नई दिल्ली। दुनिया भर में स्वच्छ ऊर्जा (Clean Energy) की ओर बढ़ने की कोशिशें जारी हैं, लेकिन यह बदलाव अब पहले जितना आसान नहीं रह गया है। बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव, सप्लाई चेन की चुनौतियां और ऊर्जा सुरक्षा को लेकर बढ़ती चिंताओं ने वैश्विक ऊर्जा परिवर्तन की रफ्तार को प्रभावित करना शुरू कर दिया है। इसी बीच वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम (WEF) की नई रिपोर्ट ने चेतावनी दी है कि रिकॉर्ड निवेश के बावजूद दुनिया टिकाऊ और मजबूत ऊर्जा व्यवस्था बनाने में अपेक्षित गति नहीं दिखा पा रही है।
WEF और एक्सेंचर द्वारा संयुक्त रूप से जारी Energy Transition Index (ETI) 2026 के अनुसार, वैश्विक स्तर पर ऊर्जा परिवर्तन (Energy Transition) की प्रक्रिया एक तरह से ठहराव की स्थिति में पहुंचती दिखाई दे रही है। हालांकि निवेश का स्तर लगातार बढ़ रहा है, लेकिन वास्तविक बदलाव की तैयारी और क्रियान्वयन में कमी देखी जा रही है।
रिकॉर्ड निवेश के बावजूद क्यों धीमा पड़ रहा है बदलाव?
रिपोर्ट के मुताबिक वर्ष 2025 में वैश्विक ऊर्जा क्षेत्र में कुल निवेश लगभग 3.3 ट्रिलियन डॉलर तक पहुंच गया। इसमें से करीब 2.3 ट्रिलियन डॉलर स्वच्छ ऊर्जा परियोजनाओं पर खर्च किए गए। यह अब तक का सबसे बड़ा निवेश माना जा रहा है।
इसके बावजूद विशेषज्ञों का कहना है कि निवेश की मात्रा और ऊर्जा बदलाव की वास्तविक तैयारी के बीच बड़ा अंतर पैदा हो गया है। पिछले एक दशक में पहली बार ऊर्जा परिवर्तन की तैयारी का स्तर नीचे आया है। इसका मुख्य कारण यह है कि कई देश अब पर्यावरणीय लक्ष्यों से अधिक ऊर्जा सुरक्षा को प्राथमिकता देने लगे हैं।
भू-राजनीतिक तनाव बढ़ा रहे मुश्किलें
WEF रिपोर्ट ऐसे समय आई है जब दुनिया कई भू-राजनीतिक संकटों का सामना कर रही है। विशेष रूप से होर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) जैसे महत्वपूर्ण ऊर्जा मार्गों में व्यवधान ने ऊर्जा आपूर्ति को लेकर चिंताएं बढ़ा दी हैं।
रिपोर्ट में कहा गया है कि इन घटनाओं ने वैश्विक ऊर्जा प्रणालियों की कमजोरियों को उजागर किया है। बिजली की बढ़ती मांग, कमजोर बुनियादी ढांचा और पूंजी तक असमान पहुंच जैसी समस्याएं पहले से ही ऊर्जा क्षेत्र पर दबाव बना रही हैं।
वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम के सेंटर फॉर एनर्जी एंड मैटेरियल्स के प्रमुख रॉबर्टो बोक्का के अनुसार, ऊर्जा परिवर्तन रुक नहीं रहा है, लेकिन इसकी दिशा और गति विभिन्न देशों में अलग-अलग होती जा रही है।
ऊर्जा सुरक्षा बनाम पर्यावरण: देशों के सामने बड़ी चुनौती
रिपोर्ट के अनुसार अधिकांश देश इस समय तीन प्रमुख लक्ष्यों के बीच संतुलन बनाने की कोशिश कर रहे हैं—
- ऊर्जा सुरक्षा (Energy Security)
- स्थिरता (Sustainability)
- किफायती ऊर्जा (Affordability)
बढ़ती वैश्विक अनिश्चितताओं के बीच इन तीनों लक्ष्यों को एक साथ हासिल करना आसान नहीं है। यही वजह है कि कई सरकारें फिलहाल ऊर्जा आपूर्ति सुनिश्चित करने पर ज्यादा ध्यान दे रही हैं।
भारत और चीन बने स्वच्छ ऊर्जा परिवर्तन के बड़े खिलाड़ी
हालांकि वैश्विक स्तर पर ऊर्जा परिवर्तन की गति धीमी हुई है, लेकिन कुछ देशों ने उल्लेखनीय प्रगति दिखाई है। रिपोर्ट में विशेष रूप से भारत और चीन का उल्लेख किया गया है।
चीन ने स्वच्छ ऊर्जा उत्पादन और उपयोग के मामले में अपना मजबूत प्रदर्शन बरकरार रखा है। वहीं भारत ने ऊर्जा परिवर्तन की तैयारी (Transition Readiness) के क्षेत्र में सबसे बेहतर सुधार दर्ज किया है।
भारत की प्रगति के पीछे कई प्रमुख कारण बताए गए हैं—
- नीतिगत सुधार
- नवीकरणीय ऊर्जा परियोजनाओं में तेजी
- बिजली ग्रिड का विस्तार
- निवेश आकर्षित करने वाले कदम
- ऊर्जा इंफ्रास्ट्रक्चर का विकास
रिपोर्ट के अनुसार भारत आने वाले वर्षों में वैश्विक ऊर्जा परिवर्तन का एक महत्वपूर्ण केंद्र बन सकता है।
उभरती अर्थव्यवस्थाओं के सामने फंडिंग की चुनौती
WEF रिपोर्ट ने एक और महत्वपूर्ण असंतुलन की ओर ध्यान दिलाया है। दुनिया में स्वच्छ ऊर्जा निवेश का लगभग 75 प्रतिशत हिस्सा कुछ चुनिंदा देशों तक सीमित है।
इसके विपरीत बिजली की भविष्य की मांग में होने वाली लगभग 80 प्रतिशत वृद्धि उभरती अर्थव्यवस्थाओं से आने की संभावना है।
इस स्थिति से कई समस्याएं पैदा हो सकती हैं—
- स्वच्छ ऊर्जा परियोजनाओं की रफ्तार धीमी पड़ सकती है।
- विकसित और विकासशील देशों के बीच ऊर्जा असमानता बढ़ सकती है।
- कार्बन उत्सर्जन घटाने के वैश्विक लक्ष्य प्रभावित हो सकते हैं।
- सस्ती फाइनेंसिंग तक पहुंच बड़ी चुनौती बन सकती है।
AI और डेटा सेंटर बढ़ा रहे बिजली की मांग
रिपोर्ट के अनुसार ऊर्जा क्षेत्र पर एक नया दबाव तेजी से बढ़ती बिजली मांग का है। आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI), डेटा सेंटर, इलेक्ट्रिक वाहन और कूलिंग सिस्टम की बढ़ती जरूरतें बिजली खपत को तेजी से बढ़ा रही हैं।
पिछले वर्ष वैश्विक बिजली मांग में करीब 3 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई। आने वाले वर्षों में यह वृद्धि और तेज हो सकती है।
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि ग्रिड विस्तार और बिजली अवसंरचना में पर्याप्त निवेश नहीं हुआ तो ऊर्जा परिवर्तन की प्रक्रिया प्रभावित हो सकती है।
WEF ने सुझाए तीन बड़े समाधान
रिपोर्ट में सरकारों और नीति निर्माताओं के लिए तीन प्रमुख प्राथमिकताएं तय की गई हैं—
1. ऊर्जा प्रणालियों को अधिक सुरक्षित और मजबूत बनाना
ऊर्जा ढांचे को इस तरह तैयार किया जाए कि वह संकट और आपूर्ति व्यवधानों का सामना कर सके।
2. ग्रिड और इंफ्रास्ट्रक्चर का तेजी से विस्तार
बढ़ती बिजली मांग को पूरा करने के लिए बिजली नेटवर्क और स्टोरेज क्षमता बढ़ाना जरूरी होगा।
3. निवेश के लिए स्थिर नीति माहौल तैयार करना
ऐसी नीतियां बनाई जाएं जो लंबी अवधि के निवेशकों को भरोसा दें, खासकर विकासशील देशों में।
आगे क्या?
WEF का मानना है कि आने वाले वर्षों में वही देश सबसे अधिक लाभ में रहेंगे जो ऊर्जा सुरक्षा और पर्यावरणीय लक्ष्यों के बीच संतुलन स्थापित कर पाएंगे। स्वच्छ ऊर्जा की ओर बढ़ना अब केवल कार्बन उत्सर्जन कम करने का मामला नहीं रह गया है, बल्कि यह आर्थिक प्रतिस्पर्धा, ऊर्जा सुरक्षा और राष्ट्रीय रणनीति का भी अहम हिस्सा बन चुका है।
यदि वैश्विक स्तर पर निवेश, नीति और बुनियादी ढांचे के बीच बेहतर तालमेल नहीं बनाया गया, तो स्वच्छ ऊर्जा परिवर्तन की रफ्तार और धीमी हो सकती है। ऐसे में भारत और चीन जैसे देशों की भूमिका भविष्य में और अधिक महत्वपूर्ण होने वाली है।


