Success Story: कई बार मुश्किलें ही जिंदगी की सबसे बड़ी सफलता की वजह बन जाती हैं। महाराष्ट्र के जलगांव के दो भाइयों के साथ भी कुछ ऐसा ही हुआ। लैंड सीलिंग एक्ट के कारण परिवार की 90% जमीन चली गई, लेकिन उन्होंने हार मानने के बजाय अपनी रसोई को ही प्रयोगशाला बना लिया। वहीं से शुरू हुआ Nilon’s का सफर, जो आज देश के सबसे बड़े प्रोसेस्ड फूड ब्रांड्स में शामिल है और करीब 500 करोड़ रुपये के कारोबार तक पहुंच चुका है।
Nilon’s Success Story: जमीन गई, लेकिन हौसला नहीं टूटा
देश की जानी-मानी प्रोसेस्ड फूड कंपनी Nilon’s की शुरुआत किसी बड़ी फैक्ट्री या भारी निवेश से नहीं हुई थी। इसकी नींव महाराष्ट्र के जलगांव जिले के उतरन गांव में दो भाइयों सुरेश बी. सांघवी और प्रफुल्ल सांघवी ने वर्ष 1962 में अपने घर की रसोई से रखी थी।
आज Nilon’s के अचार, सॉस, चटनी, केचप, जैम और कई अन्य फूड प्रोडक्ट देशभर के लाखों घरों तक पहुंचते हैं। कंपनी भारत के अलावा 35 से अधिक देशों में अपने उत्पादों का निर्यात भी करती है।
लैंड सीलिंग एक्ट ने बदल दी परिवार की किस्मत
सांघवी परिवार के पास कभी लगभग 1,500 एकड़ कृषि भूमि थी, जिसमें बड़े पैमाने पर नींबू के बागान थे। लेकिन 1961 में लागू लैंड सीलिंग एक्ट के बाद परिवार को अपनी लगभग 90 प्रतिशत जमीन छोड़नी पड़ी।
इतनी बड़ी जमीन जाने के बाद खेती के सहारे परिवार का भविष्य सुरक्षित रखना मुश्किल हो गया। यही वह मोड़ था जिसने दोनों भाइयों को खेती से आगे बढ़कर फूड प्रोसेसिंग बिजनेस शुरू करने के लिए प्रेरित किया।
घर की रसोई बनी पहली प्रयोगशाला
प्रफुल्ल सांघवी पिता के असमय निधन के कारण पढ़ाई पूरी नहीं कर सके और खेती की जिम्मेदारी संभालते रहे। दूसरी ओर, सुरेश सांघवी ने एग्रीकल्चर में ग्रेजुएशन किया था।
दोनों भाइयों ने खेती के अपने अनुभव का उपयोग करते हुए फलों और सब्जियों से वैल्यू एडेड प्रोडक्ट बनाने का फैसला किया। उन्होंने घर की रसोई में ही प्रयोग शुरू किए और अनानास, आम, शहतूत और अन्य फलों से स्क्वैश तैयार किए।
इसके बाद उन्होंने जेली, जैम, केचप और अन्य प्रोसेस्ड फूड प्रोडक्ट बनाकर Nilon’s ब्रांड नाम से बाजार में बेचना शुरू किया।
शुरुआती दिनों में नहीं मिली सफलता
बिजनेस की शुरुआत आसान नहीं रही। बाजार में Nilon’s के प्रोडक्ट्स को शुरुआती वर्षों में उम्मीद के मुताबिक प्रतिक्रिया नहीं मिली। लगातार संघर्ष के कारण 1965 में हालात ऐसे बन गए कि प्रफुल्ल सांघवी ने बिजनेस बंद करने तक की सलाह दे दी।
लेकिन सुरेश सांघवी ने हार नहीं मानी। उन्हें विश्वास था कि गुणवत्ता और मेहनत एक दिन जरूर रंग लाएगी।
1966 का एक कॉन्ट्रैक्ट बना टर्निंग पॉइंट
कंपनी की किस्मत 1966 में बदल गई, जब सरकार ने मिलिट्री कैंटीन के लिए खाद्य उत्पादों की आपूर्ति हेतु टेंडर जारी किए।
Nilon’s को आम, नींबू, मिक्स और मिर्च अचार की चारों प्रमुख वैरायटी की सप्लाई का कॉन्ट्रैक्ट मिल गया। यह कंपनी के लिए पहला बड़ा ऑर्डर था।
इस अवसर का लाभ उठाने के लिए दोनों भाइयों ने बैंक से लोन लेकर मैन्युफैक्चरिंग यूनिट स्थापित की और बड़े पैमाने पर अचार का उत्पादन शुरू किया। यहीं से कंपनी ने तेजी से विकास की राह पकड़ ली।
टूटी-फ्रूटी ने दिलाई नई पहचान
1970 के दशक में Nilon’s का टूटी-फ्रूटी पूरे देश में बेहद लोकप्रिय हुआ। इसके बाद कंपनी ने केवल अचार तक खुद को सीमित नहीं रखा, बल्कि धीरे-धीरे कई नई फूड कैटेगरी में प्रवेश किया।
ब्रांड ने गुणवत्ता, स्वाद और किफायती कीमत के दम पर उपभोक्ताओं का भरोसा जीता और देशभर में अपनी मजबूत पहचान बनाई।
दूसरी पीढ़ी ने बदली कंपनी की तस्वीर
वर्ष 2004 में सुरेश सांघवी के बेटे दीपक सांघवी ने केवल 24 वर्ष की उम्र में कंपनी की कमान संभाली। उस समय कंपनी का टर्नओवर लगभग 8 करोड़ रुपये था।
दीपक सांघवी ने कंपनी को सिर्फ अचार ब्रांड की पहचान से बाहर निकालकर एक मल्टी-कैटेगरी फूड ब्रांड बनाने की रणनीति अपनाई।
इसके तहत कंपनी ने बाजार में कई नए उत्पाद लॉन्च किए, जिनमें शामिल हैं—
- पास्ता सॉस
- पास्ता मसाला
- शेजवान चटनी
- अदरक-लहसुन पेस्ट
- टोमैटो सॉस
- चाइनीज़ फूड मिक्स
- अन्य रेडी-टू-कुक और प्रोसेस्ड फूड प्रोडक्ट
आज 500 करोड़ रुपये के करीब पहुंचा कारोबार
लगातार नए उत्पादों और मजबूत वितरण नेटवर्क के दम पर Nilon’s का कारोबार तेजी से बढ़ा। कंपनी का वार्षिक राजस्व हाल के वर्षों में 438 करोड़ रुपये के आसपास रहा है और वर्तमान में इसका कारोबार करीब 500 करोड़ रुपये के स्तर तक पहुंच चुका है।
कंपनी का अचार सेगमेंट में लगभग 25% मार्केट शेयर बताया जाता है। इसके उत्पाद देशभर के लाखों रिटेल स्टोर्स में उपलब्ध हैं और कंपनी आने वाले समय में अपनी पहुंच 40 लाख रिटेल आउटलेट्स तक बढ़ाने की योजना पर काम कर रही है।
Nilon’s Success Story से मिलने वाली सीख
Nilon’s की कहानी बताती है कि विपरीत परिस्थितियां भी नई शुरुआत का अवसर बन सकती हैं। जमीन खोने के बाद भी सांघवी परिवार ने हार नहीं मानी, बल्कि खेती के अनुभव को बिजनेस में बदल दिया। छोटी सी रसोई से शुरू हुआ यह सफर आज करोड़ों रुपये के कारोबार और वैश्विक पहचान तक पहुंच चुका है। यह सफलता इस बात का उदाहरण है कि सही सोच, धैर्य और लगातार नवाचार किसी भी चुनौती को अवसर में बदल सकते हैं।


