जून में पीक पर पहुंचेगी खाद की मांग, सरकार वैकल्पिक रास्तों पर कर रही विचार
नई दिल्ली। पश्चिम एशिया में जारी ईरान युद्ध का असर अब केवल कच्चे तेल और पेट्रोल-डीजल की कीमतों तक सीमित नहीं रह गया है। भारत की कृषि व्यवस्था और खाद आपूर्ति श्रृंखला पर भी इसका दबाव तेजी से बढ़ रहा है। स्थिति इतनी गंभीर हो चुकी है कि फर्टिलाइजर लेकर भारत आने वाले 17 जहाज फारस की खाड़ी में फंसे हुए हैं। होर्मुज जलडमरूमध्य (Hormuz Strait) में जहाजों की आवाजाही प्रभावित होने से इन जहाजों का भारत पहुंचना अनिश्चित हो गया है।
चिंता की बात यह है कि जून के मध्य तक खरीफ सीजन के लिए खाद की मांग अपने चरम पर पहुंचने वाली है। ऐसे समय में सप्लाई में देरी किसानों, सरकार और फर्टिलाइजर कंपनियों तीनों के लिए बड़ी चुनौती बन सकती है। सरकार अब वैकल्पिक मार्गों पर विचार कर रही है ताकि खाद की उपलब्धता प्रभावित न हो और किसानों को समय पर उर्वरक मिल सके।
17 जहाज खाड़ी में फंसे, सरकार तलाश रही नया रास्ता
रिपोर्ट्स के अनुसार फर्टिलाइजर विभाग के अधिकारियों ने मंत्रियों के एक अनौपचारिक समूह को बताया है कि भारत आने वाले 17 जहाज वर्तमान में फारस की खाड़ी क्षेत्र में फंसे हुए हैं। होर्मुज जलडमरूमध्य में सुरक्षा जोखिम और जहाजों की आवाजाही पर असर के कारण सामान्य समुद्री मार्ग बाधित हो गया है। सरकार जिस वैकल्पिक योजना पर विचार कर रही है, उसके तहत खाड़ी क्षेत्र के बंदरगाहों से खाद को सड़क मार्ग के जरिए सऊदी अरब के यानबू (Yanbu) बंदरगाह तक पहुंचाया जा सकता है। इसके बाद वहां से जहाजों में लादकर भारत भेजा जाएगा। हालांकि यह विकल्प आसान नहीं है। फारस की खाड़ी के बंदरगाहों से यानबू तक की दूरी लगभग 1,200 किलोमीटर बताई जा रही है। इसके अलावा रेड सी के रास्ते भारत आने में सामान्य मार्ग की तुलना में काफी अधिक समय लगेगा। विशेषज्ञों का मानना है कि इस वैकल्पिक व्यवस्था से शिपिंग लागत बढ़ सकती है और डिलीवरी में 60 से 70 दिनों तक की देरी संभव है।
खरीफ सीजन से पहले क्यों बढ़ गई है चिंता?
भारत में जून और जुलाई का समय कृषि गतिविधियों के लिहाज से बेहद महत्वपूर्ण माना जाता है। मानसून के आगमन के साथ ही धान, मक्का, सोयाबीन, कपास और कई अन्य खरीफ फसलों की बुवाई शुरू हो जाती है। इसी अवधि में किसानों द्वारा यूरिया, डीएपी और अन्य उर्वरकों की सबसे अधिक खरीद की जाती है। फर्टिलाइजर विभाग के अधिकारियों का कहना है कि जून के मध्य तक खाद की मांग पीक स्तर पर पहुंच सकती है। यदि इसी समय आपूर्ति प्रभावित होती है तो कई राज्यों में खाद की उपलब्धता पर दबाव बढ़ सकता है। कृषि विशेषज्ञों के अनुसार उर्वरकों की समय पर उपलब्धता फसल उत्पादन के लिए उतनी ही महत्वपूर्ण है जितनी पर्याप्त बारिश। यदि शुरुआती बुवाई के दौरान किसानों को खाद नहीं मिलती तो इसका असर पैदावार पर पड़ सकता है।
भारत की खाद जरूरतों में आयात की कितनी भूमिका?
भारत दुनिया के सबसे बड़े कृषि उत्पादक देशों में शामिल है, लेकिन कई प्रमुख उर्वरकों के मामले में अभी भी आयात पर काफी निर्भर है। देश में यूरिया की सालाना खपत लगभग 40 मिलियन टन के आसपास है। इसमें से करीब 8 से 10 मिलियन टन का आयात किया जाता है। हालांकि यूरिया उत्पादन में भारत ने पिछले कुछ वर्षों में आत्मनिर्भरता की दिशा में प्रगति की है, फिर भी आयात की जरूरत बनी हुई है। डीएपी (DAP) की स्थिति और भी चुनौतीपूर्ण है। देश की कुल जरूरत का लगभग 60 प्रतिशत हिस्सा आयात के जरिए पूरा किया जाता है। वहीं पोटाश के मामले में भारत लगभग पूरी तरह विदेशी आपूर्ति पर निर्भर है। एनपीके (NPK) उर्वरकों के लिए भी कच्चे माल और तैयार उत्पादों का बड़ा हिस्सा विदेशों से आता है। यही कारण है कि वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला में कोई भी व्यवधान भारत की खाद उपलब्धता और कीमतों पर सीधा असर डालता है।
ईरान युद्ध के बाद कितनी बढ़ चुकी हैं खाद की कीमतें?
ईरान युद्ध शुरू होने के बाद वैश्विक उर्वरक बाजार में तेज उछाल देखा गया है। रिपोर्ट्स के अनुसार फरवरी के अंत से अब तक कई प्रमुख उर्वरकों और कच्चे माल की कीमतों में भारी वृद्धि हुई है। यूरिया की अंतरराष्ट्रीय कीमतों में 120 प्रतिशत से अधिक की वृद्धि दर्ज की गई है। डीएपी की कीमत लगभग 38 प्रतिशत बढ़ चुकी है। इसके अलावा सल्फर की कीमत में 87 प्रतिशत और अमोनिया की कीमत में 84 प्रतिशत तक की तेजी आई है। इन कच्चे माल का उपयोग विभिन्न उर्वरकों के निर्माण में किया जाता है। इसलिए इनकी कीमत बढ़ने का सीधा असर फर्टिलाइजर उत्पादन लागत पर पड़ता है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि पश्चिम एशिया में तनाव लंबा खिंचता है तो वैश्विक उर्वरक बाजार में और अधिक अस्थिरता देखने को मिल सकती है।
रुपये की कमजोरी ने बढ़ाई मुश्किल
भारत के लिए समस्या केवल वैश्विक कीमतों तक सीमित नहीं है। डॉलर के मुकाबले रुपये में आई कमजोरी ने आयात लागत को और बढ़ा दिया है। जब रुपया कमजोर होता है तो विदेशी मुद्रा में खरीदे जाने वाले उत्पाद भारत के लिए महंगे हो जाते हैं। फर्टिलाइजर आयात भी इसी श्रेणी में आता है। अधिकारियों का अनुमान है कि रुपये की कमजोरी के कारण उर्वरक आयात लागत में लगभग 6 प्रतिशत अतिरिक्त वृद्धि हुई है। इसका सीधा असर सरकारी सब्सिडी और वित्तीय बोझ पर पड़ सकता है।
सरकार का सब्सिडी बिल कितना बढ़ सकता है?
भारत सरकार किसानों को सस्ती दरों पर खाद उपलब्ध कराने के लिए हर साल भारी सब्सिडी देती है। पिछले वित्त वर्ष में फर्टिलाइजर सब्सिडी पर सरकार का खर्च लगभग 2.2 लाख करोड़ रुपये रहा था। लेकिन वैश्विक कीमतों में तेजी और आयात लागत बढ़ने के कारण इस वर्ष यह आंकड़ा काफी ऊपर जा सकता है। अधिकारियों का अनुमान है कि यदि मौजूदा हालात लंबे समय तक बने रहते हैं तो फर्टिलाइजर सब्सिडी बिल 3.8 लाख करोड़ रुपये तक पहुंच सकता है। इसका मतलब है कि सरकार को अतिरिक्त वित्तीय संसाधनों की व्यवस्था करनी पड़ सकती है ताकि किसानों पर कीमतों का बोझ न पड़े।
क्या रबी सीजन भी हो सकता है प्रभावित?
फर्टिलाइजर विभाग के अधिकारियों ने आशंका जताई है कि यदि ईरान युद्ध लंबे समय तक जारी रहता है तो इसका असर केवल खरीफ सीजन तक सीमित नहीं रहेगा। उर्वरकों की आपूर्ति श्रृंखला में लगातार देरी होने की स्थिति में रबी फसलों की बुवाई भी प्रभावित हो सकती है। गेहूं, चना, सरसों और अन्य रबी फसलों के लिए भी पर्याप्त उर्वरक उपलब्ध कराना चुनौतीपूर्ण हो सकता है। विशेषज्ञों का कहना है कि यदि वैश्विक आपूर्ति बाधित रहती है तो सरकार को पहले से अधिक रणनीतिक भंडारण और वैकल्पिक आयात स्रोतों पर ध्यान देना होगा।
किसानों और बाजार के लिए आगे क्या?
फिलहाल सरकार की प्राथमिकता यह सुनिश्चित करना है कि खरीफ सीजन के दौरान देश में खाद की कोई बड़ी कमी न हो। वैकल्पिक शिपिंग रूट, अतिरिक्त आयात व्यवस्था और सब्सिडी समर्थन जैसे विकल्पों पर तेजी से काम किया जा रहा है। हालांकि स्थिति पूरी तरह सामान्य होने तक जोखिम बना रहेगा। यदि होर्मुज जलडमरूमध्य में व्यवधान जारी रहता है तो शिपिंग लागत, आयात बिल और सरकारी सब्सिडी पर दबाव बढ़ सकता है। कृषि अर्थशास्त्रियों का मानना है कि यह संकट भारत के लिए एक बड़ा संकेत भी है। जिस तरह कच्चे तेल के मामले में ऊर्जा सुरक्षा महत्वपूर्ण है, उसी तरह उर्वरकों के मामले में भी दीर्घकालिक आत्मनिर्भरता और सप्लाई चेन विविधीकरण की जरूरत बढ़ती जा रही है।
निष्कर्ष
ईरान युद्ध का असर अब केवल तेल बाजार तक सीमित नहीं रहा। भारत की खाद आपूर्ति श्रृंखला पर इसका दबाव स्पष्ट दिखाई देने लगा है। फारस की खाड़ी में फंसे 17 जहाज, बढ़ती वैश्विक कीमतें, कमजोर रुपया और खरीफ सीजन की बढ़ती मांग मिलकर एक जटिल स्थिति पैदा कर रहे हैं। फिलहाल सरकार वैकल्पिक मार्गों और अतिरिक्त व्यवस्थाओं पर काम कर रही है, लेकिन यदि पश्चिम एशिया में तनाव जल्द कम नहीं हुआ तो इसका असर कृषि क्षेत्र, सरकारी वित्त और खाद बाजार तीनों पर देखने को मिल सकता है।
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