ़कर 55.5 फीसदी पहुंच गई, जो अब तक का सबसे ऊंचा स्तर है।
रूस से लगातार बढ़ती खरीद के पीछे सबसे बड़ा कारण डिस्काउंट पर मिलने वाला कच्चा तेल है। यूक्रेन युद्ध शुरू होने के बाद पश्चिमी देशों के प्रतिबंधों के कारण रूस ने भारत और चीन जैसे देशों को कम कीमत पर तेल उपलब्ध कराना शुरू किया था। भारतीय रिफाइनरियों ने इस अवसर का भरपूर फायदा उठाया।
खाड़ी देशों से भी बढ़ी खरीद
जुलाई के दौरान भारत ने केवल रूस पर ही निर्भरता नहीं बढ़ाई बल्कि पश्चिम एशियाई देशों से भी कच्चे तेल का आयात बढ़ाया। इसकी बड़ी वजह यह रही कि कुछ समय के लिए होर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) से तेल की आवाजाही सामान्य हो गई थी।
मुख्य आंकड़े इस प्रकार रहे:
- सऊदी अरब से आयात जून के 2.9 लाख बैरल प्रतिदिन से बढ़कर 4.2 लाख बैरल प्रतिदिन पहुंच गया।
- इराक से सप्लाई लगभग दोगुनी होकर 67,100 बैरल प्रतिदिन से बढ़कर 1.3 लाख बैरल प्रतिदिन हो गई।
- कुवैत से भी लंबे अंतराल के बाद आयात फिर शुरू हुआ और जुलाई में वहां से 51,600 बैरल प्रतिदिन तेल आया।
इन आंकड़ों से स्पष्ट है कि भारत अपनी ऊर्जा सुरक्षा बनाए रखने के लिए सप्लाई स्रोतों में विविधता भी बनाए हुए है।
यूएई से आयात में आई कमी
जहां सऊदी अरब और इराक से खरीद बढ़ी, वहीं संयुक्त अरब अमीरात (UAE) से कच्चे तेल का आयात कुछ कम हुआ। जून में यूएई से भारत ने करीब 5.1 लाख बैरल प्रतिदिन तेल खरीदा था, जो जुलाई में घटकर 4.6 लाख बैरल प्रतिदिन रह गया।
इसके बावजूद यूएई भारत के लिए रूस के बाद दूसरा सबसे बड़ा कच्चा तेल सप्लायर बना हुआ है।
LPG के मामले में अमेरिका सबसे बड़ा सप्लायर
जुलाई में भारत ने 12 लाख टन से अधिक एलपीजी का आयात किया। इसमें सबसे बड़ा योगदान अमेरिका का रहा।
- कुल एलपीजी आयात: 12 लाख टन से अधिक
- अमेरिका से आयात: 9 लाख टन से ज्यादा
- कुल हिस्सेदारी: करीब 73 फीसदी
यह दर्शाता है कि घरेलू एलपीजी की मांग पूरी करने में भारत की अमेरिका पर निर्भरता तेजी से बढ़ रही है।
क्यों बढ़ रहा है रूस से तेल आयात?
विशेषज्ञों के अनुसार रूस से लगातार बढ़ते आयात के पीछे कई कारण हैं।
- रूसी कच्चा तेल अन्य सप्लायर्स की तुलना में सस्ता उपलब्ध है।
- रूस से कार्गो की उपलब्धता लगातार बनी हुई है।
- रूस के रिफाइनिंग इंफ्रास्ट्रक्चर पर ड्रोन हमलों के कारण वहां घरेलू रिफाइनिंग कम हुई है, जिससे निर्यात के लिए अधिक कच्चा तेल उपलब्ध हो रहा है।
- होर्मुज और बाब-अल-मंडेब जैसे महत्वपूर्ण समुद्री मार्गों पर तनाव के बीच रूस की सप्लाई अपेक्षाकृत अधिक भरोसेमंद बनी हुई है।
Kpler के लीड एनालिस्ट निखिल दुबे के अनुसार मौजूदा भू-राजनीतिक परिस्थितियों में रूसी कच्चा तेल भारतीय रिफाइनरियों के लिए सबसे विश्वसनीय विकल्प बनकर उभरा है।
कच्चे तेल की कीमतों में बड़ी गिरावट
अंतरराष्ट्रीय बाजार में सोमवार को कच्चे तेल की कीमतों में भी तेज गिरावट देखने को मिली। ब्रेंट क्रूड करीब 5 फीसदी टूटकर 83.53 डॉलर प्रति बैरल पर कारोबार करता दिखा।
यदि वैश्विक बाजार में कच्चे तेल की कीमतें इसी तरह नरम रहती हैं तो भारत के आयात बिल पर दबाव कम हो सकता है। साथ ही पेट्रोल और डीजल की कीमतों पर भी सकारात्मक असर देखने को मिल सकता है।
भारत की ऊर्जा रणनीति पर क्या संकेत?
रूस से रिकॉर्ड आयात और अमेरिका से बढ़ती एलपीजी खरीद यह दिखाती है कि भारत फिलहाल लागत और आपूर्ति सुरक्षा—दोनों को प्राथमिकता दे रहा है। एक ओर रूस से सस्ता कच्चा तेल आयात कर रिफाइनिंग लागत कम रखने की कोशिश की जा रही है, वहीं दूसरी ओर एलपीजी की घरेलू मांग पूरी करने के लिए अमेरिका जैसे भरोसेमंद सप्लायर पर निर्भरता बढ़ रही है। आने वाले महीनों में पश्चिम एशिया की भू-राजनीतिक स्थिति और अंतरराष्ट्रीय कच्चे तेल की कीमतें भारत की आयात रणनीति को प्रभावित करती रहेंगी।


