नई दिल्ली: देश में E20 पेट्रोल को लेकर जारी बहस के बीच सरकार ने संसद में एक अहम जानकारी साझा की है। सरकार ने स्वीकार किया है कि फूड कॉर्पोरेशन ऑफ इंडिया (FCI) ने पिछले एक वर्ष के दौरान एथेनॉल बनाने वाली कंपनियों को अपनी खरीद लागत से करीब 40% कम कीमत पर चावल उपलब्ध कराया। यह खुलासा राज्यसभा में दिए गए एक लिखित जवाब में हुआ है।
सरकार का कहना है कि यह बिक्री ओपन मार्केट सेल स्कीम (डोमेस्टिक) के तहत तय दरों पर की गई है और इसे किसी तरह की प्रत्यक्ष सब्सिडी नहीं माना जा सकता। हालांकि कृषि विशेषज्ञों का कहना है कि खरीद लागत और आर्थिक लागत से कम कीमत पर चावल बेचना अप्रत्यक्ष रूप से सब्सिडी जैसा ही है।
संसद में क्या बताया सरकार ने?
उपभोक्ता मामले, खाद्य एवं सार्वजनिक वितरण राज्य मंत्री निमूबेन जयंतीभाई बांभनिया ने राज्यसभा में बताया कि जून 2025 से जून 2026 के बीच FCI ने एथेनॉल उत्पादक कंपनियों को 2,250 से 2,320 रुपये प्रति क्विंटल की दर से चावल बेचा।
वहीं इसी अवधि में FCI की औसत खरीद लागत:
- 2024-25: 3,719.72 रुपये प्रति क्विंटल
- 2025-26 (संशोधित अनुमान): 3,889.46 रुपये प्रति क्विंटल
इस हिसाब से चावल खरीद लागत की तुलना में करीब 40% कम कीमत पर बेचा गया।
एक साल में कितना चावल बेचा गया?
सरकार के अनुसार पिछले 12 महीनों में FCI ने अपने गोदामों से एथेनॉल प्लांट्स को 6.35 मिलियन टन (63.5 लाख टन) चावल उपलब्ध कराया।
- कुल बिक्री मूल्य: 14,596.78 करोड़ रुपये
यह चावल देशभर के विभिन्न राज्यों में संचालित एथेनॉल डिस्टिलरीज को भेजा गया।
किस राज्य को मिला सबसे ज्यादा चावल?
सरकारी आंकड़ों के अनुसार एथेनॉल उत्पादन के लिए सबसे अधिक चावल हरियाणा को मिला।
| राज्य | चावल आवंटन (टन) |
|---|---|
| हरियाणा | 8,44,141 |
| उत्तर प्रदेश | 8,38,645 |
| पंजाब व हिमाचल प्रदेश | 6,58,952 |
| पश्चिम बंगाल | 5,84,672 |
| मध्य प्रदेश | 4,32,485 |
इन आंकड़ों से स्पष्ट है कि हरियाणा और उत्तर प्रदेश एथेनॉल उत्पादन के लिए FCI से सबसे बड़े लाभार्थी रहे।
एथेनॉल कंपनियों के लिए क्या रही कीमत?
ओपन मार्केट सेल स्कीम (डोमेस्टिक) के तहत सरकार ने अलग-अलग अवधियों के लिए चावल की कीमत तय की है।
| अवधि | बिक्री मूल्य (रुपये/क्विंटल) |
|---|---|
| जून 2025 – अक्टूबर 2025 | 2,250 |
| नवंबर 2025 – अक्टूबर 2026 | 2,320 |
| नवंबर 2026 – जून 2027 | 2,390 |
सरकार ने आने वाले समय के लिए भी चावल की कीमत में मामूली बढ़ोतरी की है, लेकिन यह अभी भी खरीद लागत से कम है।
खरीद लागत और आर्थिक लागत में क्या अंतर है?
FCI के लिए केवल किसानों से धान खरीदना ही खर्च नहीं होता। चावल को गोदामों में रखना, परिवहन करना, प्रोसेसिंग और वितरण जैसे कई खर्च भी जुड़े होते हैं।
- खरीद लागत: किसानों से चावल खरीदने की कीमत।
- आर्थिक लागत (Economic Cost): खरीद के अलावा भंडारण, परिवहन, रखरखाव और वितरण सहित कुल वास्तविक खर्च।
यही कारण है कि FCI की आर्थिक लागत खरीद लागत से काफी अधिक होती है।
क्या यह सब्सिडी है?
सरकार का कहना है कि एथेनॉल कंपनियों को कोई प्रत्यक्ष सब्सिडी नहीं दी जा रही है और उन्हें तय सरकारी दरों पर चावल बेचा जाता है।
हालांकि कृषि विशेषज्ञ जी.के. सूद का मानना है कि जब किसी उत्पाद को उसकी आर्थिक लागत से काफी कम कीमत पर बेचा जाता है तो इसे अप्रत्यक्ष सब्सिडी माना जा सकता है। उनके अनुसार इस कीमत के अंतर का बोझ अंततः फूड सब्सिडी पर पड़ता है।
अगले साल क्या है सरकार की योजना?
सरकार ने जानकारी दी है कि 2026-27 एथेनॉल सप्लाई ईयर के दौरान FCI के भंडार से लगभग 7.2 मिलियन टन (72 लाख टन) चावल एथेनॉल कंपनियों को बेचने की योजना है।
- प्रस्तावित बिक्री मूल्य: लगभग 23,900 रुपये प्रति टन
- अनुमानित आर्थिक लागत: लगभग 43,100 रुपये प्रति टन
यानी अगले वर्ष भी आर्थिक लागत और बिक्री मूल्य के बीच बड़ा अंतर बना रह सकता है।
E20 पेट्रोल और एथेनॉल नीति पर क्यों है बहस?
केंद्र सरकार पेट्रोल में एथेनॉल की हिस्सेदारी बढ़ाकर कच्चे तेल के आयात पर निर्भरता कम करना चाहती है। इससे विदेशी मुद्रा की बचत और किसानों को अतिरिक्त बाजार मिलने की उम्मीद है।
दूसरी ओर कुछ वाहन मालिकों का कहना है कि E20 पेट्रोल से माइलेज में हल्की कमी आती है और पुराने इंजनों पर इसका असर पड़ सकता है। सरकार भी पहले स्वीकार कर चुकी है कि E20 ईंधन से माइलेज में मामूली गिरावट संभव है, हालांकि इसे ऊर्जा सुरक्षा और पर्यावरणीय लक्ष्यों की दिशा में महत्वपूर्ण कदम बताया जाता है।
निष्कर्ष
संसद में सरकार द्वारा साझा किए गए आंकड़ों से साफ है कि FCI ने पिछले एक वर्ष में एथेनॉल कंपनियों को खरीद लागत से काफी कम कीमत पर बड़ी मात्रा में चावल उपलब्ध कराया। सरकार इसे ओपन मार्केट सेल स्कीम के तहत सामान्य बिक्री बता रही है, जबकि विशेषज्ञ इसे अप्रत्यक्ष सब्सिडी मान रहे हैं। ऐसे में एथेनॉल नीति, खाद्य सब्सिडी और सार्वजनिक संसाधनों के उपयोग को लेकर बहस आगे भी जारी रहने की संभावना है।


