Russia Oil: ईरान-अमेरिका तनाव और होर्मुज स्ट्रेट में सप्लाई संकट ने वैश्विक कच्चे तेल बाजार को बुरी तरह प्रभावित किया। इसका सबसे बड़ा असर भारतीय रिफाइनरियों द्वारा खरीदे जाने वाले रूसी कच्चे तेल (Russian Crude Oil) की कीमतों पर देखने को मिला। कुछ ही महीनों में रूसी तेल कभी ब्रेंट क्रूड से 20 डॉलर प्रति बैरल प्रीमियम पर बिकने लगा तो कभी 10 डॉलर प्रति बैरल डिस्काउंट पर उपलब्ध हुआ। यही उतार-चढ़ाव अब भारतीय तेल कंपनियों के लिए बाजार की घबराहट और सप्लाई जोखिम का सबसे बड़ा संकेतक बन गया है।
ईरान युद्ध ने बदल दिया रूसी तेल का समीकरण
मार्च में जब ईरान ने होर्मुज स्ट्रेट को प्रभावी रूप से बंद कर दिया, तब फारस की खाड़ी से निकलने वाले कई तेल टैंकर फंस गए। दुनिया भर में सप्लाई को लेकर चिंता बढ़ गई और भारतीय रिफाइनरियों ने वैकल्पिक स्रोतों की तलाश तेज कर दी।
ऐसे समय में रूस सबसे भरोसेमंद विकल्प बनकर सामने आया। बड़ी संख्या में रूसी तेल के कार्गो पहले से ही समुद्र में मौजूद थे, जिससे उन्हें अपेक्षाकृत कम समय में भारत पहुंचाया जा सका।
2 डॉलर के डिस्काउंट से 20 डॉलर के प्रीमियम तक पहुंचा रूसी तेल
संघर्ष शुरू होने से पहले भारतीय कंपनियां रूसी तेल को ब्रेंट क्रूड के मुकाबले करीब 2 डॉलर प्रति बैरल के डिस्काउंट पर खरीद रही थीं।
लेकिन जैसे ही वैश्विक सप्लाई पर संकट गहराया, हर उपलब्ध कार्गो की मांग बढ़ गई। इसका फायदा उठाते हुए रूसी विक्रेताओं ने भारी प्रीमियम वसूला।
इंडस्ट्री सूत्रों के अनुसार, कई भारतीय रिफाइनरियों ने रूसी कच्चे तेल के लिए 12 से 20 डॉलर प्रति बैरल तक का प्रीमियम चुकाया। जिन कंपनियों ने अमेरिकी प्रतिबंधों के कारण रूस से खरीद कम कर दी थी, उन्होंने भी मार्च में आयात दोगुना कर दिया।
भारत के आयात में रूस की हिस्सेदारी बनी मजबूत
संकट के बावजूद भारत के कुल कच्चे तेल आयात में रूस की हिस्सेदारी लगभग 40% या उससे अधिक बनी रही। हालांकि, इन कार्गो की कीमतें लगातार बदलती रहीं क्योंकि बाजार में सप्लाई जोखिम को लेकर धारणा बार-बार बदल रही थी।
उधर, चीन द्वारा रूसी तेल की खरीद घटाने से अतिरिक्त कार्गो भारत और अन्य एशियाई खरीदारों के लिए उपलब्ध हो गए, जिससे भारतीय रिफाइनरियों को राहत मिली।
भारत ने बढ़ाई सप्लाई में विविधता
सिर्फ रूस पर निर्भर रहने के बजाय भारत ने अन्य देशों से भी तेल खरीद बढ़ाई। भारतीय रिफाइनरियों ने हाल के महीनों में:
- अंगोला से कच्चा तेल खरीदा
- गैबॉन से अतिरिक्त कार्गो मंगाए
- कांगो से सप्लाई बढ़ाई
- ब्राजील और वेनेजुएला से आयात किया
- सऊदी अरब और UAE से अतिरिक्त शिपमेंट हासिल किए
साथ ही सऊदी अरब ने रेड सी एक्सपोर्ट टर्मिनल से निर्यात बढ़ाकर खाड़ी क्षेत्र में आई बाधाओं की भरपाई करने की कोशिश की।
अप्रैल और मई में फिर लौटा डिस्काउंट
सप्लाई संकट कम होने और कई देशों से अतिरिक्त उत्पादन उपलब्ध होने के बाद अप्रैल तक रूसी तेल का प्रीमियम घटकर लगभग 10 डॉलर प्रति बैरल रह गया।
मई में बाजार और स्थिर हुआ। ब्राजील, वेनेजुएला, सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात से बेहतर सप्लाई मिलने के कारण रूसी तेल लगभग फिर से डिस्काउंट पर मिलने लगा।
ईरान और अमेरिका के बीच युद्धविराम की संभावना ने भी बाजार को भरोसा दिया कि वैश्विक सप्लाई में बड़ी रुकावट नहीं आएगी।
जून में फिर शुरू हुआ डिस्काउंट का दौर
जून में ईरान और अमेरिका के बीच अंतरिम समझौते के बाद बाजार में भू-राजनीतिक जोखिम कम होने की उम्मीद बढ़ी।
इस दौरान ब्रेंट क्रूड की कीमत लगभग 120 डॉलर प्रति बैरल से घटकर 71 डॉलर प्रति बैरल तक आ गई। इसके साथ ही रूसी तेल पर दोबारा करीब 10 डॉलर प्रति बैरल का डिस्काउंट मिलने लगा।
फिर बढ़ा तनाव, खत्म हुई छूट
हालांकि राहत ज्यादा समय तक नहीं टिक सकी। ईरान और अमेरिका के बीच तनाव दोबारा बढ़ने लगा। इसके साथ ही यमन में ईरान समर्थित हूती विद्रोहियों ने लाल सागर से गुजरने वाले वाणिज्यिक जहाजों पर हमले तेज कर दिए।
इसका असर सऊदी अरब से होने वाले तेल निर्यात पर भी पड़ा, जिससे वैश्विक सप्लाई को लेकर चिंता फिर बढ़ गई। नतीजतन रूसी तेल पर मिलने वाला डिस्काउंट लगभग खत्म हो गया और ब्रेंट क्रूड की कीमत फिर से करीब 100 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गई।
भारतीय रिफाइनरियों के लिए क्यों अहम है रूसी तेल?
भारत अपनी जरूरत का लगभग 85% कच्चा तेल आयात करता है। ऐसे में रूसी तेल पर मिलने वाला डिस्काउंट भारतीय रिफाइनरियों की लागत कम करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
लेकिन जब वैश्विक संकट बढ़ता है तो यही डिस्काउंट खत्म हो जाता है या प्रीमियम में बदल जाता है, जिससे रिफाइनिंग लागत बढ़ती है। इसका असर पेट्रोल, डीजल, एविएशन फ्यूल और अन्य पेट्रोलियम उत्पादों की कीमतों पर भी पड़ सकता है।
आगे क्या रहेगा बाजार का रुख?
विशेषज्ञों का मानना है कि जब तक पश्चिम एशिया में भू-राजनीतिक तनाव बना रहेगा, तब तक रूसी कच्चे तेल की कीमतों में तेज उतार-चढ़ाव देखने को मिल सकता है। भारतीय रिफाइनरियां फिलहाल रूस के साथ-साथ अफ्रीका, लैटिन अमेरिका और मध्य-पूर्व के अन्य देशों से भी आयात बढ़ाकर सप्लाई जोखिम को कम करने की रणनीति अपना रही हैं।
यदि होर्मुज स्ट्रेट और लाल सागर में स्थिति सामान्य होती है तो रूसी तेल पर दोबारा डिस्काउंट देखने को मिल सकता है। वहीं तनाव बढ़ने की स्थिति में प्रीमियम का दौर फिर लौट सकता है।


