नई दिल्ली: यूक्रेन युद्ध के बाद वैश्विक ऊर्जा बाजार में आए बड़े बदलाव का सबसे ज्यादा फायदा भारत को मिला है। पश्चिमी देशों के प्रतिबंधों के चलते रूस का कच्चा तेल भारत के लिए प्रमुख स्रोत बन गया और इसी का लाभ उठाते हुए भारत ने चुपचाप अपनी एनर्जी सिक्योरिटी (Energy Security) को पहले से कहीं अधिक मजबूत कर लिया है। रिकॉर्ड मात्रा में रूसी कच्चे तेल के आयात ने देश के रणनीतिक और वाणिज्यिक तेल भंडार को मजबूत किया है। हालांकि, ऊर्जा विशेषज्ञों का कहना है कि इस सफलता के बावजूद भारत के सामने एक बड़ा रणनीतिक जोखिम अभी भी बना हुआ है।
रूस से रिकॉर्ड तेल आयात, मजबूत हुआ भारत का स्टॉक
एनर्जी इकोनॉमिस्ट और NGP Energy Capital Management के पूर्व मुख्य अर्थशास्त्री अनस अलहाजी के अनुसार जून 2026 में भारत ने रूस से रिकॉर्ड स्तर पर कच्चे तेल का आयात किया। इससे देश अपने घटते तेल भंडार को दोबारा भरने में सफल रहा।
विशेषज्ञों के मुताबिक हाल के महीनों में तेल स्टॉक में जो कमी देखने को मिली थी, उसका कारण सप्लाई में रुकावट नहीं बल्कि पेट्रोलियम उत्पादों के निर्यात में तेज बढ़ोतरी थी। भारत लगातार डीजल, गैसोलीन और जेट फ्यूल जैसे रिफाइंड प्रोडक्ट्स का निर्यात बढ़ा रहा है, जिसके कारण स्टॉक अस्थायी रूप से कम हुए थे।
2026 में फिर बढ़ा कच्चे तेल का भंडार
साप्ताहिक आंकड़ों के अनुसार वर्ष 2026 के 15वें सप्ताह के आसपास भारत का कच्चे तेल का स्टॉक घटकर करीब 8.5 करोड़ बैरल तक पहुंच गया था। इसके बाद लगातार आयात बढ़ने से स्टॉक में तेजी से सुधार हुआ और 25वें सप्ताह तक यह 10.7 करोड़ बैरल से अधिक हो गया, जो इस वर्ष का सबसे ऊंचा स्तर माना गया।
हालांकि इसके बाद कुछ गिरावट दर्ज की गई, लेकिन कुल मिलाकर स्टॉक अब भी ऐतिहासिक औसत के आसपास बना हुआ है, जो ऊर्जा सुरक्षा के लिहाज से सकारात्मक संकेत है।
सस्ते रूसी तेल से भारतीय रिफाइनर को बड़ा फायदा
यूक्रेन संघर्ष के बाद रूस ने भारत को भारी छूट पर कच्चा तेल उपलब्ध कराया। इसका सीधा फायदा भारतीय रिफाइनिंग कंपनियों को मिला।
कम कीमत पर कच्चा तेल खरीदकर भारतीय रिफाइनर उसे प्रोसेस कर डीजल, पेट्रोल, एविएशन फ्यूल और अन्य पेट्रोलियम उत्पादों के रूप में अंतरराष्ट्रीय बाजार में निर्यात कर रहे हैं। इससे उनकी परिचालन क्षमता (Operational Efficiency) मजबूत बनी हुई है और निर्यात आय में भी बढ़ोतरी हुई है।
यही वजह है कि भारत वैश्विक ऊर्जा बाजार में पहले से कहीं अधिक मजबूत स्थिति में दिखाई दे रहा है।
बाब-अल-मंदेब स्ट्रेट बना सबसे बड़ा जोखिम
अनस अलहाजी ने चेतावनी दी है कि भारत की ऊर्जा सुरक्षा पूरी तरह जोखिम मुक्त नहीं है।
उन्होंने बताया कि भारत के लिए आने वाला अधिकांश रूसी कच्चा तेल बाब-अल-मंदेब स्ट्रेट (Bab-el-Mandeb Strait) से होकर गुजरता है। यह समुद्री मार्ग लाल सागर को अदन की खाड़ी से जोड़ता है और दुनिया के सबसे व्यस्त व्यापारिक रास्तों में शामिल है।
यदि किसी कारण यह समुद्री मार्ग बंद हो जाता है या यहां लंबे समय तक बाधा आती है, तो भारत की तेल सप्लाई पर गंभीर असर पड़ सकता है।
हूती हमलों से बढ़ी चिंता
विशेषज्ञों के अनुसार बाब-अल-मंदेब क्षेत्र में हूती विद्रोहियों के हमलों के कारण पहले से ही तनाव बना हुआ है। यदि स्थिति और बिगड़ती है तो तेल टैंकरों को अफ्रीका के केप ऑफ गुड होप के रास्ते लंबा समुद्री सफर तय करना पड़ेगा।
इससे कई समस्याएं पैदा हो सकती हैं—
- माल ढुलाई की लागत में तेज बढ़ोतरी।
- जहाजों की यात्रा अवधि कई दिन बढ़ सकती है।
- बीमा प्रीमियम महंगा हो जाएगा।
- कच्चे तेल की आपूर्ति धीमी पड़ सकती है।
- रिफाइनरी मार्जिन पर दबाव बढ़ेगा।
- घरेलू ईंधन कीमतों पर असर पड़ सकता है।
भारत की रणनीति क्यों मानी जा रही सफल?
विशेषज्ञों का मानना है कि भारत ने पिछले कुछ वर्षों में ऊर्जा सुरक्षा को केवल आयात तक सीमित नहीं रखा, बल्कि पर्याप्त तेल भंडार तैयार करने और अलग-अलग स्रोतों से सप्लाई सुनिश्चित करने की दिशा में भी काम किया है।
रूस से सस्ते तेल की उपलब्धता ने भारत को वैश्विक कीमतों के उतार-चढ़ाव से काफी हद तक बचाया है। वहीं, मजबूत स्टॉक के कारण अचानक सप्लाई बाधित होने की स्थिति में भी देश के पास कुछ समय तक घरेलू मांग पूरी करने की क्षमता बनी रहती है।
आगे क्या है चुनौती?
भू-राजनीतिक तनाव लगातार बढ़ रहे हैं। ऐसे में भारत के सामने सबसे बड़ी चुनौती केवल सस्ता तेल खरीदना नहीं, बल्कि सुरक्षित और विविध सप्लाई रूट विकसित करना भी है। विशेषज्ञों का मानना है कि ऊर्जा सुरक्षा को लंबे समय तक मजबूत बनाए रखने के लिए भारत को तेल आयात के स्रोतों और समुद्री मार्गों में विविधता लाने के साथ-साथ पर्याप्त रणनीतिक भंडार बनाए रखना होगा।


