भारत-ओमान समझौते से ऊर्जा और उर्वरक आपूर्ति को मिलेगी मजबूती, खाड़ी क्षेत्र में भारत की रणनीतिक स्थिति भी होगी मजबूत
नई दिल्ली। पश्चिम एशिया में बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव के बीच भारत के लिए एक राहत भरी खबर सामने आई है। ऊर्जा सुरक्षा और खाद आपूर्ति को लेकर चिंताओं के बीच भारत और ओमान के बीच लागू हुए व्यापक आर्थिक साझेदारी समझौते (CEPA) को एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है। इस समझौते से न केवल भारत को उर्वरक, एलएनजी, पेट्रोकेमिकल्स और अन्य औद्योगिक कच्चे माल की आपूर्ति मजबूत करने में मदद मिलेगी, बल्कि खाड़ी क्षेत्र में भारतीय व्यापार और निवेश को भी नया आधार मिलेगा।
पिछले कुछ वर्षों में वैश्विक स्तर पर ऊर्जा बाजारों में अस्थिरता लगातार बढ़ी है। रूस-यूक्रेन युद्ध, लाल सागर संकट और पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव ने तेल, गैस और उर्वरक जैसी आवश्यक वस्तुओं की सप्लाई चेन पर दबाव बनाया है। ऐसे माहौल में भारत अपने आयात स्रोतों को विविध बनाने की रणनीति पर काम कर रहा है ताकि किसी एक क्षेत्र या देश पर अत्यधिक निर्भरता से बचा जा सके।
भारत के लिए क्यों महत्वपूर्ण है ओमान?
ओमान लंबे समय से भारत का एक भरोसेमंद व्यापारिक साझेदार रहा है। खाड़ी क्षेत्र में स्थित यह देश भारत को कच्चा तेल, एलएनजी, उर्वरक और कई औद्योगिक उत्पादों की आपूर्ति करता है। भारत की खाद्य सुरक्षा और कृषि उत्पादन में उर्वरकों की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण है। ऐसे में यदि वैश्विक बाजार में सप्लाई बाधित होती है तो इसका सीधा असर किसानों और कृषि क्षेत्र पर पड़ सकता है।
वित्त वर्ष 2026 के दौरान भारत ने ओमान से लगभग 7.2 अरब डॉलर का आयात किया। इसमें करीब 1.6 अरब डॉलर का कच्चा तेल, 1.2 अरब डॉलर का एलएनजी और 843 मिलियन डॉलर के उर्वरक शामिल रहे। ये आंकड़े बताते हैं कि ऊर्जा और कृषि दोनों क्षेत्रों में ओमान भारत के लिए कितना महत्वपूर्ण साझेदार है।
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि भविष्य में वैश्विक स्तर पर सप्लाई चेन प्रभावित होती है तो ओमान भारत के लिए एक वैकल्पिक और स्थिर स्रोत के रूप में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है।
उर्वरक आपूर्ति को लेकर क्या है बड़ी खबर?
ओमान के विदेश व्यापार सलाहकार पंकज खिमजी ने संकेत दिया है कि यदि भारत अतिरिक्त उर्वरक की मांग करता है तो ओमान अपने उत्पादन का बड़ा हिस्सा भारत की ओर मोड़ने पर विचार कर सकता है।
यह संभावना विशेष रूप से “ओमान इंडिया फर्टिलाइजर प्रोजेक्ट” को लेकर महत्वपूर्ण है। यह परियोजना भारतीय सहकारी संस्थाओं इफ्को (IFFCO), कृभको (KRIBHCO) और ओमान निवेश प्राधिकरण के संयुक्त सहयोग से संचालित होती है।
यदि भारत को भविष्य में उर्वरकों की अतिरिक्त आवश्यकता होती है तो इस परियोजना के माध्यम से आपूर्ति बढ़ाई जा सकती है। इससे किसानों के लिए खाद की उपलब्धता बेहतर बनी रह सकती है और कृषि उत्पादन पर किसी संभावित संकट का असर कम किया जा सकता है।
ऊर्जा सुरक्षा को मिलेगा नया सहारा
भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों का बड़ा हिस्सा आयात के जरिए पूरा करता है। कच्चे तेल और प्राकृतिक गैस की कीमतों में उतार-चढ़ाव का असर सीधे देश की अर्थव्यवस्था, महंगाई और आम उपभोक्ताओं पर पड़ता है।
ओमान के साथ मजबूत होते संबंध भारत को ऊर्जा स्रोतों के विविधीकरण में मदद करेंगे। इससे देश केवल कुछ चुनिंदा आपूर्तिकर्ताओं पर निर्भर नहीं रहेगा। ऊर्जा विशेषज्ञों का मानना है कि लंबी अवधि में यह रणनीति भारत को वैश्विक ऊर्जा संकटों से बेहतर तरीके से निपटने में मदद कर सकती है।
एलएनजी की स्थिर आपूर्ति बिजली उत्पादन, औद्योगिक गतिविधियों और शहरों में पाइप्ड गैस नेटवर्क के लिए भी महत्वपूर्ण है। ऐसे में ओमान के साथ बढ़ता सहयोग ऊर्जा क्षेत्र के लिए सकारात्मक संकेत माना जा रहा है।
क्या है भारत-ओमान CEPA?
भारत और ओमान के बीच व्यापक आर्थिक साझेदारी समझौता (Comprehensive Economic Partnership Agreement – CEPA) दोनों देशों के व्यापार और निवेश संबंधों को नई दिशा देने वाला समझौता है।
इस समझौते के तहत ओमान ने भारतीय निर्यात के लगभग 99 प्रतिशत हिस्से को शुल्क-मुक्त या रियायती पहुंच प्रदान की है। इससे भारतीय उत्पादों की प्रतिस्पर्धात्मकता बढ़ेगी और खाड़ी बाजार में भारतीय कंपनियों को फायदा मिलेगा।
इसके अंतर्गत कपड़ा, चमड़ा, इंजीनियरिंग उत्पाद, समुद्री उत्पाद और खाद्य उत्पाद जैसे कई क्षेत्रों को लाभ मिलने की उम्मीद है।
दूसरी ओर भारत ने भी ओमान से आने वाले कई उत्पादों पर आयात शुल्क कम या समाप्त करने का निर्णय लिया है। इनमें ऊर्जा, उर्वरक और औद्योगिक कच्चा माल शामिल है।
भारतीय कंपनियों और कामगारों को क्या फायदा होगा?
यह समझौता केवल वस्तुओं के व्यापार तक सीमित नहीं है। इसके तहत भारतीय व्यवसायों और पेशेवरों को भी लाभ मिलने की संभावना है।
ओमान भारतीय कंपनियों के लिए निवेश प्रक्रियाओं को आसान बनाने और वीजा संबंधी सुविधाएं बढ़ाने पर सहमत हुआ है। इससे भारतीय कंपनियों को खाड़ी क्षेत्र में अपने कारोबार का विस्तार करने में मदद मिल सकती है।
इसके अलावा भारतीय कर्मचारियों के लिए भी रोजगार के नए अवसर पैदा हो सकते हैं। विशेष रूप से इंजीनियरिंग, निर्माण, आईटी और सेवा क्षेत्र से जुड़े पेशेवरों को इसका लाभ मिल सकता है।
भारत की बड़ी रणनीति: सप्लाई स्रोतों में विविधता
हाल के वर्षों में भारत ने उर्वरकों और ऊर्जा के आयात के लिए कई देशों के साथ अपने संबंध मजबूत किए हैं। रूस, मोरक्को, ऑस्ट्रेलिया, इंडोनेशिया, मलेशिया, जॉर्डन, कनाडा, अल्जीरिया, मिस्र और टोगो जैसे देशों से भी आयात बढ़ाने की कोशिश की गई है।
इस रणनीति का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि यदि किसी एक क्षेत्र में संकट पैदा होता है तो भारत की आवश्यक आपूर्ति प्रभावित न हो।
विशेषज्ञ मानते हैं कि ओमान के साथ CEPA इसी व्यापक रणनीति का हिस्सा है, जिसका लक्ष्य भारत की ऊर्जा और खाद्य सुरक्षा को मजबूत बनाना है।
खाड़ी क्षेत्र में भारत की बढ़ेगी पहुंच
केंद्रीय वाणिज्य एवं उद्योग मंत्री पीयूष गोयल के अनुसार यह समझौता भारत को ओमान के प्रमुख बंदरगाहों के माध्यम से पूरे खाड़ी क्षेत्र तक बेहतर पहुंच प्रदान करेगा।
खाड़ी क्षेत्र भारत के लिए केवल ऊर्जा का स्रोत नहीं बल्कि एक बड़ा निर्यात बाजार भी है। लाखों भारतीय वहां काम करते हैं और दोनों पक्षों के बीच मजबूत आर्थिक संबंध मौजूद हैं।
यूएई के बाद किसी खाड़ी देश के साथ यह भारत का दूसरा प्रमुख व्यापार समझौता माना जा रहा है। इससे आने वाले वर्षों में व्यापार, निवेश और रणनीतिक सहयोग में उल्लेखनीय वृद्धि की संभावना है।
द्विपक्षीय व्यापार में पहले ही दिखने लगा असर
भारत और ओमान के बीच व्यापारिक संबंध लगातार मजबूत हो रहे हैं। वित्त वर्ष 2026 में दोनों देशों के बीच द्विपक्षीय व्यापार बढ़कर 11.18 अरब डॉलर तक पहुंच गया, जबकि पिछले वर्ष यह 10.61 अरब डॉलर था।
यह वृद्धि बताती है कि दोनों देशों के बीच आर्थिक गतिविधियां तेजी से बढ़ रही हैं। CEPA लागू होने के बाद आने वाले वर्षों में यह आंकड़ा और तेजी से बढ़ सकता है।
आम लोगों पर क्या होगा असर?
यदि ओमान से ऊर्जा और उर्वरकों की स्थिर आपूर्ति बनी रहती है तो इसका लाभ केवल उद्योगों को ही नहीं बल्कि आम उपभोक्ताओं को भी मिल सकता है।
- उर्वरकों की उपलब्धता बेहतर रहने से कृषि उत्पादन पर सकारात्मक असर पड़ सकता है।
- ऊर्जा आपूर्ति स्थिर रहने से ईंधन कीमतों पर दबाव कम हो सकता है।
- उद्योगों को कच्चा माल आसानी से मिलने से उत्पादन लागत नियंत्रित रह सकती है।
- व्यापार बढ़ने से रोजगार और निवेश के नए अवसर पैदा हो सकते हैं।
निष्कर्ष
पश्चिम एशिया में जारी अनिश्चितताओं के बीच भारत और ओमान के बीच लागू हुआ CEPA समझौता केवल एक व्यापारिक करार नहीं बल्कि ऊर्जा, उर्वरक और आर्थिक सुरक्षा को मजबूत करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण रणनीतिक कदम माना जा रहा है। यदि दोनों देश इस साझेदारी को प्रभावी ढंग से आगे बढ़ाते हैं तो आने वाले वर्षों में भारत को ऊर्जा सुरक्षा, कृषि क्षेत्र और निर्यात वृद्धि के मोर्चे पर बड़ा फायदा मिल सकता है।


