Privatization News: नीति आयोग के पूर्व उपाध्यक्ष ने बताया विकसित भारत-2047 का रोडमैप, कहा- निजीकरण कार्यक्रम को फिर से रफ्तार देने की जरूरत
नई दिल्ली। भारत को विकसित राष्ट्र बनाने के लिए सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों (PSUs) और सरकारी बैंकों के निजीकरण की प्रक्रिया को फिर से तेज करने की जरूरत है। यह बात नीति आयोग के पूर्व उपाध्यक्ष और सोलहवें वित्त आयोग के चेयरमैन अरविंद पनगढ़िया ने कही है। उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा कि आर्थिक सुधारों को आगे बढ़ाने और सरकारी संसाधनों के बेहतर उपयोग के लिए निजीकरण एक महत्वपूर्ण कदम है।
एक साक्षात्कार में पनगढ़िया ने कहा कि सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों (PSUs) और अधिकांश सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों (PSBs) का निजीकरण भारत के आर्थिक सुधारों का अभिन्न हिस्सा होना चाहिए। उनका मानना है कि राजकोषीय दबावों या वैश्विक भू-राजनीतिक परिस्थितियों के बावजूद इस प्रक्रिया को नहीं रोका जाना चाहिए।
निजीकरण मंत्रालय बनाने की वकालत
अरविंद पनगढ़िया ने सरकार से विनिवेश कार्यक्रम को नई गति देने के लिए एक स्वतंत्र निजीकरण मंत्रालय गठित करने की मांग की। उनका कहना है कि मौजूदा विनिवेश विभाग निजीकरण की प्रक्रिया को अपेक्षित गति से आगे बढ़ाने में सफल नहीं रहा है।
उन्होंने कहा कि यदि सरकार वास्तव में विकसित भारत-2047 के लक्ष्य को हासिल करना चाहती है, तो उसे आर्थिक संरचना में व्यापक बदलाव करने होंगे। इसके लिए सरकारी स्वामित्व वाले व्यवसायों को चरणबद्ध तरीके से निजी क्षेत्र को सौंपना एक प्रभावी रणनीति हो सकती है।
पनगढ़िया के अनुसार, निजी क्षेत्र की दक्षता, प्रतिस्पर्धा और नवाचार क्षमता सरकारी संस्थानों की तुलना में अधिक होती है, जिससे अर्थव्यवस्था को दीर्घकालिक लाभ मिलता है।
विकसित भारत-2047 के लिए जरूरी आर्थिक सुधार
पूर्व नीति आयोग उपाध्यक्ष ने कहा कि भारत को अगले दो दशकों में विकसित देशों की श्रेणी में शामिल होने के लिए बड़े आर्थिक सुधारों की जरूरत होगी। उन्होंने कहा कि अर्थव्यवस्था के आधुनिकीकरण, निवेश बढ़ाने और उत्पादकता सुधारने के लिए निजीकरण कार्यक्रम को पुनर्जीवित करना आवश्यक है।
गौरतलब है कि नीति आयोग ने वर्ष 2016 में रणनीतिक विनिवेश और निजीकरण की अवधारणा को सक्रिय रूप से आगे बढ़ाना शुरू किया था। उस समय अरविंद पनगढ़िया स्वयं आयोग के उपाध्यक्ष थे और उन्होंने कई सरकारी कंपनियों के निजीकरण का समर्थन किया था।
पश्चिम एशिया संकट के बावजूद जारी रहे प्रक्रिया
हाल के महीनों में पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव और वैश्विक आर्थिक अनिश्चितताओं के बीच भी पनगढ़िया का मानना है कि भारत को अपने सुधार एजेंडे से पीछे नहीं हटना चाहिए।
उन्होंने कहा कि वैश्विक परिस्थितियां बदलती रहती हैं, लेकिन दीर्घकालिक आर्थिक नीतियों को अल्पकालिक चुनौतियों के आधार पर नहीं रोका जाना चाहिए। ऐसे समय में भी निजीकरण और विनिवेश की प्रक्रिया जारी रहनी चाहिए।
एफडीआई में लगातार बढ़ोतरी
भारत में विदेशी निवेश को लेकर उठ रहे सवालों पर पनगढ़िया ने कहा कि प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (FDI) के आंकड़े बेहद उत्साहजनक हैं।
उनके अनुसार:
- वित्त वर्ष 2023-24 में एफडीआई 71.3 अरब डॉलर रहा।
- वित्त वर्ष 2024-25 में यह बढ़कर 80.6 अरब डॉलर हो गया।
- वित्त वर्ष 2025-26 में एफडीआई 94.5 अरब डॉलर तक पहुंच गया।
उन्होंने कहा कि ये आंकड़े बताते हैं कि वैश्विक निवेशकों का भारत की दीर्घकालिक विकास क्षमता पर भरोसा लगातार मजबूत हो रहा है। विदेशी कंपनियां भारत को दुनिया के सबसे आकर्षक निवेश गंतव्यों में से एक मान रही हैं।
पूंजी निकासी को लेकर क्या बोले पनगढ़िया?
भारत से पूंजी के बाहर जाने को लेकर पूछे गए सवाल पर पनगढ़िया ने कहा कि यह पूरी तरह असामान्य स्थिति नहीं है। उन्होंने बताया कि विदेशी निवेशक समय-समय पर अपने पुराने निवेश का कुछ हिस्सा निकालते रहते हैं।
इसके अलावा, पिछले दो वर्षों में भारतीय कंपनियों ने भी विदेशों में निवेश बढ़ाया है, जिससे पूंजी का कुछ हिस्सा देश के बाहर गया है।
उन्होंने कहा कि विदेशी पोर्टफोलियो निवेश (FPI) की निकासी भी हाल के वर्षों में बढ़ी है। इसके पीछे एक प्रमुख कारण भारतीय शेयर बाजार में ऊंचे वैल्यूएशन रहे हैं।
शेयर बाजार के वैल्यूएशन पर भी दी राय
अरविंद पनगढ़िया का मानना है कि भारतीय शेयर बाजार में कुछ समय पहले कंपनियों का मूल्यांकन अत्यधिक ऊंचे स्तर पर पहुंच गया था। इसी वजह से विदेशी निवेशकों ने मुनाफावसूली शुरू की और पूंजी निकासी बढ़ी।
हालांकि, उन्होंने कहा कि अब बाजार में वैल्यूएशन काफी हद तक संतुलित हो चुके हैं और स्थिति पहले की तुलना में बेहतर दिखाई दे रही है।
क्या है बड़ा संदेश?
पनगढ़िया के बयान का सबसे बड़ा संदेश यह है कि भारत को विकसित राष्ट्र बनाने के लिए आर्थिक सुधारों की रफ्तार बनाए रखनी होगी। सरकारी कंपनियों और बैंकों के निजीकरण, विनिवेश प्रक्रिया में तेजी, विदेशी निवेश को आकर्षित करने और प्रतिस्पर्धी आर्थिक ढांचे के निर्माण पर जोर देना आने वाले वर्षों में सरकार की प्राथमिकताओं में शामिल हो सकता है।
यदि सरकार इन सुधारों को प्रभावी तरीके से लागू करती है, तो विकसित भारत-2047 का लक्ष्य हासिल करने की दिशा में यह एक महत्वपूर्ण कदम साबित हो सकता है।


