जापान कभी दुनिया की सबसे ताकतवर अर्थव्यवस्थाओं में गिना जाता था। 1980 और 1990 के दशक में उसकी आर्थिक प्रगति इतनी तेज थी कि कई विशेषज्ञों का मानना था कि आने वाले समय में वह अमेरिका को भी पीछे छोड़कर दुनिया की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बन जाएगा। लेकिन समय ने ऐसी करवट ली कि आज वही जापान लगातार आर्थिक चुनौतियों से जूझ रहा है।
देश की GDP का आकार पिछले एक दशक में घटा है, येन की कीमत डॉलर के मुकाबले कमजोर हुई है, आबादी तेजी से बूढ़ी हो रही है और श्रमशक्ति की कमी आर्थिक विकास में बड़ी बाधा बन चुकी है। दूसरी ओर भारत लगातार तेज आर्थिक विकास दर्ज कर रहा है और दुनिया की शीर्ष अर्थव्यवस्थाओं में अपनी जगह मजबूत करता जा रहा है।
जापान की GDP क्यों लगातार घट रही है?
साल 2012 जापान की अर्थव्यवस्था के लिए एक महत्वपूर्ण वर्ष था। उस समय देश की नॉमिनल GDP लगभग 6.2 ट्रिलियन डॉलर के उच्च स्तर पर पहुंच गई थी। लेकिन इसके बाद आर्थिक विकास की रफ्तार कमजोर पड़ती गई और आज जापान की अर्थव्यवस्था का आकार घटकर लगभग 4.38 ट्रिलियन डॉलर रह गया है।
यह गिरावट केवल आर्थिक गतिविधियों की वजह से नहीं, बल्कि कमजोर होती जापानी करेंसी (येन) और लंबे समय तक चली आर्थिक सुस्ती का भी परिणाम है।
वहीं दूसरी ओर भारत ने इसी अवधि में उल्लेखनीय वृद्धि दर्ज की है। लगभग 1.8 ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था से बढ़कर भारत करीब 4.15 ट्रिलियन डॉलर तक पहुंच चुका है और आने वाले वर्षों में इसके और तेज़ी से बढ़ने की उम्मीद है।
1990 के दशक की आर्थिक बुलबुला (Economic Bubble) बना बड़ी समस्या
1980 के दशक के अंत तक जापान में शेयर बाजार और रियल एस्टेट की कीमतें रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच चुकी थीं। निवेशकों का विश्वास इतना अधिक था कि संपत्तियों की कीमतें वास्तविक आर्थिक क्षमता से कहीं ज्यादा बढ़ गईं।
1990 के दशक की शुरुआत में यह आर्थिक बुलबुला फूट गया।
इसके बाद—
- शेयर बाजार में भारी गिरावट आई।
- रियल एस्टेट सेक्टर बुरी तरह प्रभावित हुआ।
- बैंकिंग सिस्टम पर दबाव बढ़ गया।
- निवेश और उपभोग दोनों कमजोर पड़ गए।
इसी दौर को जापान का “Lost Decade” कहा गया। हालांकि बाद में यह संकट एक दशक तक सीमित नहीं रहा और कई वर्षों तक आर्थिक विकास बेहद धीमा बना रहा।
डिफ्लेशन ने बिगाड़ दी पूरी अर्थव्यवस्था
जापान की सबसे बड़ी आर्थिक समस्याओं में से एक रही डिफ्लेशन, यानी वस्तुओं और सेवाओं की कीमतों में लगातार गिरावट।
पहली नजर में कीमतें कम होना अच्छा लगता है, लेकिन जब लोग यह सोचकर खरीदारी टालने लगते हैं कि भविष्य में चीजें और सस्ती होंगी, तब कंपनियों की बिक्री घट जाती है।
इसका असर कई स्तरों पर दिखाई देता है—
- कंपनियों का मुनाफा कम होता है।
- नई नौकरियां कम बनती हैं।
- वेतन वृद्धि रुक जाती है।
- निवेश घट जाता है।
- पूरी अर्थव्यवस्था धीमी पड़ जाती है।
यही स्थिति जापान में वर्षों तक बनी रही।
क्यों कमजोर हो रहा है जापानी येन?
हाल के वर्षों में जापानी येन डॉलर के मुकाबले कई दशकों के सबसे निचले स्तर तक पहुंच गया।
कमजोर येन के पीछे कई कारण हैं।
1. बेहद कम ब्याज दरें
जापान ने वर्षों तक आर्थिक गतिविधियों को बढ़ाने के लिए ब्याज दरें शून्य या नकारात्मक स्तर पर रखीं।
जबकि अमेरिका सहित कई देशों के केंद्रीय बैंकों ने महंगाई रोकने के लिए ब्याज दरें तेजी से बढ़ाईं।
इस वजह से वैश्विक निवेशकों ने जापान से पैसा निकालकर अधिक ब्याज वाले देशों में निवेश करना शुरू कर दिया।
2. बैंक ऑफ जापान की सीमित कार्रवाई
हालांकि बैंक ऑफ जापान ने हाल में ब्याज दर बढ़ाकर लगभग 1 प्रतिशत तक पहुंचाई, लेकिन यह अब भी अमेरिका की तुलना में काफी कम है।
यही कारण है कि येन पर दबाव बना हुआ है।
3. सरकार का हस्तक्षेप भी बेअसर
येन को मजबूत करने के लिए जापानी सरकार ने विदेशी मुद्रा बाजार में हस्तक्षेप भी किया, लेकिन इससे स्थायी राहत नहीं मिली।
कमजोर करेंसी से क्या नुकसान होता है?
कमजोर करेंसी का सबसे बड़ा असर आयात पर पड़ता है।
जापान अपनी जरूरत का बड़ा हिस्सा विदेशों से खरीदता है, जिनमें शामिल हैं—
- कच्चा तेल
- प्राकृतिक गैस
- खाद्य पदार्थ
- कृषि उत्पाद
- कई औद्योगिक कच्चे माल
जब येन कमजोर होता है तो इन सभी आयातित वस्तुओं की कीमत बढ़ जाती है।
इससे देश में महंगाई बढ़ती है और आम लोगों की क्रय शक्ति प्रभावित होती है।
तेल की कीमतों ने भी बढ़ाई मुश्किल
मध्य पूर्व में भू-राजनीतिक तनाव और तेल की ऊंची कीमतों का असर जापान पर काफी अधिक पड़ा है।
चूंकि जापान ऊर्जा के लिए आयात पर निर्भर है, इसलिए कच्चे तेल की महंगी कीमतों ने उसकी उत्पादन लागत बढ़ा दी है।
इसका असर उद्योगों, परिवहन और उपभोक्ता खर्च पर साफ दिखाई देता है।
बूढ़ी होती आबादी सबसे बड़ी चुनौती
जापान की सबसे गंभीर समस्याओं में तेजी से बढ़ती बुजुर्ग आबादी शामिल है।
देश में जन्मदर लगातार कम हो रही है जबकि औसत आयु दुनिया में सबसे अधिक है।
इसके परिणामस्वरूप—
- काम करने वाले लोगों की संख्या घट रही है।
- श्रमिकों की कमी बढ़ रही है।
- सरकार पर पेंशन और स्वास्थ्य सेवाओं का खर्च बढ़ रहा है।
- टैक्स देने वालों की संख्या कम हो रही है।
यह स्थिति दीर्घकालीन आर्थिक विकास के लिए गंभीर चुनौती मानी जाती है।
क्या जापान फिर से मजबूत बन सकता है?
जापान की नई सरकार ने आने वाले वर्षों के लिए महत्वाकांक्षी लक्ष्य तय किए हैं।
सरकार का लक्ष्य वर्ष 2040 तक देश की नॉमिनल GDP को लगभग 6.8 ट्रिलियन डॉलर तक पहुंचाना है।
इसके लिए कई क्षेत्रों पर विशेष ध्यान दिया जा रहा है—
- आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस
- सेमीकंडक्टर उद्योग
- रोबोटिक्स
- डिजिटल ट्रांसफॉर्मेशन
- उच्च तकनीक विनिर्माण
- उत्पादकता बढ़ाने वाले सुधार
यदि इन क्षेत्रों में निवेश सफल रहता है तो जापान एक बार फिर तेज आर्थिक विकास की राह पकड़ सकता है।
दूसरी ओर भारत की अर्थव्यवस्था लगातार मजबूत
जब दुनिया की कई बड़ी अर्थव्यवस्थाएं धीमी विकास दर से जूझ रही हैं, तब भारत लगातार मजबूत आर्थिक प्रदर्शन कर रहा है।
भारत की तेज विकास दर के पीछे कई कारण माने जाते हैं—
- बड़ी युवा आबादी
- तेजी से बढ़ता डिजिटल इकोसिस्टम
- मजबूत घरेलू मांग
- इंफ्रास्ट्रक्चर पर भारी निवेश
- मैन्युफैक्चरिंग को बढ़ावा
- विदेशी निवेश में बढ़ोतरी
विशेषज्ञों का अनुमान है कि भारत अगले कुछ वर्षों में दुनिया की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बन सकता है।
2030 तक भारत के 7 ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था बनने की संभावना भी कई अंतरराष्ट्रीय संस्थाएं जता चुकी हैं।
जापान बनाम भारत: आर्थिक तस्वीर
| संकेतक | जापान | भारत |
|---|---|---|
| 2012 GDP | लगभग 6.2 ट्रिलियन डॉलर | लगभग 1.8 ट्रिलियन डॉलर |
| वर्तमान GDP | लगभग 4.38 ट्रिलियन डॉलर | लगभग 4.15 ट्रिलियन डॉलर |
| जनसंख्या प्रवृत्ति | घटती और बूढ़ी होती आबादी | युवा और बढ़ती कार्यशील आबादी |
| प्रमुख चुनौती | डिफ्लेशन, कमजोर येन, श्रमिकों की कमी | रोजगार सृजन, कौशल विकास, बुनियादी ढांचा |
| भविष्य का लक्ष्य | 2040 तक 6.8 ट्रिलियन डॉलर GDP | 2030 तक 7 ट्रिलियन डॉलर से अधिक GDP |
निष्कर्ष
जापान की आर्थिक यात्रा दुनिया के लिए एक महत्वपूर्ण सीख है। कभी तेज विकास, तकनीकी नेतृत्व और मजबूत उद्योगों के दम पर वैश्विक अर्थव्यवस्था में बड़ी हिस्सेदारी रखने वाला यह देश अब धीमी विकास दर, कमजोर मुद्रा, डिफ्लेशन और घटती कार्यशील आबादी जैसी चुनौतियों का सामना कर रहा है।
वहीं भारत जनसांख्यिकीय लाभ, डिजिटल परिवर्तन, बढ़ते निवेश और मजबूत घरेलू बाजार के कारण तेजी से आगे बढ़ रहा है। यदि वर्तमान गति बनी रहती है तो आने वाले वर्षों में भारत वैश्विक अर्थव्यवस्था में और अधिक प्रभावशाली भूमिका निभा सकता है, जबकि जापान को अपनी आर्थिक मजबूती वापस पाने के लिए संरचनात्मक सुधारों और नवाचार पर लगातार जोर देना होगा।


