विदेश में पढ़ाई का सपना देखने वाले भारतीय छात्रों के लिए 2026 का साल काफी चुनौतीपूर्ण साबित हो रहा है। भारतीय रुपये में लगातार गिरावट, डॉलर-यूरो-पाउंड जैसी विदेशी मुद्राओं की मजबूती, अमेरिका-कनाडा के सख्त वीजा नियम और पश्चिम एशिया तनाव के कारण बढ़ती आर्थिक अनिश्चितता ने विदेश में उच्च शिक्षा की लागत को अचानक बहुत बढ़ा दिया है। इसका असर अब सीधे छात्रों और उनके परिवारों के फैसलों पर दिखाई देने लगा है।
चेन्नई समेत देश के कई बड़े शिक्षा केंद्रों में इस साल विदेशी विश्वविद्यालयों में दाखिले के लिए आवेदन और पूछताछ में 25 से 30 फीसदी तक गिरावट दर्ज की गई है। शिक्षा सलाहकारों का कहना है कि मध्यम वर्गीय परिवार अब विदेश में पढ़ाई के खर्च को लेकर दोबारा सोचने पर मजबूर हो गए हैं।
आमतौर पर हर साल तमिलनाडु से 10 हजार से 15 हजार छात्र विदेश में उच्च शिक्षा के लिए जाते हैं, लेकिन इस बार स्थिति पूरी तरह बदल गई है। विदेशी मुद्रा विनिमय दरों में तेज बदलाव ने पढ़ाई, रहने, यात्रा और वीजा से जुड़े खर्चों को अचानक बहुत महंगा बना दिया है।
रुपये की कमजोरी ने कैसे बढ़ाया विदेश में पढ़ाई का खर्च
पिछले एक साल में भारतीय रुपये की कीमत डॉलर, यूरो और ब्रिटिश पाउंड के मुकाबले काफी कमजोर हुई है। इसका सीधा असर विदेशी विश्वविद्यालयों की फीस पर पड़ा है। जो कोर्स कुछ समय पहले तक भारतीय छात्रों के लिए अपेक्षाकृत सस्ते माने जाते थे, अब वे लाखों रुपये अधिक महंगे हो चुके हैं।
चेन्नई स्थित ट्रूमैटिक्स ओवरसीज एजुकेशन कंसल्टेंसी के प्रबंध निदेशक आर सुरेश कुमार के अनुसार, ब्रिटेन में पढ़ाई की फीस लगभग ₹15 लाख से बढ़कर ₹20 लाख तक पहुंच गई है। केवल ट्यूशन फीस ही नहीं, बल्कि रहने का खर्च, भोजन, स्थानीय यात्रा और स्वास्थ्य बीमा जैसी लागतों में भी लगभग 20 फीसदी की बढ़ोतरी हुई है।
उन्होंने बताया कि पश्चिम एशिया में जारी युद्ध और तनाव के कारण अंतरराष्ट्रीय हवाई किराए भी काफी बढ़ गए हैं। ऐसे में कई छात्रों ने फिलहाल विदेश में पढ़ाई की अपनी योजना टाल दी है।
अमेरिका और कनाडा के वीजा नियम बने बड़ी बाधा
विदेश में पढ़ाई के लिए भारतीय छात्रों की पहली पसंद लंबे समय तक अमेरिका और कनाडा रहे हैं। लेकिन अब इन देशों के सख्त इमिग्रेशन नियम और बढ़ती वीजा रिजेक्शन दरें छात्रों को परेशान कर रही हैं।
चेन्नई के ग्लोबल डिग्रीज संस्थान के निदेशक श्रीनिवास वेंकटेश्वरन का कहना है कि अमेरिका जाने वाले छात्रों को इस समय वीजा प्रक्रिया में काफी मुश्किलों का सामना करना पड़ रहा है। विशेष रूप से इमिग्रेशन नीति में सख्ती के बाद छात्र और अभिभावक दोनों चिंतित हैं।
कनाडा ने भी हाल के वर्षों में अंतरराष्ट्रीय छात्रों की संख्या को नियंत्रित करने के लिए कई नए नियम लागू किए हैं। इससे भारतीय छात्रों के लिए वहां जाना पहले की तुलना में अधिक कठिन और महंगा हो गया है।
अब फ्रांस, जर्मनी और जापान बन रहे नई पसंद
पारंपरिक देशों में बढ़ती लागत और वीजा सख्ती के बीच भारतीय छात्र अब वैकल्पिक देशों की ओर रुख कर रहे हैं। इस साल फ्रांस, जर्मनी, नीदरलैंड, मलेशिया, दक्षिण कोरिया और जापान जैसे देशों के प्रति छात्रों की रुचि तेजी से बढ़ी है।
शिक्षा विशेषज्ञों का कहना है कि इन देशों में शिक्षा की गुणवत्ता अच्छी होने के साथ-साथ अंतरराष्ट्रीय छात्रों के लिए अवसर भी बेहतर हैं। कुछ यूरोपीय देशों में पोस्ट-स्टडी वर्क परमिट और रिसर्च के अवसर भी आकर्षण का केंद्र बन रहे हैं।
हालांकि यूरोप में भी रुपये की कमजोरी ने खर्च बढ़ा दिया है। मीस्टर्स इंटरनेशनल एजुकेशनल एडवाइजरी प्राइवेट लिमिटेड के निदेशक आर मणिकंदन के अनुसार, एक यूरो की कीमत ₹85 से बढ़कर ₹112 तक पहुंच गई है। इससे यूरोप में पढ़ाई का कुल बजट काफी बढ़ गया है।
AI और डेटा साइंस कोर्स की मांग अभी भी मजबूत
भले ही विदेश में पढ़ाई के लिए आवेदन घटे हों, लेकिन कोर्स की पसंद में कोई बड़ा बदलाव नहीं आया है। छात्रों की सबसे अधिक रुचि अभी भी टेक्नोलॉजी और मैनेजमेंट आधारित कोर्स में बनी हुई है।
विशेष रूप से आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI), डेटा साइंस, बिजनेस एनालिटिक्स, कंप्यूटर साइंस, मैनेजमेंट प्रोग्राम जैसे कोर्स सबसे ज्यादा मांग में हैं।
विशेषज्ञों का मानना है कि वैश्विक नौकरी बाजार में AI और डेटा आधारित नौकरियों की मांग बढ़ने के कारण छात्र इन क्षेत्रों को भविष्य के सुरक्षित विकल्प के रूप में देख रहे हैं।
फ्रांस जैसे देशों में बढ़े अवसर
चेन्नई के छात्र निहिल को फ्रांस के क्लेरमोंट स्कूल ऑफ बिजनेस में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और बिजनेस एनालिटिक्स मास्टर्स प्रोग्राम में प्रवेश मिला है। उनका कहना है कि ब्रिटेन की तुलना में फ्रांस में अंतरराष्ट्रीय छात्रों के लिए अवसर अधिक दिखाई दे रहे हैं।
निहिल के अनुसार, फ्रांस में अंतरराष्ट्रीय exposure बेहतर है और वहां की कुल फीस लगभग ₹15 लाख के भीतर रही, जो उनके बजट के अनुसार सही थी। यह संकेत देता है कि भारतीय छात्र अब केवल “ब्रांड वैल्यू” वाले देशों के बजाय “रिटर्न ऑन इन्वेस्टमेंट” यानी पढ़ाई के बाद नौकरी और खर्च के संतुलन को भी महत्व देने लगे हैं।
ब्रिटेन की आर्थिक स्थिति भी बनी चिंता
ब्रिटेन लंबे समय से भारतीय छात्रों के लिए लोकप्रिय गंतव्य रहा है, लेकिन मौजूदा आर्थिक संकट, बढ़ती महंगाई और कमजोर नौकरी बाजार ने छात्रों की चिंता बढ़ा दी है।
विशेषज्ञों का कहना है कि UK में पढ़ाई पूरी करने के बाद नौकरी पाना पहले की तुलना में कठिन हो गया है। यही कारण है कि छात्र अब जर्मनी, फ्रांस, स्वीडन और लातविया जैसे देशों की ओर ज्यादा आकर्षित हो रहे हैं।
मध्यम वर्गीय परिवारों पर सबसे ज्यादा असर
विदेश में पढ़ाई की बढ़ती लागत का सबसे बड़ा असर मध्यम वर्गीय परिवारों पर पड़ा है। शिक्षा ऋण लेने वाले छात्रों के लिए भी अब EMI और विदेशी मुद्रा विनिमय दर का जोखिम बढ़ गया है।
यदि रुपये में और गिरावट आती है तो शिक्षा ऋण महंगा हो सकता है विदेश में रहने का खर्च और बढ़ेगा रिवारों पर आर्थिक दबाव बढ़ सकता है यही वजह है कि कई छात्र अब भारत में ही अच्छे निजी विश्वविद्यालयों और ऑनलाइन अंतरराष्ट्रीय डिग्री प्रोग्राम पर भी विचार करने लगे हैं।
क्या आने वाले समय में और मुश्किल बढ़ेगी?
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि वैश्विक आर्थिक अनिश्चितता, पश्चिम एशिया तनाव और मुद्रा बाजार में अस्थिरता जारी रहती है तो विदेश में पढ़ाई और महंगी हो सकती है। खासकर डॉलर और यूरो के मजबूत बने रहने की स्थिति में भारतीय छात्रों की लागत लगातार बढ़ेगी।
हालांकि कुछ देश अंतरराष्ट्रीय छात्रों को आकर्षित करने के लिए स्कॉलरशिप, आसान वीजा और सस्ती शिक्षा मॉडल पर काम कर रहे हैं। ऐसे में आने वाले वर्षों में भारतीय छात्रों के पसंदीदा गंतव्य पूरी तरह बदल सकते हैं।
निष्कर्ष
विदेश में पढ़ाई का सपना अब केवल शैक्षणिक निर्णय नहीं रह गया है, बल्कि यह एक बड़ा आर्थिक फैसला बन चुका है। रुपये की कमजोरी, वीजा प्रतिबंध और वैश्विक आर्थिक संकट ने भारतीय छात्रों के सामने नई चुनौतियां खड़ी कर दी हैं। इसके बावजूद AI, डेटा साइंस और टेक्नोलॉजी जैसे क्षेत्रों में वैश्विक अवसरों को देखते हुए छात्र नए देशों और नए विकल्पों की तलाश कर रहे हैं। आने वाले समय में यह बदलाव भारतीय छात्रों के विदेश शिक्षा के पूरे पैटर्न को बदल सकता है।
Source: TOI
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