भारत में बच्चों की परवरिश पर होने वाले खर्च को लेकर सोशल मीडिया पर नई बहस छिड़ गई है। एक कंटेंट क्रिएटर ने दावा किया कि जन्म से लेकर 18 साल की उम्र तक एक बच्चे की परवरिश पर करीब 1.39 करोड़ रुपये खर्च हो सकते हैं। हालांकि, उनके खर्च के अनुमान से ज्यादा चर्चा उस तुलना की हो रही है, जिसमें उन्होंने कहा कि इतने पैसों में एक लग्जरी स्पोर्ट्स कार खरीदी जा सकती है। वीडियो वायरल होने के बाद सोशल मीडिया पर लोगों की तीखी प्रतिक्रियाएं सामने आईं और यूजर्स दो हिस्सों में बंट गए।
1.39 करोड़ रुपये के दावे से मचा बवाल
Now Bro explain why he don't want kids
Bro say🎙️: Why I spend 1.39 Cr 🤯 pic.twitter.com/e2Buykk5mA
— Sumit (@beingsumit01) July 31, 2026 करीब 2.88 लाख फॉलोअर्स वाले कंटेंट क्रिएटर विख्यात ने अपने वीडियो में बताया कि उन्होंने खुद ‘चाइल्ड-फ्री’ रहने का फैसला किया है। उनका कहना है कि उन्होंने माता-पिता बनने से पहले संभावित खर्चों का विस्तृत आकलन किया और इसी आधार पर अपनी राय लोगों के सामने रखी।
उनके मुताबिक, भारत के बड़े शहरों में यदि कोई परिवार निजी स्वास्थ्य सेवाओं, अच्छे स्कूल और बेहतर सुविधाओं के साथ बच्चे की परवरिश करता है, तो 18 साल तक कुल खर्च 1.39 करोड़ रुपये तक पहुंच सकता है।
गर्भावस्था से शुरू किया पूरा हिसाब
इन्फ्लुएंसर ने सबसे पहले गर्भावस्था और डिलीवरी के खर्च को शामिल किया। उनके अनुसार डॉक्टर की फीस, मेडिकल टेस्ट, दवाइयों, मैटरनिटी कपड़ों और निजी अस्पताल में डिलीवरी पर लगभग 3 लाख रुपये खर्च हो सकते हैं।
इसके बाद जन्म से दो साल तक डायपर, बेबी फूड, टीकाकरण, खिलौने, किताबें, स्ट्रोलर, पालना और अन्य जरूरी सामान पर करीब 6 लाख रुपये खर्च होने का अनुमान लगाया गया।
सबसे बड़ा खर्च शिक्षा को बताया
वीडियो में दावा किया गया कि बच्चे की पढ़ाई सबसे महंगी जिम्मेदारी होती है। प्री-स्कूल से लेकर स्कूल की फीस, यूनिफॉर्म, किताबें, कोचिंग और अन्य शैक्षणिक गतिविधियों को जोड़ते हुए उन्होंने करीब 33 लाख रुपये का अनुमान लगाया।
उनका कहना था कि यह आंकड़ा दिल्ली, मुंबई जैसे महानगरों के औसत निजी स्कूलों के खर्च के निचले स्तर को ध्यान में रखकर तैयार किया गया है।
खाने, कपड़ों और गैजेट्स तक का जोड़ा हिसाब
वीडियो में बच्चे की परवरिश से जुड़े लगभग हर खर्च को शामिल किया गया। उनके अनुमान के अनुसार—
- भोजन पर लगभग 15 लाख रुपये
- ट्यूशन पर 9 लाख रुपये
- हेल्थकेयर पर 5.4 लाख रुपये
- मनोरंजन पर 9 लाख रुपये
- कपड़ों पर 7.2 लाख रुपये
- गैजेट्स पर 4 लाख रुपये
- खेल और हॉबी पर 8 लाख रुपये
- ट्रांसपोर्ट पर करीब 8 लाख रुपये
खर्च का यह अनुमान 18 साल की अवधि के लिए तैयार किया गया।
बड़े घर का किराया भी किया शामिल
इन्फ्लुएंसर का कहना था कि बच्चे के बड़े होने के साथ परिवार को अतिरिक्त कमरे की जरूरत पड़ सकती है। इसी वजह से उन्होंने बड़े घर के अतिरिक्त किराए को भी कुल खर्च में शामिल किया और इसके लिए करीब 32.4 लाख रुपये का अनुमान लगाया।
उन्होंने यह भी कहा कि इस गणना में महंगाई, कॉलेज की पढ़ाई और निवेश से मिलने वाले संभावित रिटर्न को शामिल नहीं किया गया है। यानी वास्तविक खर्च इससे अधिक भी हो सकता है।
BMW से तुलना ने भड़का दिया इंटरनेट
वीडियो में अपनी बात समझाने के लिए उन्होंने कहा कि यदि कोई व्यक्ति बच्चे की परवरिश पर इतना खर्च न करे, तो लगभग उसी रकम में BMW M4 Competition जैसी लग्जरी स्पोर्ट्स कार खरीद सकता है।
यही तुलना सोशल मीडिया यूजर्स को पसंद नहीं आई और वीडियो तेजी से वायरल हो गया। कई लोगों ने इसे बच्चों और परिवार की भावनाओं का अपमान बताया।
सोशल मीडिया पर बंटी लोगों की राय
वीडियो वायरल होने के बाद इंटरनेट पर लोगों की अलग-अलग प्रतिक्रियाएं देखने को मिलीं।
कुछ यूजर्स का कहना था कि महानगरों में निजी स्कूल, हेल्थकेयर और बेहतर जीवनशैली चुनने वाले परिवारों के लिए यह अनुमान पूरी तरह अवास्तविक नहीं है। वहीं बड़ी संख्या में लोगों ने कहा कि बच्चे की परवरिश का खर्च हर परिवार की आय, शहर, जीवनशैली और प्राथमिकताओं पर निर्भर करता है, इसलिए 1.39 करोड़ रुपये का दावा सभी पर लागू नहीं किया जा सकता।
एक यूजर ने लिखा कि उसने अपने परिवार में बच्चों की परवरिश देखी है और वास्तविक खर्च इस अनुमान से काफी कम रहा।
‘बच्चे की मुस्कान की कोई कीमत नहीं’
बहस के दौरान कई लोगों ने भावनात्मक पहलू भी सामने रखा। एक यूजर ने लिखा कि उसके छह महीने के बेटे की एक मुस्कान किसी भी रकम से ज्यादा कीमती है और बच्चों की परवरिश को केवल पैसों के हिसाब से नहीं मापा जा सकता।
कई लोगों ने यह भी कहा कि माता-पिता बनने का फैसला केवल आर्थिक गणना का विषय नहीं होता, बल्कि इसमें प्यार, जिम्मेदारी, भावनाएं और परिवार का महत्व भी शामिल होता है।
क्या वास्तव में इतना खर्च होता है?
विशेषज्ञों का मानना है कि बच्चे की परवरिश का कोई एक तय खर्च नहीं होता। यह कई बातों पर निर्भर करता है, जैसे—
- परिवार की आय और बजट
- शहर या कस्बे में रहने की लागत
- सरकारी या निजी स्कूल का चुनाव
- स्वास्थ्य सेवाओं का स्तर
- जीवनशैली और अतिरिक्त गतिविधियां
इसी कारण किसी एक अनुमान को पूरे भारत के लिए सही नहीं माना जा सकता।
निष्कर्ष
यह वायरल वीडियो एक बार फिर इस सवाल को चर्चा में ले आया है कि आज के समय में बच्चे की परवरिश कितनी महंगी हो गई है। हालांकि, जहां एक ओर बढ़ती शिक्षा और स्वास्थ्य लागत को लेकर चिंता जायज मानी जा रही है, वहीं दूसरी ओर अधिकांश लोगों का मानना है कि पैरेंटहुड को केवल आर्थिक खर्च के नजरिए से नहीं देखा जा सकता। बच्चे परिवार की सबसे बड़ी खुशी और जिम्मेदारी होते हैं, जिनकी कीमत किसी लग्जरी कार या किसी तय रकम से नहीं आंकी जा सकती।


