देश और दुनिया में जारी भू-राजनीतिक तनाव, कच्चे तेल की कीमतों में उतार-चढ़ाव और अमेरिका-ईरान वार्ता से जुड़ी खबरों के बीच इस सप्ताह सोने और चांदी की कीमतों में हलचल देखने को मिली। सप्ताह के दौरान सोने की कीमतों में हल्की तेजी दर्ज की गई, जबकि सप्ताह के आखिरी कारोबारी दिन यानी शुक्रवार को मल्टी कमोडिटी एक्सचेंज (MCX) पर सोना और चांदी दोनों दबाव में दिखाई दिए।
बाजार विशेषज्ञों का कहना है कि निवेशकों की नजर फिलहाल पश्चिम एशिया संकट, डॉलर इंडेक्स, अमेरिकी बॉन्ड यील्ड और भारत में आयात शुल्क बढ़ोतरी जैसे बड़े फैक्टर्स पर टिकी हुई है। यही कारण है कि कीमती धातुओं में लगातार उतार-चढ़ाव बना हुआ है।
भारत में सोना सिर्फ निवेश का माध्यम नहीं बल्कि सामाजिक और सांस्कृतिक रूप से भी बेहद महत्वपूर्ण माना जाता है। ऐसे में कीमतों में हर बदलाव का असर आम ग्राहकों से लेकर ज्वैलर्स और निवेशकों तक पर पड़ता है।
इस सप्ताह कितना बढ़ा सोना?
इंडिया बुलियन एंड ज्वैलर्स एसोसिएशन (IBJA) के आंकड़ों के अनुसार, इस सप्ताह 999 प्योरिटी वाले 10 ग्राम सोने की कीमत में करीब 0.19 प्रतिशत की बढ़त दर्ज की गई।
सप्ताह की शुरुआत में जहां सोने का भाव करीब 1,57,821 रुपये प्रति 10 ग्राम था, वहीं शुक्रवार तक यह बढ़कर लगभग 1,58,117 रुपये पर पहुंच गया। हालांकि सप्ताह के अंतिम कारोबारी सत्र में बाजार में कुछ मुनाफावसूली देखने को मिली।
विशेषज्ञों के मुताबिक, सप्ताह के दौरान अंतरराष्ट्रीय बाजार में अनिश्चितता बनी रहने से निवेशकों ने सुरक्षित निवेश विकल्प के तौर पर सोने की ओर रुख किया। यही वजह रही कि कीमतों को सपोर्ट मिला।
MCX पर क्या रहे ताजा भाव?
शुक्रवार को एमसीएक्स पर जून गोल्ड फ्यूचर्स में करीब 0.06 प्रतिशत की गिरावट दर्ज की गई। इसके साथ ही गोल्ड फ्यूचर्स लगभग 1,58,588 रुपये प्रति 10 ग्राम के आसपास कारोबार करता दिखाई दिया।
वहीं, सिल्वर मई फ्यूचर्स में करीब 0.09 प्रतिशत की कमजोरी देखने को मिली और चांदी का भाव लगभग 2,71,600 रुपये प्रति किलोग्राम के आसपास रहा।
कमोडिटी बाजार के जानकारों का कहना है कि सप्ताह के अंत में रुपये में मजबूती आने और अंतरराष्ट्रीय बाजार में हल्की नरमी के कारण घरेलू बाजार में बुलियन कीमतों पर दबाव बना।
अमेरिका-ईरान वार्ता का क्यों पड़ रहा असर?
इस समय वैश्विक बाजार की सबसे बड़ी चिंता पश्चिम एशिया में जारी तनाव है। खासकर अमेरिका और ईरान के बीच संबंधों को लेकर निवेशक बेहद सतर्क हैं।
हाल के दिनों में मीडिया रिपोर्ट्स में यह संकेत मिले कि दोनों देशों के बीच बातचीत में कुछ प्रगति हुई है। इसके बाद अंतरराष्ट्रीय बाजार में जोखिम लेने की भावना थोड़ी मजबूत हुई और सोने की खरीदारी में नरमी देखने को मिली।
हालांकि स्थिति पूरी तरह सामान्य नहीं मानी जा रही। होर्मुज जलडमरूमध्य को लेकर जारी तनाव अभी भी बाजार के लिए बड़ा जोखिम बना हुआ है। दुनिया के बड़े हिस्से में तेल सप्लाई इसी समुद्री मार्ग से गुजरती है। अगर यहां कोई बड़ा संकट पैदा होता है तो कच्चे तेल की कीमतों में तेज उछाल आ सकता है, जिसका असर सीधे सोने और चांदी पर भी पड़ेगा।
विश्लेषकों का मानना है कि जब भी वैश्विक स्तर पर अनिश्चितता बढ़ती है, निवेशक सुरक्षित निवेश की तरफ जाते हैं और सोना उसका सबसे बड़ा विकल्प माना जाता है।
कॉमेक्स गोल्ड और डॉलर इंडेक्स की भूमिका
अंतरराष्ट्रीय बाजार में कॉमेक्स गोल्ड फिलहाल 4,500 डॉलर के आसपास सपोर्ट बनाए हुए है। बाजार विशेषज्ञों के अनुसार, अमेरिका-ईरान वार्ता में सकारात्मक संकेतों के बावजूद निवेशक पूरी तरह आश्वस्त नहीं हैं।
दूसरी ओर डॉलर इंडेक्स और अमेरिकी ट्रेजरी बॉन्ड यील्ड भी सोने की कीमतों को प्रभावित कर रहे हैं।
अगर डॉलर मजबूत होता है तो आमतौर पर सोने की कीमतों पर दबाव बढ़ता है, क्योंकि इससे अन्य मुद्राओं में सोना महंगा हो जाता है। वहीं डॉलर कमजोर होने पर सोने को सपोर्ट मिलता है।
भारत में क्यों घट सकती है सोने की मांग?
वर्ल्ड गोल्ड काउंसिल की हालिया रिपोर्ट के अनुसार, भारत में 2026 के दौरान सोने की मांग में लगभग 10 प्रतिशत तक गिरावट आ सकती है। अनुमान है कि मांग 50 से 60 टन तक कम हो सकती है। इसकी सबसे बड़ी वजह केंद्र सरकार द्वारा आयात शुल्क में की गई भारी बढ़ोतरी को माना जा रहा है।
सरकार ने सोने पर आयात शुल्क को 6 प्रतिशत से बढ़ाकर 15 प्रतिशत कर दिया है। यह हाल के वर्षों की सबसे बड़ी बढ़ोतरी मानी जा रही है। इससे जुलाई 2024 में दी गई शुल्क राहत पूरी तरह खत्म हो गई है।
ज्वैलरी कारोबार से जुड़े विशेषज्ञों का कहना है कि बढ़े हुए आयात शुल्क का असर सीधे ग्राहकों पर पड़ रहा है। शादी और त्योहारों के सीजन में भी ग्राहक अब कम मात्रा में खरीदारी कर सकते हैं।
आम ग्राहकों पर क्या असर पड़ेगा?
सोने की कीमतों में लगातार बढ़ोतरी का असर मध्यम वर्गीय परिवारों पर सबसे ज्यादा पड़ रहा है। भारत में बड़ी संख्या में लोग शादी-ब्याह के लिए सोना खरीदते हैं, निवेश के तौर पर गोल्ड रखते हैं, त्योहारों में ज्वैलरी खरीदते हैं
लेकिन कीमतें रिकॉर्ड स्तर के आसपास पहुंचने के बाद अब ग्राहक हल्के वजन के आभूषणों की ओर बढ़ रहे हैं। कई ज्वैलर्स का कहना है कि लोग अब भारी ज्वैलरी की बजाय हल्के और डिजाइनर विकल्प चुन रहे हैं।
बॉन्ड यील्ड क्यों बढ़ा रही चिंता?
विश्लेषकों के मुताबिक, अमेरिकी बॉन्ड यील्ड में लगातार बढ़ोतरी भी सोने और चांदी के लिए चिंता का विषय बनी हुई है। अमेरिका के 30 वर्षीय ट्रेजरी बॉन्ड की यील्ड 5 प्रतिशत से ऊपर बनी हुई है 10 वर्षीय बॉन्ड यील्ड 4.5 प्रतिशत के ऊपर रही.
जब बॉन्ड यील्ड बढ़ती है तो निवेशकों को निश्चित रिटर्न वाले साधनों में ज्यादा आकर्षण दिखाई देता है। ऐसे में सोने जैसे बिना ब्याज वाले निवेश विकल्पों से पैसा निकल सकता है। यही कारण है कि कई बार भू-राजनीतिक तनाव के बावजूद सोने में बहुत बड़ी तेजी देखने को नहीं मिलती।
क्या फेडरल रिजर्व बढ़ा सकता है ब्याज दरें?
बाजार में यह आशंका भी बनी हुई है कि अगर अमेरिकी अर्थव्यवस्था में महंगाई बनी रहती है तो फेडरल रिजर्व 2026 के अंत तक ब्याज दरों में और बढ़ोतरी कर सकता है।
अगर ऐसा होता है तो डॉलर मजबूत हो सकता है बॉन्ड यील्ड और बढ़ सकती है, सोने-चांदी पर दबाव बढ़ सकता है हालांकि दूसरी ओर अगर वैश्विक तनाव बढ़ता है तो सुरक्षित निवेश की मांग सोने को फिर सपोर्ट दे सकती है।
आगे क्या रह सकती है सोने-चांदी की दिशा?
कमोडिटी बाजार विशेषज्ञों के अनुसार, आने वाले दिनों में सोने और चांदी की कीमतें कई बड़े वैश्विक संकेतों पर निर्भर करेंगी। इनमें प्रमुख हैं अमेरिका-ईरान संबंध, पश्चिम एशिया तनाव, कच्चे तेल की कीमतें, डॉलर इंडेक्स, अमेरिकी फेडरल रिजर्व की नीति, भारतीय रुपये की चाल, वैश्विक बॉन्ड यील्ड
अगर वैश्विक तनाव बढ़ता है तो सोना फिर नई ऊंचाई की तरफ बढ़ सकता है। वहीं अमेरिका-ईरान संबंधों में सुधार और डॉलर की मजबूती कीमतों पर दबाव बना सकती है।
निवेशकों के लिए क्या है संकेत?
विशेषज्ञों का कहना है कि मौजूदा समय में सोने और चांदी में निवेश करते समय सतर्क रणनीति अपनाने की जरूरत है। कम अवधि में बाजार में तेज उतार-चढ़ाव बना रह सकता है। ऐसे में निवेशकों को एकमुश्त निवेश से बचना चाहिए, चरणबद्ध निवेश करना चाहिए, वैश्विक घटनाक्रम पर नजर रखनी चाहिए, लंबी अवधि की रणनीति अपनानी चाहिए
सोना अब भी अनिश्चितता के दौर में सुरक्षित निवेश माना जा रहा है, लेकिन मौजूदा समय में कीमतों में अस्थिरता काफी ज्यादा बनी हुई है।
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